जोगी के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीति का एक रोमांचक रहस्य शुरू

संपादकीय
6 जून  2016
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में आज इतिहास की सबसे बड़ी बगावत हो रही है, जब अपने पार्टी से निष्कासित विधायक बेटे अमित जोगी के साथ जाकर भूतपूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी एक नई पार्टी बनाने के करीब हैं। कांग्रेस को वे छोड़ चुके हैं, वापिसी की संभावना या आशंका से इंकार कर चुके हैं, और ऐसा माना जा रहा है कि अब नई पार्टी महज वक्त की बात है, या हो सकता है कि अगले कुछ घंटों के भीतर जब यह अखबार छप ही रहा होगा, तब तक अजीत जोगी नई पार्टी की घोषणा कर चुके होंगे। फिलहाल आज इस बात पर ही इस वक्त लिखा जा सकता है कि जोगी के बिना कांग्रेस और कांग्रेस के बिना जोगी छत्तीसगढ़ की चुनावी राजनीति में क्या फर्क लाएंगे?
पिछले कई बरस से लगातार यह अटकलबाजी चलती थी कि अजीत जोगी कब एक क्षेत्रीय पार्टी बनाएंगे? कांग्रेस के भीतर अजीत जोगी राज्य के पहले मुख्यमंत्री बनकर भी बेचैन ही थे, और वे बाकी नेताओं के साथ किसी तरह का तालमेल नहीं बिठा पाते थे। लेकिन जोगी के इतिहास पर चर्चा अधिक करेंगे तो यह पन्ना छोटा पड़ेगा, आज उनके वर्तमान और भविष्य पर ही बात सीमित रखना ठीक होगा। जोगी के बारे में आमधारणा से लेकर कांग्रेस के भीतर के आरोप और संगठन के भीतर के सुबूत तक यह बताने वाले रहे कि वे पार्टी के भीतर के अपने उम्मीदवारों को छांट-छांटकर हराने में पीछे नहीं रहे। यह कांग्रेस के लिए कोई अनोखी बात नहीं रही, क्योंकि उसके कई नेता पार्टी के भीतर ऐसा काम करते ही रहते हैं, और इसी के बीच कांग्रेस पार्टी जिंदा भी रहती है। बहुत सी जगहों पर कांग्रेस के बारे में यह कहा जाता है कि वह विरोधियों को तो हरा ले, लेकिन पहले अपने ही नेताओं की साजिशों से तो बच जाए। जोगी के कांग्रेस के बाहर जाने के साथ ही अब उन पर लगने वाली तोहमतों के दिन खत्म हो जाएंगे, और कांग्रेस जोगीमुक्त होकर बाकी नेताओं के हवाले हो जाएगी। इसके बाद प्रदेश को रमनमुक्त करने का कई पार्टियों और कई नेताओं का नारा जोगी पूरा करेंगे, या बाकी कांग्रेस पूरा करेगी, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
फिलहाल प्रदेश इन अटकलों से गर्म है कि जोगी की पार्टी, जिसे कि लोग बन चुका मान रहे हैं, वह कितनी सीटें पाएगी, वह कांग्रेस का नुकसान अधिक करेगी, या भाजपा का, या फिर जोगी अपने प्रभाव की सीटों पर पहले की तरह जीत-हार तय करते रहेंगे? वे कुछ या अधिक सीटें पाकर कांग्रेस और भाजपा के बीच पौन फीसदी वोटों की खाई में किंगमेकर बनेंगे, या आज के अपने नारे के मुताबिक किंग बनेंगे, ये तमाम बातें अभी से लेकर विधानसभा के चुनाव तक जारी रहेंगी। जैसा कि प्रदेश कांग्रेस ने कहा है कि यह एक कांटा था जो निकल गया, तो इसके बाद कांग्रेस अब अपने बिना कांटे वाले पैर के सहारे चुनावी दौर में कितना आगे पहुंच सकती है, यह पूरी तरह कांग्रेस पर खुद पर निर्भर रहेगा। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के लोगों को इस बात का बड़ा खतरा लग रहा है कि कल तक कांग्रेस के भीतर के भीतरघात की वजह से उसे सीटों का जो फायदा होता था, वह न होने से अब क्या होगा?
अजीत जोगी और प्रदेश में बाकी कांग्रेस, किसी सहअस्तित्व के साथ जिंदा रहने के लायक नहीं रह गए थे, और यह अलगाव हो सकता है कि दोनों के लिए बेहतर साबित हो, और चुनौतीपूर्ण साबित हो। इसके साथ-साथ एक बात बड़ी साफ है कि छत्तीसगढ़ में किसी भी पार्टी का कोई नेता अगर क्षेत्रीय दल बनाने की सबसे अधिक ताकत और काबिलीयत रखता है, तो वह अजीत जोगी ही है। और क्षेत्रीय दलों की संभावनाओं को नकार देना एक राजनीतिक अदूरदर्शिता और नासमझी होगी क्योंकि कांग्रेस से अलग होकर शरद पवार एक हकीकत बने हैं, ममता बैनर्जी एक हकीकत बनी हैं, और भी कुछ ऐसी मिसालें होंगी जो कि इस सांस में हमें याद नहीं पड़ रही हैं। छत्तीसगढ़ एक छोटा राज्य है इसलिए एक तीसरी शक्ति, यहां राजनीतिक अस्थिरता का दौर भी ला सकती है, और ऐसी अस्थिरता के भूकंप खड़े करने में अजीत जोगी को महारथ हासिल है। जोगी परिवार कितनी सीटें पा सकता है, कितनी सीटों पर किसी पार्टी को जिता सकता है, और कितनी सीटों पर किस पार्टी को हरा सकता है, यह विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती खत्म होने तक जारी रहने वाला एक रोमांचक रहस्य रहेगा। यह राज्य बनने के बाद से सबसे दिलचस्प नौबत रहेगी, और आने वाले विधानसभा चुनावों में पूरा देश छत्तीसगढ़ को गौर से देखता रहेगा। 

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