अमरीकी संसद में गालियों को तालियों में तब्दील करते मोदी

संपादकीय
9 जून  2016
अमरीकी संसद के एक संयुक्त अधिवेशन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सुनना बड़ा दिलचस्प था। यह कार्यक्रम अपने आपमें देखने और सुनने लायक तो था ही, इस कार्यक्रम के पहले के ऐतिहासिक संदर्भों को देखें, तो यह और महत्वपूर्ण लग रहा था। यह वही अमरीकी संसद है जहां के लोगों ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का 2002 के दंगों के बाद लगातार विरोध किया था, और अमरीका आने का वीजा भी नहीं मिलने दिया था। आज भी मोदी का वीजा एक व्यक्ति के रूप में नहीं बना है, एक देश के प्रधानमंत्री के रूप में उन्हें मिला है, और यह ओहदे से जुड़ा हुआ विशेषाधिकार है। भारत में धार्मिक स्वतंत्रता न होने की बात कहते हुए अमरीका के धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने मोदी का वीजा रोककर रखा था, और इतने बरस वे अमरीका जा नहीं पाए थे। नतीजा यह है कि अपने दो बरस पूरे होते-होते प्रधानमंत्री मोदी आधा दर्जन बार अमरीकी राष्ट्रपति से मिल आए हैं।
अमरीकी संसद में उनका भाषण एक गजब के आत्मविश्वास से भरा हुआ था। हमने पहले भी इसी जगह उनके बारे में लिखा है कि जिस नरेन्द्र मोदी ने पूरी जिंदगी कभी केन्द्र सरकार में काम नहीं किया, भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों की कोई जानकारी जिन्हें नहीं थी, जिन्होंने खुद अपनी पार्टी के केन्द्रीय संगठन में कभी ऐसे ओहदे पर काम नहीं किया था जिससे कि विदेशी संबंधों के बारे में कुछ समझने का मौका मिले, वे नरेन्द्र मोदी बिजली कड़कने की रफ्तार से दो बरस के भीतर तीन दर्जन से ज्यादा देशों में हो आए हैं, और अमरीकी राष्ट्रपति को बराक कहकर बुलाने जैसी दोस्ती कायम कर चुके हैं। जिस आत्मविश्वास से उन्होंने अमरीकी संसद में भाषण दिया वह देखने लायक था। अंग्रेजी कभी भी उनकी भाषा नहीं रही, और वे चाहते तो वहां हिन्दी में बोल सकते थे। लेकिन उन्होंने शायद लिखा हुआ अंग्रेजी भाषण टेलीप्रॉम्टर पर पढ़कर इस अंदाज में अमरीकी संसद को सुनाया कि टीवी पर देखने वालों को पल भर को भी यह नहीं लगा कि वे पढ़ रहे हैं। हम उनकी कही हुई बातों पर अधिक चर्चा इसलिए नहीं कर रहे क्योंकि वे तकरीबन उम्मीद के मुताबिक ही थीं, और उन्होंने भारत के बारे में सच से परे भी कुछ ऐसे दावे किए जिनके बारे में अमरीका में सबको यह मालूम है कि भारत में ऐसी बराबरी नहीं है। फिर भी एक देश का प्रधानमंत्री बाहर जाकर अपनी सरकारतले की बदहाली गिनाएगा नहीं।
भारत में बहुत से लोग इस बात को लेकर सोशल मीडिया पर मोदी पर हमला कर रहे हैं कि उनकी अंग्रेजी के कई हिज्जे बहुत खराब थे। हम इस बात को मोदी की एक खूबी मानते हैं कि वे एक नई भाषा को सीखने का कोई अंतरराष्ट्रीय मौका नहीं छोड़ रहे हैं, और उनका यह भरोसा देखने लायक है कि वे अंग्रेजी व्याकरण के शिक्षक नहीं हैं, एक कामयाब जननेता हैं, और अंग्रेजी उनकी मातृभाषा नहीं है, वे उसे सीख रहे हैं। यह आत्मविश्वास जिंदगी में और लोगों को, आम लोगों को भी इस्तेमाल करना चाहिए जो यह मानकर चलते हैं कि टूटी-फूटी अंग्रेजी कहना, या कमजोर उच्चारण में किसी भाषा को कहने से अच्छा है कि उसका इस्तेमाल न करें। मोदी लगातार अपने आपको एक बड़े नेता के रूप में कम से कम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तो स्थापित कर ही रहे हैं। उनके बर्ताव में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संबंधों में प्रचलित औपचारिकता से परे एक बेतकल्लुफी दिखाई पड़ती है और इसी वजह से दुनिया भर के राष्ट्रप्रमुखों से उनके निजी संबंध बनते जा रहे हैं।
हम आज यहां पर उनकी विदेश नीति से देश को अब तक हुए, या आगे होते दिख रहे नफे-नुकसान का विश्लेषण नहीं कर रहे हैं, लेकिन मोदी ने दुनिया के साथ भारत के संबंधों को एक किस्म से मथकर रख दिया है। और यह बात इसलिए बड़ी हैरान करने वाली है कि मोदी का ऐसे विदेशी मोर्चे से कभी कोई लेना-देना नहीं था। आज भारत की विदेश नीति के विश्लेषकों का यह मानना है कि मोदी अंतरराष्ट्रीय संबंधों में खतरे की हद तक रोमांचक दांव लगा रहे हैं, और उनके इन दो बरसों के कार्यकाल की सबसे बड़ी कामयाबी यही मोर्चा रहा है। उनके कुछ घरेलू आलोचक यह भी कहते हैं कि तीन बरस बाद के आम चुनाव में अंतरराष्ट्रीय संबंध मोदी को राष्ट्रीय वोट नहीं दिला पाएंगे, लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत के टीवी-दर्शक मतदाताओं का एक बड़ा तबका विदेश यात्राओं में मोदी का माहौल देखकर बड़ा प्रभावित है और यह असर चुनाव तक जारी और कायम रह सकता है। फिलहाल ऐसे कोई संकेत नहीं है कि मोदी के विदेश प्रवासों से भारत का कोई नुकसान हुआ हो, और यह भी है कि जितने वक्त वे दूसरे देशों में व्यस्त रहते हैं, केन्द्र सरकार के मंत्रियों और अफसरों को चैन से सोने का मौका भी मिलता है।
फिलहाल अमरीकी संसद में मोदी के भाषण को बड़ी गर्मजोशी से सुना गया, और उस पर वहां की परंपरा के मुताबिक जमकर तालियां भी बजीं। किसी तरह का प्रतीकात्मक विरोध भी मोदी को गुजरात दंगों को लेकर नहीं झेलना पड़ा, और यह बात भी एक छोटी-मोटी कूटनीतिक कामयाबी ही है। जिस अमरीकी संसद में मोदी को गालियां दी जाती थीं, वहां उन्हें अब तालियां मिलीं, यह एक बड़ा अनोखा नजारा था। राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल का यह शायद मोदी का आखिरी अमरीका प्रवास था, और अगले बरस आने वाले नए अमरीकी राष्ट्रपति के सामने दोनों देशों के मजबूत रिश्तों की एक नींव रहेगी, जिसे अनदेखा करना उसके लिए आसान नहीं रहेगा। 

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