बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार

6 जून 2016

स्विटरजरलैंड कल एक जनमतसंग्रह हुआ जिसमें लोगों से पूछा गया कि क्या हर नागरिक को जिंदा रहने के लिए जरूरी मदद सरकार की तरफ से की जाए ताकि वे कोई काम करना चाहें तो करें, या बिना काम किए भी रह सकें। ऐसी सोच के पीछे वे लोग थे जो यह सोचते हैं कि बहुत से लोग जिंदा रहने की मजबूरी अपनी पसंद के काम नहीं कर पाते और समाज में अपनी सबसे बड़ी खूबियों के मुताबिक योगदान नहीं कर पाते।
दुनिया के सबसे संपन्न देशों में से एक स्विटजरलैंड में योरप के बाकी कुछ देशों की तरह अब मशीनें बहुत सा काम करने लगी हैं, और लोग एक तरफ तो हफ्ते में काम के दिन घटाने में लगे हैं, और दूसरी तरफ रोजगार भी घटते चले जा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था को देखें तो उसकी उत्पादकता में मशीनों का योगदान बढ़ते चल रहा है, और मशीनें कमा रही हैं, और इंसान खा रहे हैं, ऐसे एक दिन की तरफ विकसित और औद्योगिक दुनिया बढ़ती चल रही है।
इसलिए स्विटजरलैंड में कुछ लोगों ने यह राय सामने रखी थी कि सरकार अगर सबको बराबरी से एक न्यूनतम रिहायशी भत्ता देगी, तो लोग अपनी पसंद के काम कर सकेंगे। लेकिन स्विटजरलैंड की सरकार और वहां की सारी राजनीतिक पार्टियां इसके खिलाफ थीं, और लोगों से अपील की गई थी कि इस प्रस्ताव के खिलाफ वोट डालें, नतीजा यह निकला कि यह प्रस्ताव खारिज ही हो गया। इस प्रस्ताव को कुछ लोगों ने एक कम्युनिस्ट या माक्र्सवादी सोच बताया।
यह बात सही है कि ऐसे एक न्यूनतम और बराबर गुजारा-भत्ते की सोच माक्र्सवादी लगती है ताकि समाज में हर कोई कम से कम एक न्यूनतम कमाई तो पा ही ले, और फिर जिंदा रहने के दबाव से परे जाकर अपनी मर्जी का काम कर सके। आज हम अपने आसपास देखते हैं कि बहुत से लोग सामाजिक मोर्चों पर काम करना चाहते हैं, राजनीतिक आंदोलनों में हिस्सा लेना चाहते हैं, पर्यावरण या पशु-पक्षियों के लिए कुछ करना चाहते हैं, कला या संगीत में जीना चाहते हैं, लेकिन जिंदा रहने की जरूरतें उन्हें काम के लिए मजबूर करती हैं, ऐसे कामों के लिए, जिनसे कि कमाई हो सके।
दुनिया के इतिहास में हिप्पियों सहित बहुत से ऐसे समुदाय रहे जिन्होंने समय-समय पर अपने कम्यून बनाए, और उनके भीतर वे बराबरी से रहे। अभी पिछले बरस ही पश्चिमी दुनिया में किसी जगह ऐसी ही एक कम्यून की तस्वीरों सहित रिपोर्ट आई थी, और उसमें शामिल होने के लिए हजारों लोग कतार में लगे हुए हैं यह बात भी उस रिपोर्ट में थी। लेकिन ऐसे कम्यून कई बार किसी एक आध्यात्मिक या किसी और तरह के गुरू के मातहत रहने और जीने वाले लोगों का एक जमावड़ा बनकर रह जाता है जहां पर उन्मुक्त सेक्स भी कभी-कभी एक जीवनशैली रहता है, और कभी-कभी ऐसे कम्यून तलवार के ढांचे को कुचलकर बनते हैं जहां पर सभी का बराबरी का हक हो, और जहां होने वाले बच्चों की सभी पर बराबर की जिम्मेदारी हो।
दिक्कत यह है कि ऐसे कम्यून के भीतर अधिकारों और जिम्मेदारियों का जो ढांचा रहता है, वह उसके देश के नियम-कायदों से मेल नहीं खाता, और किसी टकराव की हालत में ऐसे कम्यून के भीतर की व्यवस्था कानून की नजर में कोई दर्जा नहीं रहती। लोगों ने अभी चार दिन पहले ही भारत के उत्तरप्रदेश में मथुरा में एक ऐसे समुदाय से जुड़ी तबाही देखी है जो कि एक मुखिया के मातहत देश-प्रदेश के कानूनों को चुनौती देते हुए अपने आपमें एक साम्राज्य की तरह जी रहा था, और जिसने कानून पर बुरी तरह हमला भी किया।
यह कम्यून की बात स्विटजरलैंड के ताजा जनमतसंग्रह से कुछ अलग किस्म की भी है, लेकिन जब बराबरी के दर्जे की बात आती है, तो जिस तरह के कम्यून माक्र्सवादी विचारधारा को मानते हुए भी बनते और चलते हैं, वे भी बराबरी की कमाई की सोच पर टिके रहते हैं। इसलिए अगर किसी देश में संपन्नता या अतिसंपन्नता के चलते देश को ही एक ऐसा कम्यून बनाने की सोच उठी है जहां पर कि हर किसी को जिंदगी चलाने के न्यूनतम खर्चे सरकार की तरफ से दिए जाएं ताकि वे अपनी पसंद का काम कर सकें, तो यह बात भी बराबरी पर आधारित एक समुदाय की सोच है, जिसे कि स्विस नागरिकों ने सिरे से ही नकार दिया।
इस सोच का दूसरा पहलू यह है कि सरकार जनता के न्यूनतम खर्चों का बोझ उठाए। सोच का इतना हिस्सा तो भारत में जगह-जगह देखने मिलता है। केन्द्र सरकार भी गरीबों के लिए सौ किस्म की अलग-अलग रियायतें देती है, और राज्य सरकारें भी अपने खजाने से गरीबों की मदद करती हैं। इस मामले में एक तरफ तो तमिलनाडू जैसे राज्य सबसे आगे है जहां मुख्यमंत्री जयललिता हर किसी को लगभग मुफ्त रियायती खाना देती हैं, रियायती पानी, रियायती दवाएं, और मुफ्त के मंगलसूत्र जैसी कई और चीजें भी। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में करीब आधी आबादी को सरकार एक दिन की मजदूरी से भी कम पर पूरे परिवार का महीने भर का चावल देती है, मुफ्त की बिजली, मुफ्त की साइकिलें, और पढ़ाई का इंतजाम भी छत्तीसगढ़ में है, और देश के कई दूसरे राज्यों में भी।
लेकिन भारत जैसे देश में सरकारी रियायतें आमतौर पर गरीबों के जिंदा रहने के लिए मदद हैं। एक संपन्न दुनिया में लोगों को जिंदा रहने की कमाई हासिल रहने पर भी उन्हें एक बराबरी का गुजारा-भत्ता देना एक अलग सोच है कि वे अपनी मर्जी के काम कर सकें। भारत में आज ऐसी सोच के बारे में सोचना कुछ मुश्किल है क्योंकि अधिकतर लोग जिंदगी के एक संघर्ष में लगे हैं, और यहां पर मशीनों ने अभी इंसानों को राहत देना, या बेरोजगार करना उस हद तक शुरू नहीं किया है। फिर देश की संपन्नता अभी ऐसे किसी किनारे पर पहुंची भी नहीं है कि तमाम लोगों को जिंदा रहने के लिए कोई भत्ता दिया जा सके।
लेकिन स्विटजरलैंड में एक तबके की यह सोच और उस पर जनमतसंग्रह से यह तो पता लगता है कि बहुमत की असहमति रहते हुए भी अल्पमत के विचार पर विचार करना भी कितना महत्वपूर्ण माना जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें