फोन से शादी, वहां समारोह के साथ हुई, यहां बिना जश्न

संपादकीय
30 जून  2016
अमरीका से एक बड़ी बढिय़ा खबर आई है कि एक आदमी ने अपने स्मार्टफोन से समारोहपूर्वक औपचारिक शादी कर ली। उसने शादी के कपड़े पहने, समारोह हुआ, और चर्च में पादरी ने रस्में पूरी कीं। पादरी ने इस आदमी से शादी की रस्म के तहत पूछा कि एरोन क्या तुम इस स्मार्टफोन को कानूनी तरीके से पत्नी मानते हो और क्या तुम उसे प्यार करने, उसका सम्मान करने, उसे आराम से रखने के साथ उसके प्रति निष्ठावान रहोगे? उसने कहा, हां, मैं ऐसा करूंगा। इस पर इस दूल्हे के बारे में कहा गया कि कलाकार और निर्देशक चेर्वेनाक ने अपने स्मार्टफोन से प्रतीकात्मक ढंग से शादी का भाव प्रदर्शित कर समाज को एक संदेश दिया है कि लोग अपने फोन से इतना अधिक जुड़े हुए हैं कि वे हमेशा उसके साथ रहते हैं और यह शादी जैसा लगता है।
यह अमरीका की बात नहीं है, भारत और चीन जैसे देशों में भी लोग अपने फोन से इस तरह जुड़े रहते हैं कि मानो वह जन्म से उनके बदन का कोई हिस्सा ही हो। अगर सैर-सपाटे के लिए कहीं जाने पर भी फोन काम न करे, उस पर घंटी न बजे, उस पर संदेश न आए-जाएं, तो लोग डिप्रेशन में आ जाते हैं। उनकी काम करने की क्षमता घट जाती है, उनकी बेचैनी बढ़ जाती है, और उनका बर्ताव अस्वाभाविक हो जाता है। पिछली चौथाई सदी में दुनिया ने मोबाइल फोन का इंसानी-मानसिकता पर जो असर देखा है, वैसा किसी और टेक्नालॉजी का पिछली दस सदियों में भी नहीं हुआ होगा। और अब फोन जैसे-जैसे अधिक स्मार्ट होते जा रहे हैं, अधिक बड़े या अधिक तेज होते जा रहे हैं, वे इंसानों की और अधिक गुलाम बनाते चल रहे हैं। बेडिय़ां और हथकडिय़ां बढ़ती जा रही हैं, और चारों तरफ जंगले भी खड़े होते जा रहे हैं।
आज हालत यह है कि हिन्दुस्तान में भी यह लतीफा चलता है कि अगर घर में सारे लोगों को एक जगह इक_ा करना हो तो घर का वाईफाई बंद कर दिया जाए, सारे लोग अपने फोन या लैपटॉप लिए हुए एक जगह आ जाएंगे। फोन में बिना वाईफाई भी सहूलियत है, इसलिए सफर और सैर के दौरान भी परिवार के लोग एक साथ मजा लेने के बजाय अपने-अपने फोन पर जुटे रहते हैं, और कुछ लोगों का यह मानना है कि अगर फोन बंद हो जाएं, तो शायद घर के लोगों को भी अब यह समझ नहीं पड़ेगा कि एक-दूसरे से क्या बातें करें, क्योंकि बातचीत कम होती गई है, और परिवार के लोग भी आपस में एक-दूसरे को फेसबुक जैसे सोशल मीडिया पर पसंद और नापसंद करने लगे हैं, देखने लगे हैं।
कई बरस पहले से जापान के बारे में यह बात आती थी कि लोग टेक्नालॉजी के ऐसे गुलाम हो गए हैं, और टेक्नालॉजी पर ऐसे टिक भी गए हैं कि उन्हें दूसरे इंसानों की जरूरत अब नहीं पड़ती, और वहां विवाह नाम की संस्था दम तोड़ती जा रही है, और लोग घरों से निकले बिना महीनों तक ऑनलाईन जिंदगी जीते रहते हैं, मशीनी चिडिय़ा पाल लेते हैं, मशीनी कुत्ता पाल लेते हैं, और उनके लिए समाज की शक्ल में सिर्फ सोशल मीडिया पर उनके दोस्त बच जाते हैं, जिनमें से अधिकतर से वे कभी मिले भी नहीं रहते।
अभी अमरीका में जिस नौजवान ने अपनी फोन से ऐसी शादी की है, उसने दुनिया भर के फोन-गुलामों के खतरों की तरफ ध्यान खींचा है कि किस तरह लोग अपनी असल जिंदगी से कटकर अपने उपकरणों से ही शादी के बंधन में बंध बैठे हैं। लोग पहले कहते थे कि फलां लड़का या लड़की, आदमी या औरत, अपनी नौकरी से शादी कर बैठे हैं, और उससे परे उनकी जिंदगी बहुत कम रह गई है। अब तो नौकरी भी सौतिया डाह से दम तोड़ सकती है, क्योंकि लोग आमतौर पर अपने फोन से शादी कर बैठे हैं। अमरीका में इसका खुला समारोह हुआ है, लेकिन भारत जैसे बहुत से देशों में लोग बिना समारोह भी ऐसी जिंदगी में दाखिल हो चुके हैं। आज हाल यह है कि बहुत से लोग बीवी के बिना तो जीने तैयार हो जाएंगे, फोन के बिना वे नहीं जी सकते।
समाजविज्ञान और इंसानी-मानसिकता के विशेषज्ञों को लोगों की इस बदली हुई सोच पर सोचने का मौका भी नहीं मिल रहा है, क्योंकि किसी तरह की रिसर्च में वक्त लगता है, और तब तक इंसान इस कुएं में और गहरे कैदी हो चुके रहते हैं। लेकिन आज इस मुद्दे पर यहां लिखने का मकसद यह है कि फोन के नए मॉडल तो हर कुछ महीने में मिलते रहेंगे, परिवार के लोग एक बार छूट गए, तो फिर जुड़ नहीं पाएंगे। इसलिए लोगों को टेक्नॉलॉजी से परे, फोन जैसे उपकरणों से परे, अपनी असल जिंदगी के इंसानी-दायरे के बारे में भी सोचना चाहिए। 

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