रियायती रसोई गैस, हिन्दुस्तानी महिला की जिंदगी में क्रांति...

संपादकीय
4 जून  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बड़ी महत्वाकांक्षी योजना शुरू की है जिसके तहत देश की पांच करोड़ महिलाओं को रियायती रसोई गैस कनेक्शन दिए जाएंगे। आज देश भर में 27 करोड़ गैस-ग्राहक हैं, और इनमें से एक करोड़ ने खुद होकर रसोई गैस रियायत लौटा दी है। इतने ग्राहकों के लिए आज करीब 16 हजार डीलर हैं, और अब केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कहा है कि सरकार इस साल 10 हजार नए रसोई गैस डीलर नियुक्त करने जा रही है। इन आंकड़ों को बारीकी से देखें, तो लगता है कि देश की तस्वीर बदलने जा रही है। आजादी के बाद से अब तक जितने गैस कनेक्शन रसोई में थे, उनमें करीब 20 फीसदी की बढ़ोत्तरी अगले दो बरसों में करने की तैयारी है। और ये 20 फीसदी घर-परिवार ऐसे हैं जो कि गरीब हैं, और जहां पर महिला लकड़ी या कोयले के चूल्हे पर खाना पकाते हुए छोटे से दड़बे जैसे किचन में अपनी और बच्चों की सेहत को भी खतरे में डालती थी, डालती है, और पर्यावरण में भी इसके धुएं से भारी प्रदूषण फैलता है।
हम देश में पांच करोड़ ऐसे कनेक्शनों के बाद पांच करोड़ चूल्हों से धुआं घटने की कल्पना करें, तो हम एक साफ हवा वाले देश की कल्पना भी कर सकते हैं। पूरी तरह साफ न सही, लेकिन कम जहरीली हवा। अकेले छत्तीसगढ़ में अगले दो बरस में 25 लाख ऐसे गैस कनेक्शन देने की घोषणा हुई है, और सरकार ने गैस कंपनियों को कहा है कि जहां-जहां डीलरशिप के लिए जगह न मिले, सरकारी राशन दुकानों से ही गैस कनेक्शन देना शुरू कर दिया जाए। हम इसे देश की महिला-सेहत के लिए सबसे क्रांतिकारी फैसला और कार्रवाई मानते हैं, और अगर केन्द्र और राज्य सरकारें इसे कामयाब करना तय कर लें, तो भारतीय महिला की औसत उम्र भी कुछ तो बढ़ ही जाएगी।
इस पर आज लिखने का एक मकसद तो यह है कि हमें पढऩे वाले जिन लोगों की जिंदगी में रसोई गैस पहले से है, और जिन्होंने बरसों से चूल्हे का धुआं झेला नहीं है, उन्हें भी इस अहमियत वाले फैसले का वजन समझ में आए। दूसरा मकसद यह है कि इससे जुड़े हुए छोटे-छोटे बहुत से ऐसे कारोबार शुरू हो सकते हैं जिसके लिए राज्य सरकारों को कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण देना चाहिए। इतने गैस चूल्हे बढ़ेंगे, इतने सिलेंडर बढ़ेंगे, तो इनकी मरम्मत का कुछ न कुछ काम तो बढ़ेगा। फिर जो नए लोग इन चूल्हों का इस्तेमाल करेंगे उन्हें मदद की, सुधार की जरूरत भी कुछ अधिक पड़ेगी। इसलिए राज्य सरकार को चाहिए कि हर इलाके के कुछ लोगों को गैस चूल्हा मरम्मत का काम सिखाए। यह बड़ा छोटा सा और आसान हुनर रहेगा, लेकिन इसकी जरूरत बहुत पड़ेगी।
लगे हाथों हम अपनी एक पुरानी सलाह को भी दुहराना चाहेंगे। गैस रियायत पर  नजर रखना राज्य सरकारों का जिम्मा है। हम छत्तीसगढ़ में ही यह देखते हैं कि किस तरह होटल और बाकी कारोबार, कारखाने और कारों के लिए किस तरह रियायती रसोई गैस का इस्तेमाल होता है, और सरकारी रियायत की इस चोरी को रोकने में राज्य के सरकारी अमले की अधिक दिलचस्पी नहीं रहती है, क्योंकि यह रियायत राज्य की जेब से सीधे नहीं जाती है। राज्य सरकारों को हमारी सलाह है कि रियायती रसोई गैस के बेजा इस्तेमाल के खिलाफ बनाए गए नियम-कानून का बहुत कड़ाई से इस्तेमाल करते हुए इस पर निगरानी भी रखे, और केन्द्र सरकार की रियायत बचाने में मदद करे। पांच करोड़ नए परिवारों को रियायती गैस देना सरकार पर एक बोझ भी रहेगा, और हमारा मानना है कि राज्य सरकारें अगर अपने-अपने प्रदेशों में इसकी चोरी रोक सकेंगी, तो केन्द्र सरकार के पास पांच करोड़ के बाद भी और परिवारों को यह सहूलियत देने का मौका जुट सकेगा।

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