एम्बुलेंस हड़ताल से बाहर रखना सरकार का जिम्मा

संपादकीय
8 जून  2016
छत्तीसगढ़ के गांव-शहर सभी जगह रात-दिन दौड़ते दिखने वाली हजारों एम्बुलेंस खड़ी हैं, क्योंकि उनके ड्राइवर और कर्मचारी हड़ताल पर हैं। राज्य सरकार ने एम्बुलेंस सेवा निजी कंपनियों के हवाले कर दी है, और उसका भुगतान करती है। इन निजी कंपनियों के खिलाफ कर्मचारियों की हड़ताल चल रही है, लेकिन सरकार का यह ढांचा चूंकि अब पूरी तरह इन्हीं पर टिक गया है, इसलिए चारों तरफ किसी न किसी की मौत एम्बुलेंस के बिना हो रही है। कहीं नवजात शिशु की निजी गाड़ी में मौत हो रही है, तो कहीं सड़कों पर लोग दम तोड़ते पड़े हैं, और एम्बुलेंस नहीं है।
राज्य सरकार को इस बारे में इसलिए सोचना पड़ेगा कि फायर ब्रिगेड, पुलिस, और एम्बुलेंस जैसी सेवाएं सरकार जिस तरह चाहे उस तरह चलाए, लेकिन इनमें हड़ताल की गुंजाइश नहीं रखी जा सकती। अभी कुछ बरस पहले तक सरकारी एम्बुलेंस ही रहती थीं, लेकिन अब सरकार ने अपनी इस जिम्मेदारी का पूरी तरह निजीकरण कर दिया है, और खुद महज भुगतान कर रही है। अब तक यह इंतजाम कामयाबी से चल रहा था, यह एक अलग बात है कि बीच-बीच में यह सुनाई पड़ता था कि सरकारी अस्पतालों में ले जाने के बजाय एम्बुलेंस कर्मचारी मरीजों और घायलों को निजी अस्पतालों की तरफ मोड़ रहे थे। निजीकरण के साथ ऐसे खतरे बढ़ते ही हैं, और जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में लगे हों, तब महज एम्बुलेंस कर्मचारियों से ईमानदारी की उम्मीद करना कुछ ज्यादती भी होगी।
लेकिन आज का मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं है, यह आपात सेवाओं का मुद्दा है, जिसमें हड़ताल की गुंजाइश नहीं रखी जा सकती। मध्यप्रदेश में राज्य सरकार ने पुलिस की गाडिय़ों का भी निजीकरण कर दिया है, और वहां सड़कों पर आम पुलिस दस्ते भी किराए की चमचमाती महंगी एसयूवी में दिखते हैं। अब कल को अगर ऐसी गाडिय़ों के कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएं, और जनता को पुलिस न मिल पाए तो क्या होगा? इसी तरह कल के दिन सरकार फायर ब्रिगेड का निजीकरण कर दे, और आग की नौबत में कर्मचारी हड़ताल पर चले जाएं, तो क्या होगा? इसलिए अनिवार्य सेवाओं, आपात सेवाओं का निजीकरण करने के साथ-साथ यह इंतजाम भी पुख्ता रखना होगा कि ऐसी किसी हड़ताल से जनता की मौत न आ जाए। हमारा ख्याल तो यह है कि सरकार जब ऐसी आपात सेवाओं का निजीकरण करती है, तो उस निजी कंपनी के कर्मचारियों के काम की शर्तों पर भी सरकार का एक सीधा काबू रहना चाहिए, और सरकार इनके हक का भुगतान सीधे इनके खातों में करने का हक अपने पास रखे। ऐसे इंतजाम कई जगहों पर होते भी हैं जहां ठेका लेने वाली कंपनी कर्मचारियों को भुगतान नहीं करती है। आज भी सरकार के बहुत से विभागों में ठेकेदारों से यह जानकारी मांगी जाती है कि वे मजदूर और कर्मचारी कानूनों के मुताबिक प्रॉविडेंट फंड, कर्मचारी बीमा जैसी जिम्मेदारियों को पूरा कर रहे हैं या नहीं? इसके बाद ही उनका भुगतान होता है। हम अभी इन कर्मचारियों की हड़ताल की बारीकियों पर नहीं जा रहे हैं, लेकिन एम्बुलेंस सेवा को हड़ताल के खतरे से बाहर रखने का पुख्ता इंतजाम राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

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