बुरा वक्त भला बना देता है

27 जून 2016

वक्त बहुत से लोगों को बदल देता है। इसीलिए बड़े बुजुर्ग कह गए हैं कि हालात से खयालात बदलते हैं। अब सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा को ही लें, तो अभी उन्होंने भाजपा के नए-ताजे राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी के एक बयान को लेकर एकदम बागी तेवरों के साथ समाजवादी बात की है।
खबरों के मुताबिक-रॉबर्ट वाड्रा ने भारतीय जनता पार्टी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पर पलटवार करते हुए उन्हें ध्यान खींचने वाला और वर्गवादी करार दिया है। वाड्रा ने यह टिप्पणी स्वामी के उस बयान के बाद की है, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री को सलाह देते हुए भारतीय मंत्रियों के विदेश प्रवास पर पोशाक-शैली तय करने को कहा था। उन्होंने कहा था, जो मंत्री कोट और टाई पहनते हैं वे वेटर जैसे दिखते हैं। विदेश यात्रा के दौरान मंत्रियों को पारंपरिक और आधुनिक भारतीय परिधान पहनने चाहिए।
फेसबुक पोस्ट पर वाड्रा ने लिखा, तो क्या वेटरों की कोई इज्जत नहीं होती। उन्होंने लिखा, ध्यान आकर्षित करने के लिए किया गया स्वामी का यह बयान वेटरों का अपमान करता है, जो जीने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। वेटरों के लिए यह बयान अपमानजनक और दुखद हैं।
अब अधिक अरसा नहीं हुआ है जब सोनिया गांधी की पार्टी का देश पर राज था, और बड़े संदिग्ध किस्म के जमीनी कारोबार को लेकर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ मीडिया में बहुत सी बातें सामने आई थीं, और उन पर बौखलाकर वाड्रा ने फेसबुक पर भारतीय लोकतंत्र के आम लोगों के लिए मैंगो पीपुल ऑफ बनाना रिपब्लिक कहा था। जिस देश में लोकतंत्र नाम और ढकोसले का ही लोकतंत्र होता है, और हकीकत में वह नहीं होता, वैसे लोकतंत्र को बनाना-रिपब्लिक कहा जाता है, और भारतीय लोकतंत्र में सबसे अधिक महत्व की रियायतें पाने वाले अकेले नागरिक रॉबर्ट वाड्रा ने इसी लोकतंत्र पर थूकते हुए यहां के आम लोगों को मैंगो-पीपुल कहकर उनका मजाक उड़ाया था। ऑलीशान जिंदगी की नुमाइश करते हुए जीने वाले रॉबर्ट वाड्रा की सोच अब स्वामी को जवाब देते हुए एकदम क्रांतिकारी हो गई दिखती है। उन्हें एकाएक इन्हीं हिन्दुस्तानी मैंगो-पीपुल के बीच के मेहनत करने वाले वेटरों की इज्जत का भी ख्याल हो आया।
जो लोग सोशल मीडिया पर सुब्रमण्यम स्वामी को लगातार देखते हैं वे जानते हैं कि स्वामी शायद किसी अदालती कार्रवाई से बचते हुए अपने हमले जारी रखने के लिए सोनिया गांधी का नाम लिए बिना उनके लिए लगातार ताड़का (राक्षसी) और राहुल के लिए लगातार बुद्धू शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। वे कई सुबूतों को लेकर जयललिता से लेकर नेशनल हेराल्ड के केस तक अदालतों में अपने विरोधियों की फजीहत भी कर चुके हैं, और अपने घर की दीवार पर उन्होंने ताजा ट्रॉफी आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन की लगा रखी है। लेकिन वे सोनिया परिवार के विदेशी कारोबार, विदेशी सौदों, विदेशी रिश्तेदारों और विदेश भाग जाने की अटकलों वाली ट्वीट करते ही रहते हैं। हो सकता है कि बैठे-ठाले रॉबर्ट वाड्रा को स्वामी की ऐसी ही बातों की वजह से वेटरों के लिए हमदर्दी उमड़ी, और उन्होंने स्वामी के बयान को वर्गवादी कहते हुए मेहनत के पेशे के सम्मान की वकालत की।
अगर स्वामी और सोनिया परिवार के बीच की निजी कड़वाहट को छोड़ दें, तो देश में मेहनत के पेशों को आज भी उसी हिकारत से देखा जाता है जिस हिकारत से मनुवादी जाति व्यवस्था में मेहनत करने वालों को शूद्र का दर्जा देकर समाज व्यवस्था में पांव के तलुओं तले रखा गया था। आज भी संपन्न, शहरी, शिक्षित, और सवर्ण तबकों की बातचीत में पैदल चलने वालों को सड़कछाप, आम जुबान बोलने वालों को फुटपाथी, झगडऩे वालों को नल पर झगडऩे वालों जैसा कहा जाता है, मानो कि महंगे क्लबों में दारू पीने के बाद कोई झगड़े ही नहीं होते। जब लोग एक-दूसरे के अपमान पर उतारू होते हैं, तो एक-दूसरे को फल्ली वाले जैसी जुबान वाला कहते हैं, गरीब होने पर उसे दो टके का कहते हैं, भले ही वह बिकाऊ न हो। हजारों बरस से चली आ रही सोच और सैकड़ों बरस से चली आ रही कहावतों को देखें, तो उनमें सामाजिक बेइंसाफी ठूंस-ठूंसकर भरी हुई दिखती है। गरीबी एक जुर्म दिखता है, जाति को नीचता से या महानता से जोड़ा हुआ दिखता है, औरत महज अपमान का सामान दिखती है, सारे के सारे पशु-पक्षी और मछलियों से लेकर कीट-पतंगों तक को गाली का सामान मान लिया जाता है। शारीरिक तकलीफों वाले तमाम लोगों को गालियों की तरह इस्तेमाल किया जाता है, और लोगों को बद्दुआ देने के लिए उनका इस्तेमाल होता है।
लोग किसी के रूप-रंग को, बीमारी को, विकलांगता को, या कि जुबान की लडख़ड़ाहट तब तक गालियों की शक्ल में इस्तेमाल करते हैं, जब तक कि उनके खुद के परिवार में ऐसा कोई न आ जाए। जब घर पर इनमें से किसी किस्म का कोई हो, तभी जाकर इंसानों को अपनी जुबान सम्हालने की समझ आती है। और फिर गरीबी का मखौल, कमजोरी का मखौल, बुरे दिनों का मजाक उड़ाना यह सब तब तक जारी रहता है जब तक कि लोग खुद बुरे वक्त के अंधड़ में घिर नहीं जाते।
ऐसी ही सोच के तहत आम लोगों का मखौल उड़ाते हुए रॉबर्ट वाड्रा उन्हें मैंगो-पीपुल कहते हैं, और सुब्रमण्यम स्वामी वेटरों की पोशाक को अपमान मानकर चलते हैं। इस देश को अपने तंगनजरिए से निकलना होगा, और अपनी जुबान को, अपनी सोच को तंगदिली से बाहर लाना होगा।

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