उत्तरप्रदेश के हाईवे पर हुई लूट-रेप के पीछे की वजहें

संपादकीय
31 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश की सड़क पर बीती रात हुए एक जुर्म से देश भर में एक नए तरह का खतरा दिखाई पड़ता है, और सफर करने वाले लोगों का हौसला इस जुर्म से पस्त हो जाना तय है। एक परिवार कार से जा रहा था, उसे सड़क पर लोहा फेंककर रोका गया, और फिर दर्जन भर हथियारबंद लुटेरों ने परिवार के लोगों को बंधक बनाकर लूटा और महिलाओं से बलात्कार किया। उत्तरप्रदेश और बिहार जुर्म को लेकर कुछ अधिक बदनाम राज्य हैं, लेकिन लूट और बलात्कार तो देश के हर प्रदेश में होते हैं, कहीं कम, कहीं अधिक। और लोग परिवार सहित सड़क के रास्ते सफर भी पूरे देश में करते हैं, और कई जगहों पर तो लड़कियां भी दुपहियों पर अकेले लंबे सफर पर निकल जाती हैं। अगर किसी जगह दर्जन भर हथियारबंद इक_े होते ऐसा जुर्म कर सकते हैं, तो बाकी जगहों पर ऐसा न होने की कोई वजह तो है नहीं।
भारत में आंतरिक खतरा समझे जाने वाले आतंकी संगठनों से निपटने की तैयारी तो बहुत चलती है, लेकिन छोटे-छोटे गिरोह या अकेले मुजरिम जिस तरह के जुर्म करते हैं, उनसे निपटना केन्द्र सरकार के दायरे में नहीं आता। और प्रदेश की पुलिस को ही ऐसे मुजरिमों पर काबू करना पड़ता है। आज इस मामले पर लिखने की जरूरत इसलिए भी हो रही है कि सुबह से उत्तरप्रदेश के एक मंत्री की एक टेलीफोन-रिकॉर्डिंग टीवी पर चल रही है कि वे किस तरह जिला पंचायत के प्रमुख अधिकारी को फोन पर मां-बहन की गालियां देते हुए धमका रहे हैं। अब यह तो उस अफसर ने इस कॉल की रिकॉर्डिंग कर ली, तो आज उसके हाथ मंत्री के खिलाफ एक सुबूत है, वरना कोई अफसर किसी मंत्री का क्या बिगाड़ सकते हैं? ऐसे में उत्तरप्रदेश अपनी पुलिस पर राजनीतिक दबाव के लिए बदनाम राज्य है, और ऐसा हाल देश के और भी बहुत से प्रदेशों में हो सकता है। जाहिर है कि ऐसे दबावतले काम करने वाली पुलिस अच्छा काम नहीं कर सकती, और उसके इलाके में तरह-तरह के जुर्म होना, उनका बढऩा तय है। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हरियाणा के जाट आंदोलन के दौरान सड़कों पर हुई बड़ी भयानक हिंसा, और सामूहिक बलात्कार की जांच रिपोर्ट सामने आई थी, और उसमें देश के एक बड़े प्रमुख और साख वाले रिटायर्ड पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने खुलकर लिखा था कि किस तरह हिंसा को रोकने के बजाय पुलिस के अफसर घर बैठ गए थे, मौका छोड़कर भाग गए थे।
जहां-जहां पुलिस को राजनीतिक दबाव में चुनिंदा मुजरिमों को छोडऩा पड़ता है, और कई तरह के जुर्म से आंखें मूंदनी पड़ती हैं, वहां पर पुलिस अपनी पसंद के कुछ मुजरिमों को छोड़कर भी उनसे कमाई करने लगती है। जब गोमुख से ही गंदगी बहकर निकलती है, तो गंगा में नीचे साफ पानी नहीं आ सकता। जब प्रदेश की राजनीतिक ताकतें पुलिस को उगाही और कमाई, गुंडागर्दी और धाक का औजार बनाकर चलती हैं, तो वैसे प्रदेशों में, वैसे इलाकों में आम जुर्म पर काबू खत्म होने लगता है। भारत में पिछले कई दशकों से पुलिस सुधार को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर तैयार रिपोर्ट धूल खाते पड़ी हैं, लेकिन उन पर अमल का राजनीतिक साहस नेताओं में नहीं रहता। पुलिस अगर ईमानदारी से काम करने लगे, तो नेताओं के, सत्तारूढ़-साम्प्रदायिक लोगों के पसंदीदा गुंडों को कौन बचाएगा? इसलिए देश में राजनीतिक ताकतें पुलिस की रीढ़ की हड्डी निकालकर रखना पसंद करती हैं, और इसीलिए जगह-जगह मुजरिमों का बोलबाला रहता है, और आम लोग तरह-तरह के जुर्म के शिकार होते हैं।

अमरीका के कहने के बाद तो अपनी असहिष्णुता देखें

संपादकीय
30 जुलाई  2016
अमरीकी सरकार ने भारत से कहा है कि वह अपने देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता पर काबू करने की कोशिश करे। अमरीकी विदेश विभाग के प्रवक्ता से यह सवाल पूछा गया था कि भारत में जिस तरह से गोमांस और गाय से जुड़े हुए मुद्दों पर हिंसा हो रही है उस पर अमरीका का क्या कहना है? इस पर अमरीका ने कहा कि हिंसा और असहिष्णुता की खबरों से वह फिक्रमंद है, और भारत और अमरीका दोनों के हितों में भारत में सहिष्णुता बढ़ाने के लिए अमरीका मदद करने को तैयार है।
भारतीय मीडिया में लगातार पिछले दो बरस से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस बारे में आगाह किया जा रहा है कि देश में असहिष्णुता बढ़ती जा रही है और इसके पीछे मोदी के ही साथी, और साथी-संगठन जिम्मेदार हैं, लेकिन प्रधानमंत्री ने अब तक दर्जन भर बार अपने मन की बात रेडियो-टीवी पर तो बोली, लेकिन इन घटनाओं के बारे में उन्होंने मुंह भी नहीं खोला है और इसे लेकर दुनिया हैरान भी है। जिन हिंसक हमलों को लेकर भारत के लोगों का दिल दहला हुआ है, और भारत में लगातार एक धार्मिक और सामाजिक करार गहरी और चौड़ी होती जा रही है, उस बारे में प्रधानमंत्री का कुछ भी न कहना उतना ही फिक्रमंद है जितना कि हिंसा की ये घटनाएं हैं। ऐसे में अमरीका ने चाहे एक सवाल के जवाब में यह बात कही हो, लेकिन यह बात कोई दबी-छुपी नहीं है कि भारत में बढ़ती हुई धर्मान्धता, और हिंसा-नफरत को बाकी देश भी गौर से देख रहे हैं, और हैरान भी हो रहे हैं।
हम खुद दर्जन भर बार इसी जगह पर लिख चुके हैं कि मुट्ठी भर लोगों के सनातनी-पवित्रतावादी खानपान को लेकर बाकी देश पर इस तरह की बंदिशें लादना अलोकतांत्रिक तो है ही, जिस तरह से भाजपा के राज वाले राज्यों में गौरक्षा के नाम पर हमलावर हिन्दू तबका कानून अपने हाथ में लेकर सड़कों पर कैमरों के सामने हिंसा कर रहा है, उससे पूरा देश हिला हुआ है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अमरीका से बड़ी मित्रता है, और इसलिए यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अब अमरीकी विदेश विभाग के कहने के बाद शायद भारत इस हिंसा को गंभीरता से लेगा। फिलहाल हम इस बात को याद दिलाना जरूरी समझते हैं कि गाय-भैंस के मांस से, उनकी खाल और हड्डियों से, देश की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है, और यह हिस्सा सिर्फ मुस्लिम या सिर्फ अल्पसंख्यकों का नहीं है, इसमें दलित, आदिवासी, और हिन्दू समाज के भी कई तबके शामिल हैं, और इससे देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो रही है, और देश में एक बड़ा विभाजन खड़ा हो रहा है।

ऐसे गोल्डन बाबाओं की हिफाजत पुलिस क्यों करे?

संपादकीय
29 जुलाई  2016
दो दिन पहले ही कई तस्वीरों के साथ एक खबर आई थी कि किस तरह गोल्डन बाबा नाम का साधू बना हुआ एक आदमी कांवर यात्रा कर रहा है, जो कि कई किलो सोने से लदा हुआ भी है। आज सुबह टीवी पर खबर थी कि इसके कई किलो सोने की हिफाजत के लिए राज्य की पुलिस का एक दस्ता इसके साथ चल रहा है, और जब इसने किसी सुरक्षित जगह पर ठहरने से मना कर दिया, तो पुलिस इसके लश्कर के साथ ही सो रही है।
इस गरीब देश में जहां पर कैदियों को जेल से अस्पताल या अदालत तक ले जाने के लिए पुलिस नसीब नहीं हो पाती, और वे बिना सुनवाई या बिना इलाज के जेलों में बंद पड़े रहते हैं, जहां पर गरीबों पर हुए जुर्म के मामलों की जांच बरसों तक नहीं हो पाती क्योंकि इन गरीबों की कोई ताकत नहीं होती है कि वे जांच को तेज करवा सकें, ऐसे देश में पुलिस की फिजूलखर्ची देखने लायक है। हमारे कहने का मतलब पुलिस का किया हुआ खर्च नहीं है, बल्कि जिस तरह से गैरजरूरी बातों पर पुलिस को खर्च किया जाता है, वह भयानक है। नेताओं और अफसरों के बंगलों पर अनगिनत पुलिस की तैनाती तो आम बात है ही, वहां पर तैनात सिपाहियों का मनोबल तोडऩे के लिए उनसे कपड़े भी धुलवाए जाते हैं, और कुत्ते घुमवाए जाते हैं। लेकिन आए दिन सड़कों पर तरह-तरह के अराजक जुलूस के लिए, गैरजरूरी और तंगदिल, तंगनजरिए के राजनीतिक आंदोलनों के लिए पुलिस को जिस तरह से झोंका जाता है, उससे लगता है कि अदालत को भारत के सार्वजनिक जीवन में अराजकता रोकने के लिए दखल देना चाहिए। जुलूस को लेकर, शहरों को बंद करवाने को लेकर, सड़कों पर हथियार लेकर चलने को लेकर कई किस्म के अदालती हुक्म बरसों से आकर लागू हैं, लेकिन उनका कोई इस्तेमाल कोई सरकार करना नहीं चाहती। नतीजा यह है कि पुलिस अपने बुनियादी काम को छोड़कर लोगों के शक्ति प्रदर्शन के इंतजाम में लगी रहती है, और इस पुलिस का तमाम खर्च इस देश की गरीब जनता की जेब से ही निकलता है।
हम छत्तीसगढ़ में ही लगातार होने वाले ऐसे राजनीतिक प्रदर्शन देखते हैं जिनमें पुलिस पुतलों की आग बुझाने के लिए बाल्टी और बोतलों में पानी लिए हुए तैनात रहती है, मानो किसी पुतले को नहीं, किसी जिंदा को जलाया जाने वाला है। इसी तरह बात-बात में कभी विधानसभा घेरने के लिए एक मुनादी होती है, तो शहर की तमाम सड़कों को खोदकर रास्तों को बंद कर दिया जाता है, और आम लोगों की जिंदगी को निलंबित कर दिया जाता है। ऐसे तमाम इंतजाम में इतनी बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती होती है कि बाकी सारे मामले धरे रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि मुजरिम पकड़ाते नहीं, अदालत में मामले जाते नहीं, जांच मजबूत हो नहीं पाती, और अपराधियों के छूट जाने का खतरा बढ़ते चले जाता है। ऐसे में जाहिर है कि जो पुलिस वर्दी में सामने दिखती है, उसके लिए लोगों के मन में हिकारत पैदा होती है।
आज धार्मिक पाखंडियों के लिए पुलिस की जितनी तैनाती होती है, उसे देखें तो लगता है कि जिसने संसार छोड़कर साधू बनना तय किया है, उसका कई किलो सोना पहनना कहां से जायज है? और अगर उसे अपने संन्यास के खिलाफ जाकर ऐसा करने का शौक है, तो उसकी हिफाजत के लिए पुलिस क्यों झोंकी जाए? जिसके पास ऐसे करोड़ों रुपये बर्बाद करने को हों, और जिसके सैकड़ों भक्त साथ चलते हों, वह चाहे तो खर्च करके अपने अंगरक्षक भाड़े पर ले, या फिर उस भगवान के भरोसे चले जिसका नाम लेकर वह ऐसा धंधा चला रहा है। बात-बात पर पुलिस को झोंकना पुलिस के हौसले को पस्त करना है, और उसे पेशेवर खूबियों से दूर करना भी है।

...अमरीकी का वोट इस बार पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा

संपादकीय
28 जुलाई  2016
अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने हिन्दुस्तानी समय के मुताबिक आज सुबह अपनी पार्टी के राजनीतिक सम्मेलन में भारी गर्मजोशी के माहौल में जिस दरियादिली के साथ पार्टी की अगली राष्ट्रपति-प्रत्याशी हिलेरी क्लिंटन की तारीफ की, वह देखने लायक था। हिन्दुस्तान की राजनीति में कभी यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि कोई प्रधानमंत्री अगले चुनाव के पहले अपनी पार्टी के किसी और नेता की ऐसी तारीफ करे और इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह है कि हिन्दुस्तान में लोग मरने तक प्रधानमंत्री रह सकते हैं, कई लोग रहे भी हैं। जबकि अमरीकी कानून के मुताबिक वहां एक राष्ट्रपति चार बरस के दो कार्यकाल के बाद किसी भी सरकारी पद पर नहीं आ सकते। इसका नतीजा यह होता है कि लोग अधिकतम 8 बरस के राष्ट्रपति-कार्यकाल के बाद के लिए दिमागी रूप से तैयार रहते हैं कि उन्हें क्या करना है। अधिकतर राष्ट्रपति रिटायर होने के बाद कोई न कोई ट्रस्ट या फाउंडेशन बनाकर अपने विश्वविद्यालय या अपने राज्य के लिए समाजसेवा का कोई बड़ा प्रोजेक्ट शुरू करते हैं, और उनके समर्थक-प्रशंसक उसके लिए चंदा देते हैं। अमरीका में राष्ट्रपति का यह चुनाव एक नया इतिहास इसलिए भी रच रहा है कि हिलेरी क्लिंटन पहली महिला राष्ट्रपति बन सकती हैं। एक अश्वेत बराक ओबामा के बाद एक महिला का राष्ट्रपति बनना एक बड़ा ऐतिहासिक फैसला हो सकता है। इसके अलावा हिलेरी के पति बिल क्लिंटन भी राष्ट्रपति रह चुके हैं, और राष्ट्रपति की जीवनसाथी का राष्ट्रपति बनना भी पहली बार ही शायद होने जा रहा है। फिलहाल जो बात लिखने की है वह यह कि बराक ओबामा ने जिस दरियादिली के साथ हिलेरी की खूबियां गिनाई हैं, वह भारतीय राजनीति में एक अनदेखा और अनसुना काम है।
लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर के ऐसे परस्पर-तारीफ के रिश्तों को छोड़ दें, तो एक दूसरी बात सोचने की यह है कि आज दुनिया भर में इस्लामी आतंक के चलते हुए योरप सहित कई पश्चिमी देश जिस तनाव से गुजर रहे हैं, उसमें रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रंप शायद अमरीकी इतिहास के सबसे बड़े युद्धोन्मादी उम्मीदवार हैं, जो कि रंग की नफरत, नस्ल की नफरत, गरीबी से नफरत, प्रवासियों से नफरत, महिलाओं से नफरत, निहत्थों से नफरत, मजदूरों से नफरत, और इस्लाम धर्म से नफरत के साथ मैदान में हैं, और जैसा कि आज सुबह ओबामा ने गिनाया है, डोनाल्ड ट्रंप अमरीकियों में दहशत पैदा करके, उन्हें डराकर जीत तक पहुंचना चाहते हैं। ऐसे नफरतजीवी डोनाल्ड ट्रंप को देखते हुए दुनिया के बाकी लोगों को भी यह समझना चाहिए कि ऐसी नफरत अमरीका में हो या कि किसी और देश में, वह किसी दूसरे देश पर हमला करने के लिए हो, या कि अपने ही देश के लोगों के खिलाफ हो, वह दुनिया के लिए एक नया खतरा लेकर आ रही है, और इसे आज की दुनिया में पैदा करने के लिए दो कार्यकाल पहले के अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश, और उनके ब्रिटिश सहयोगी प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर को जिम्मेदार के तौर पर इतिहास में दर्ज किया गया है। अमरीकी लोगों के सामने यह एक बड़ा मौका है कि वे अमरीका की विविधता वाली संस्कृति का सम्मान करते हुए डोनाल्ड ट्रंप को खारिज करें। ऐसी नफरत और ऐसे युद्धोन्माद के साथ ट्रंप अमरीकी लोगों के लिए एक बहुत खतरा ही बनकर आए हैं, और अगर उन्हें अमरीका में जीत मिलती है तो बाकी दुनिया के नफरजीवी लोग भी ताकत पाएंगे। इसलिए अमरीकी वोटरों का इस बार का वोट न सिर्फ अमरीका को प्रभावित करेगा, बल्कि पूरी दुनिया को प्रभावित करेगा।

...अफसरों की बददिमागी शुरू होती है पदनाम से भी

संपादकीय
27 जुलाई  2016
इन दिनों तरह-तरह के कैमरों की मेहरबानी से हर तरह की तस्वीरें और वीडियो बात की बात में सोशल मीडिया और मीडिया पर तैरने लगते हैं। आज सुबह मध्यप्रदेश के एक अफसर का वीडियो एक समाचार चैनल पर था कि किस तरह छह महीने से राशन न पाने वाली गरीब महिलाएं उस अफसर के जूते पकड़-पकड़कर उसे प्रणाम करती जा रही हैं, और राशन देने की मेहरबानी मांग रही हैं। कल ही छत्तीसगढ़ के अखबारों में एक खबर थी कि एक आदिवासी महिला अपने शरारती बच्चे को एक आदिवासी आश्रम-छात्रावास में दाखिल करवाने गई, तो उसका आरोप है कि वहां बैठे अफसर ने उसे कहा कि कुत्ते-बिल्ली की तरह बच्चे पैदा ही क्यों करते हो। पिछले चार-छह दिनों से छत्तीसगढ़ के मीडिया में एक जिले की महिला कलेक्टर की तस्वीरें चल रही हैं जिनमें पहली तस्वीर में तो उन्हें वाहवाही मिल रही है कि वे बांध पर बहते पानी को पैदल पार करके किसी गांव तक पहुंच रही हैं, लेकिन इस वाहवाही की जिंदगी एक दिन से भी कम की रही क्योंकि अगले ही दिन उसी बांध की उनकी दूसरी तस्वीरें सामने आ गईं जिनमें उनका सुरक्षा गार्ड उनकी चप्पलें उठाए पीछे-पीछे चल रहा था। अब नक्सल इलाके में इस महिला कलेक्टर के ग्रामीण दौरे के समय गनमैन की अकेली जिम्मेदारी अपनी बंदूक के साथ चौकस रहते हुए अफसर की सुरक्षा होनी चाहिए थी, लेकिन उसका ध्यान अगर चप्पलों में रखा गया है, तो वह सुरक्षा क्या खाकर करेगा? और दूसरी बात यह कि आज जब भारत जाति व्यवस्था के जहर का शिकार है, तो अपने किसी मातहत से चप्पलें उठवाना भी कानून के भी खिलाफ है, और सामाजिक मर्यादा के भी। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के एक और कलेक्टर ने पिछले दिनों एक अस्पताल का दौरा करते हुए मरीज के पलंग पर अपना जूता रखते हुए उससे बात की थी, और मीडिया में यह तस्वीर छाने के बाद उसे सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी थी।
सरकारी नौकरी के साथ कई तरह की दिक्कतें हैं। एक तो यह कि सरकार में गड़बड़ी कुर्सियों के नाम से ही शुरू हो जाती है। जिले में सबसे अधिक ताकत की जो व्यवस्था कलेक्टर की कुर्सी के साथ जुड़ी हुई है, उसका वह नाम अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहा है, और उसका काम जनता से टैक्स कलेक्ट करना हुआ करता था। अब अंग्रेजों के वक्त तो टैक्स इक_ा करना ही सबसे बड़ा काम था, लेकिन आज तो कलेक्टर शायद ही कुछ इक_ा करते हैं, और वे सरकारी बजट के सैकड़ों करोड़ रूपए अपने जिलों में खर्च ही करते हैं। फिर सरकार का नारा लोकतंत्र में जनता की सेवा का है, लेकिन इस कुर्सी का नाम कलेक्टर, जिलाधीश, या जिला दंडाधिकारी होने से इस पर बैठे हुए लोगों की सोच उसी मुताबिक ढलना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के ही एक बड़े अफसर ने एक वक्त यह सुझाव दिया था कि कलेक्टर या जिलाधीश के पद का नाम जिला जनसेवक रखना चाहिए ताकि पदनाम की वजह से उनके दिमाग में यह बात हमेशा साफ रहे कि उनका काम क्या है। आज सरकार और लोकतंत्र घोषित रूप से जनसेवा का काम बताते हैं, लेकिन नाम अंग्रेजों के वक्त का चले आ रहा है। जब देश का प्रधानमंत्री अपने आपको देश का पहला सेवक कह रहा है, तो फिर अफसरों के पदनाम से सामंती प्रतीक हटा देने चाहिए, और इसके साथ-साथ उनके काम के दायरे, उनके अधिकारों से भी सामंती व्यवस्था खत्म करनी चाहिए।
भारत में जब तक कोई अफसर कलेक्टर बनते हैं, या किसी की बराबरी की दूसरी कुर्सियों पर आते हैं, उनका सामाजिक शिक्षण सिर्फ एकेडमी में होता है। जिंदगी की असल हकीकत को उन्होंने बहुत कम देखा होता है, और उनके लिए नौकरशाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है जो कि हमारे हिसाब से एक अपमानजनक शब्द है और अफसरों के तबके को इसका विरोध भी करना चाहिए। न तो वे शाह हैं, और न ही नौकर हैं। वे महज एक सरकारी कर्मचारी हैं, जिनका काम जनता की सेवा करना होना चाहिए, और जहां-जहां अफसरों में यह परिपक्वता नहीं आती है, यह जिम्मेदारी नहीं आती है, वहां-वहां उनका अहंकार बदजुबानी और बदसलूकी के साथ जनता के बीच दिखता है। सरकार के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी यह याद रखना चाहिए कि सत्ता का कार्यकाल पूरा करने के बाद जब वे जनता के बीच चुनाव के लिए दुबारा जाते हैं, तो वे अफसरों के अच्छे या बुरे बर्ताव का भी नफा-नुकसान पाते हैं। इसलिए अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक-सरकारी जिम्मेदारियों के तहत न सही, नेताओं को अपनी चुनावी-जिम्मेदारियों के तहत ही सही, अफसरों के व्यवहार पर काबू रखना चाहिए। और इसकी शुरुआत पदनाम बदलने से होना चाहिए, और जो सरकार ऐसे व्यवहार को अनदेखा करती है, वह सरकार अपने दुबारा लौटने की संभावनाओं को खोती ही है। चुनाव में जीत-हार छोटी बात हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार से पूरी की पूरी सरकार के लिए आम जनता के मन में अगर हिकारत और नफरत बैठ जाती है, तो यह लोकतंत्र पर से भरोसा उठने की बात रहती है। लोगों को याद होगा कि हिन्दी टीवी सीरियलों में एक सीरियल मुसब्बीलाल नाम के किरदार पर केन्द्रित, ऑफिस-ऑफिस नाम का भी था, जिसमें अभिनेता पंकज कपूर सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते घूमता दिखता था, और हमारे आसपास के सरकारी दफ्तरों की हकीकत इससे कुछ बेहतर नहीं है।

एक दिव्यांग बेरोजगार की आत्महत्या और राजनीति

विशेष संपादकीय
27 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री-निवास पर नौकरी के लिए अर्जी देकर निकले एक दिव्यांग (विकलांग) नौजवान ने बाहर सड़क पर पेट्रोल छिड़का और आग लगा ली। जैसा कि उस खबर के आने के वक्त से लग रहा था, आज सुबह उसकी मौत हो गई। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उसे देखने अस्पताल गए, और उसके इलाज का सरकारी खर्च पर इंतजाम किया। इस खबर के साथ-साथ लोगों को यह भी याद आया कि पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी के कार्यकाल में भी इसी तरह एक बेरोजगार नौजवान ने नौकरी की मांग करने के बाद मुख्यमंत्री निवास के बाहर जहर खा लिया था, और अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। ऐसी मौतों को लेकर राजनीति एक आम बात है, और उस वक्त हो सकता है कि बीजेपी ने उसे मुद्दा बनाया हो, और आज तो राज्य में विपक्ष में कांग्रेस और जोगी की कांग्रेस दोनों है, और दोनों के लिए यह एक बड़ा मुद्दा है।
लेकिन आज सभी पार्टियों को और सरकार को यह समझने की जरूरत है कि हर किसी को सरकारी नौकरी देना न तो मुमकिन है, और न ही जायज भी है। लोगों के आत्महत्या कर लेने के दबाव में कोई नौकरी नहीं दी जा सकती, और ऐसे दबाव के बिना भी शायद हजार बेरोजगारों पर एक ही सरकारी नौकरी मौजूद भी होगी। इसलिए ऐसी मौतों पर राजनीति करते हुए लोगों को यह याद रखने की जरूरत है कि इसके लिए मौत के वक्त की सरकार पर तोहमत लगाना तो आसान है, लेकिन क्या ऐसी तोहमत लगाकर बाकी बेरोजगारों को राह से भटकाने का काम तो नहीं हो रहा ? आज बेरोजगारों को यह समझने की जरूरत है कि सरकारी नौकरियों का दायरा बुरी तरह से सिमट रहा है, और निजी क्षेत्र में रोजगार भी बढ़ रहे हैं, और स्वरोजगार के मौके भी बढ़ रहे हैं। भारत की बाजार की अर्थव्यवस्था, और तरह-तरह की सेवाओं की जरूरत पूरी तरह से करवट ले चुकी है, और आज नए-नए किस्म के रोजगार रोज सामने दिखते हैं। ऐसे में सरकारी नौकरी न मिलने से निराश होकर आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है।
न सिर्फ राजनीति में सक्रिय लोगों को, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी अहमियत के ओहदों पर हैं, उनको अपने आसपास के लोगों को यह बताना होगा कि सरकार से परे भी खाने-कमाने के कितने तरह के विकल्प आज मौजूद हैं। सरकारी योजनाएं कागजों पर जितनी अच्छी दिखती हैं, उनसे अगर हकीकत में एक चौथाई भी अच्छी होंगी, तो भी कौशल विकास से कई लोग गैरसरकारी काम के लायक हो सकते हैं। फिर बैंकों से नए स्वरोजगार के लिए कर्ज मिलने को आसान बनाया गया है, और उसमें भी कई लोगों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, शायद बढ़ी भी हैं। इसलिए न सिर्फ सत्तारूढ़ दल, बल्कि विपक्षी दलों और बाकी लोगों की भी यह जिम्मेदारी है कि सरकार की योजनाओं के तहत लोगों को शिक्षण-प्रशिक्षण दिलवाने की पहल भी करें, और उनको स्वरोजगार शुरू करवाने में भी। मौतों पर राजनीति न नई बात है, और न ही यह कभी खत्म होगी। लेकिन चाहे जोगी के वक्त की मौत हो, चाहे रमन सिंह के वक्त की, ऐसी मौतों के मौकों पर समाज के सभी जिम्मेदार तबकों को यह तय करना चाहिए कि सरकारी नौकरियों से परे वे लोगों को खाने-कमाने के लिए किस तरह से तैयार कर सकते हैं। अगर राजनीति में सक्रिय तबके ऐसी लाशों को सरकार की नाकामयाबी साबित करने में लगे रहेंगे, तो वे समाज के बाकी नौजवान बेरोजगारों के सामने एक ऐसा झांसा चाहे-अनचाहे पेश कर देंगे कि नौकरी देना सरकार की जिम्मेदारी है। अगर सरकार देश-प्रदेश के हर बेरोजगार को नौकरी दे दे, तो साल भर में एक हफ्ते की तनख्वाह भी किसी को नहीं मिल पाएगी। इसलिए ऐसी तकलीफदेह मौत के मौके पर सत्ता और विपक्ष सभी को केन्द्र और राज्य की योजनाओं का फायदा अधिक से अधिक लोगों को दिलवाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। ये योजनाएं रमन सिंह या नरेन्द्र मोदी की निजी योजनाएं नहीं है, यह देश की जनता के टैक्स के पैसों और सरकारी खजाने से चलने वाली योजनाएं हैं, और इनके तहत लोगों का कौशल विकास करना, उन्हें स्वरोजगार शुरू करवाना एक बड़ी प्राथमिकता रहनी चाहिए। निजी जिंदगी में निराशा से ऐसी मौत बड़ी तकलीफदेह बात है, और इसे लेकर मौत के दिन की सरकार को जिम्मेदार ठहराने की गैरजिम्मेदारी किसी को नहीं करनी चाहिए। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा दावा नहीं कर सकते कि वे सत्ता में आने पर हर किसी को नौकरी दे देंगे।

जापान की भयानक हिंसा से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
26 जुलाई  2016
जापान में मानसिक रोगियों के एक केंद्र में वहीं के एक भूतपूर्व कर्मचारी ने देर रात घुसकर 19 रोगियों को चाकू से काट डाला, और खुद को पुलिस के हवाले करते हुए उसने कहा कि वह तमाम विकलांगों और मानसिक रोगियों को धरती से मिटा देना चाहता है। वह पिछले कुछ समय से अपने आसपास के लोगों को यह कहते आया है कि विचलित और विकलांग लोग मार डाले जाने चाहिए। उसने जापानी संसद को भी एक चिट्ठी लिखकर यह मांग की थी कि ऐसे तमाम लोगों को इच्छामृत्यु देनी चाहिए। इस चिट्ठी में उसने ऐसे दो केंद्रों पर हमला करके 470 लोगों को मार डालने की योजना भी बयां की थी।
दुनिया के सक्षम लोगों के एक तबके में कमजोर लोगों के लिए हिकारत हमेशा से चली आ रही है बात है। संपन्नों के मन में विपन्नों के लिए जो नफरत रहती है वह बिरला वाईट सीमेंट के इश्तहारों में भी दिखती है कि हम बिरला वाईट वालों से चूने से रंगी दीवार वालों का क्या मुकाबला। जो ताकतवर होते हैं उनमें कमजोर लोगों के लिए नफरत होती है। भारत जैसे देश में जाति-व्यवस्था के चलते जो ताकतवर ऊंची जाति मानी जाती है, उसके मन में नीची मानी जाने वाली जाति के लोगों के लिए नफरत रोजाना ही कहीं न कहीं पुलिस में दर्ज हो रही है। इसी तरह औरत और मर्द में से ताकतवर मर्द का बाहुबल औरत पर तरह-तरह से कहर ढाते ही रहता है। बहुत से लोगों का यह मानना रहता है कि विकलांग, विचलित, या विशेष जरूरतों वाले बच्चों को खत्म कर देना चाहिए, ताकि न उनकी जिंदगी मुश्किल हो, न ही आसपास के लोगों की। जापान में जिस नौजवान ने वहां के इतिहास की अपने किस्म की यह सबसे बड़ी हिंसा की है, उसकी सोच भी इसी तरह की हिंसक सोच थी, और ऐसी जिंदगियों को खत्म करना उसे एक किस्म की सेवा का काम लग रहा था। इतने कत्ल करने के बाद उसने अपने-आपको पुलिस के हवाले कर दिया मानो उसका मकसद पूरा हो गया हो।
इस भयानक जुर्म के बाद अब जापान में लोग इस बात पर भी सोच रहे हैं कि लोगों के मन विचलित और हिंसक होने से कैसे रोके जाएं। विकलांग लोगों के मुद्दों पर काम करने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि आज की जरूरत मानसिक केंद्र में दाखिल मानसिक-रोगियों के बारे में सोचने की कम है, ऐसे हत्यारे की दिमागी हालत के बारे में सोचने की अधिक है। हालांकि जापान और भारत के हालात अलग हैं, लोगों की सोच अलग है, लेकिन फिर भी तमाम देशों के और तमाम लोगों के इस हिंसा से यह सबक लेने की जरूरत है कि अपने-अपने दायरे में वे ऐसे तनाव, ऐसी नफरत, और ऐसी हिंसा को कैसे टाल सकते हैं।

सड़कों पर अराजकता कड़ाई से कुचली जाए

संपादकीय
25 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले खासे वक्त से बददिमाग रईसों की बिगड़ैल औलादें सड़कों पर महंगी गाडिय़ां दौड़ाते या तो खुद जान दे रही थीं, या दूसरों की जान ले रही थीं। और इनके सामने इस राजधानी में बैठे हुए पुलिस के बड़े-बड़े अफसर मानो बेबस थे कि इनको छूना वर्दी उतरवाने जैसा होगा। नतीजा यह था कि सड़कों पर लोगों का पैदल चलना मुश्किल हो रहा था कि कब कोई गाड़ी आकर कुचलकर चली जाएगी। कोई चाहकर भी इस शहर में साइकिलों पर नहीं चल सकते क्योंकि अधिक ताकतवर इंजनों वाली कारों और मोटरसाइकिलों के मन में पैदल और पैडल के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है।
अच्छी खासी बड़ी कार जितनी कीमत वाली मोटरसाइकिलें दौड़ाते हुए लोगों की बददिमागी स्वाभाविक है क्योंकि इंजन और दाम सिर चढ़कर बोलते हैं। और लोग तरह-तरह के प्रेशर हॉर्न लगवाकर, साइलेंसरों से छेडख़ानी करके, हेडलाईट में फेरबदल करके सड़कों पर दौड़ का मुकाबला करते हैं, और बड़ी संख्या में तैनात पुलिस महज चालान करके छोड़ देती है। पिछले हफ्ते-दस दिन से रायपुर की पुलिस ने ऐसी दर्जनों महंगी बाईक जब्त की हैं, और शायद पहली बार इनके मामलों को अदालत ले जाया जा रहा है, न कि चालान की पर्ची थमाकर छोड़ा जा रहा है। हमारा यह मानना है कि सड़कों पर बददिमागी दिखाने वालों पर सिर्फ ट्रैफिक के नियम लागू करना काफी नहीं है, सड़क के दूसरे लोगों की जिंदगी के लिए जो खतरा ऐसे लोग खड़ा करते हैं, उनके खिलाफ पुलिस को दूसरी दफाओं के तहत भी कार्रवाई करनी चाहिए, और कानून में इसका खासा इंतजाम भी है। यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि जब सार्वजनिक जगहों पर नियम तोडऩे वाले लोगों पर कार्रवाई नहीं होती है, तो उससे दूसरे बददिमाग लोगों में भी कानून तोडऩे का हौसला खड़ा होता है, और बढ़ता है। यह सिलसिला कुचलने की जरूरत है, और जहां तक पुलिस पर खर्च की बात है, तो ऐसे चालान से सरकार को खासी कमाई भी होती है, और उससे पुलिस पर अधिक खर्च करने की जरूरत भी है।
लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही जो काम नहीं हो पा रहे हैं, वे यहां के बाकी शहरों में होने की संभावना नहीं हो सकती। रफ्तार नापने वाले राडार किसी वक्त आए होंगे, लेकिन उनका इस्तेमाल न दिखाई पड़ता, न सुनाई पड़ता। दूसरी तरफ शराब पिये हुए लोगों के नशे की जांच के उपकरण खराब पड़े हुए हैं, और जिनके पास बीस-पच्चीस लाख रूपए तक की बाईक के लिए पैसे हैं, उन्हीं लोगों का तबका देर रात तक मॉल्स में चलने वाले महंगे शराबखाने से नशे में भी निकलता है, और बिलासपुर में चार दिन पहले ऐसे ही नशे के बाद हुआ कत्ल इस बात का एक ताजा सुबूत है। छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे नियम-कानूनों की बड़ी-बड़ी अनदेखी आम बात है। राजधानी सहित बाकी शहरों में चाट ठेले तो साढ़े दस बजे रात से लाठी खाने लगते हैं, लेकिन मॉल्स के महंगे शराबखाने बिलासपुर के इस कत्ल के पहले तक सुबह तक दावतों से कमाई करते रहते थे, और फिलहाल उनकी जांच-पड़ताल शुरू हुई है। सरकार को आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए, और सड़क, सार्वजनिक जगह, ऐसी कड़ाई के लिए सबसे पहले देखनी चाहिए। इन दिनों राजधानी में जो कड़ाई शुरू हुई है, वह पिछले बरसों में हुई रहती, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। हम यह भी नहीं मानते कि ऐसे छोटे-छोटे मामलों में कोई बड़े राजनीतिक दबाव आते होंगे। इसलिए पुलिस और प्रशासन में बैठे हुए लोगों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और लोगों की जिंदगी बचानी चाहिए। कुछ लोगों के पास अगर जरूरत से अधिक पैसा है, तो उन्हें दूसरे लोगों को कुचलने का हक देना गैरजिम्मेदार अफसर ही कर सकते हैं।

साइबर-सक्रियता तो छा गई लेकिन साइबर-जागरूकता...

संपादकीय
24 जुलाई  2016
एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब इंटरनेट या फोन, फेसबुक से कोई धोखा न खाते हों। फेसबुक पर दोस्ती करके अश्लील तस्वीरें जुटा लेना, ब्लैकमेल करना, और महंगे गिफ्ट भेजने का झांसा देकर उन्हें छुड़ाने के लिए बैंक खातों में पैसे जमा करवाना भी रोजाना कहीं न कहीं से पुलिस के पास पहुंच रहा है। बहुत सी अधेड़ महिलाएं भी अपने घरबार की फिक्र छोड़कर इंटरनेट की ऐसी दोस्ती के फेर में पड़ रही हैं कि वे लुट भी रही हैं, और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी झेल रही हैं। दरअसल कम्प्यूटर, फोन, और इंटरनेट जैसी सहूलियतों से लोग सोशल मीडिया पर एक ऐसी जिंदगी जीने लगे हैं जिसके खतरे का उन्हें अंदाज नहीं है। मानो वे किसी अनजाने जंगल में पहुंच गए हैं, जहां पर खाने लायक फल कौन से हैं, और जहरीले कौन से हैं इसकी परख-पहचान नहीं है, लेकिन वहां लोग खूब दुस्साहस के साथ हर फल को चख रहे हैं, फेसबुक के खाते बना रहे हैं, वॉट्सऐप पर तस्वीरें और वीडियो भेज रहे हैं, और इनमें से जहां जहर साबित होगा, उसका असर दिखने तक उससे बाहर आने का वक्त निकल चुका होगा।
आज सरकार और समाज को, और सबसे अधिक, स्कूल-कॉलेज और परिवार को बच्चों-बड़ों सभी को कम्प्यूटर-फोन, नेट-सोशल मीडिया की संभावनाओं और उसके खतरों दोनों से वाकिफ कराना चाहिए। इस काम में कम्प्यूटर और फोन कंपनियां चाहे कोई मदद न करें, क्योंकि गैरजिम्मेदार ग्राहक अधिक मुनाफा देते हैं, और खतरे से डरे-सहमे ग्राहक इन तमाम सामानों और सेवाओं का कम इस्तेमाल करेंगे, लेकिन घर-समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभानी चाहिए। इसके लिए किसी साइबर-अपराध के विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है, मामूली समझबूझ रखने वाले लोग भी स्कूल-कॉलेज जाकर या संगठनों-संस्थाओं की बैठक में जाकर लोगों को सूचना तकनीक के खतरों के बारे में बता सकते हैं। आज अधिकतर लोगों को इनमें से किसी बात के बारे में बड़ी कम जानकारी रहती है। लोग जिस तरह कहावत और मुहावरे में बंदर के हाथ उस्तरे की बात कहते हैं, वैसा बंदर के साथ होते तो किसी ने देखा नहीं है, इंसानों के हाथ मोबाइल फोन आने के बाद ऐसा जरूर देखने में आ रहा है।
पुलिस और अखबारों में जितने मामले पहुंच रहे हैं, उनसे हजार गुना अधिक मामले निजी ब्लैकमेलिंग तक पहुंचकर दब जाते हैं, और इससे न जाने कितने लोगों की जिंदगी तबाह होती है। जब मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है, या परिवार के और लोगों की नजर में आ जाता है, तो उनमें से कुछ मामलों में लोग पुलिस तक जाने का हौसला दिखाते हैं। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को साइबर-जागरूकता नाम का एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करना चाहिए जो कि कम्प्यूटर-मोबाइल इस्तेमाल करने की उम्र शुरू होते ही लागू किया जाए, और इस उम्र से ऊपर के तमाम लोगों को उपकरणों और संचार-प्रणाली के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। जिस तरह लापरवाह सेक्स से एड्स का खतरा रहता है, उसी तरह लापरवाह साइबर-सक्रियता से जुर्म का शिकार होने, या ब्लैकमेल होने का खतरा बढ़ता है।
सरकार को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में साइबर-अपराधों से सावधान रहने पर कुछ पन्ने जरूर जोडऩे चाहिए, और पुलिस भी अपनी सामाजिक भूमिका की अच्छी छवि बनाने के लिए जगह-जगह जाकर ट्रैफिक-जागरूकता की तरह साइबर-जागरूकता पर भी लोगों को जानकारी दे सकती है।

उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की पसंद, रणनीति और चुनावी संभावनाएं

संपादकीय
23 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश में चुनाव के पहले अपने पैर जमाने के लिए कांग्रेस ने दो ऐसे फैसले लिए हैं जो कि हमें समझदारी के दिखते हैं। एक तो राज बब्बर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाना, और दूसरा यह कि आने वाले विधानसभा चुनाव को दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की लीडरशिप में लडऩा। कांग्रेस के पास आज जितने तरह के विकल्प हैं, उनमें ये दोनों अच्छे फैसले दिखते हैं, और अब तक तो पार्टी के एक छोटे नारेबाज तबके की यह बात मानी जाती नहीं दिख रही है कि प्रियंका गांधी को इस चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाकर उतारा जाए। एक कुनबापरस्त कांग्रेस ने मां और दोनों बच्चों के बीच ओहदों और ताकत का बंटवारा कैसा होता है, इससे देश या इस पार्टी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। मीडिया को जगह बर्बाद करने के बजाय इसे सोनिया के कुनबे पर ही छोड़ देना चाहिए। लेकिन आज उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर कांग्रेस के रूख पर लिखने का हमारा मुद्दा कुछ और ही है।
कांग्रेस ने आज एक नारे के साथ उत्तरप्रदेश का चुनाव अभियान शुरू किया है- 27 साल, यूपी बेहाल। ये 27 साल यूपी की सत्ता से कांग्रेस के बाहर रहने वाले 27 साल हैं, और इस दौरान मायावती से लेकर समाजवादी पार्टी, और भाजपा तक की सत्ता के दौर रहे हैं, और कांग्रेस का आखिरी मुख्यमंत्री 1989  का कैलेंडर हटने के पहले ही उत्तरप्रदेश से जा चुका था। ऐसे में पिछले 27 बरसों की उत्तरप्रदेश की सरकारों को कोसने के साथ कांग्रेस अकेले अपने दम पर यह चुनाव लडऩे को तैयार दिख रही है, और चौथाई सदी में जब उसकी कोई सरकार यहां बन नहीं सकी, तो उसके पास आज वहां खोने के लिए अधिक कुछ बचा नहीं है, और उसकी जो भी रणनीति है, वह उसके लिए भली हो सकती है। लेकिन हमारा आज यहां लिखने का मुद्दा यह है कि पिछले पूरे 27 बरसों को कोसने से उत्तरप्रदेश की चुनावी बिसात अब साफ हो जाती है कि वहां चार पार्टियां मैदान में रहेंगी, और भारतीय जनता पार्टी के लिए शायद यही सबसे सहूलियत की नौबत होगी। मायावती, मुलायम, कांग्रेस, और भाजपा इन सबके अलग-अलग लडऩे से न सिर्फ उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के समीकरण दिख रहे हैं, बल्कि अगले आम चुनाव में भाजपा विरोधी किसी वजनदार गठबंधन के बनने की संभावना भी इससे कुछ कमजोर होते दिखती है। हालांकि उत्तरप्रदेश के चुनावों के नतीजे चाहे जो हों, इसके बाद भी देश के आम चुनाव में साथ रहने पर कोई रोक तो रहेगी नहीं, लेकिन इस चुनाव में अगर कांग्रेस का बसपा या सपा से कोई तालमेल बैठता, तो वह अगले किसी गठबंधन में काम भी आ सकता था।
ये चुनाव अब देश में इसी बात को आगे बढ़ा रहे हैं कि भारतीय राजनीति किस तरह भाजपा के मुकाबले बाकी सब की नौबत ला रही है। भारतीय चुनावों ने आधी सदी तक कांग्रेस के मुकाबले बाकी सब की नौबत सामने रखी थी, और अब यह तस्वीर कांग्रेस के हाशिए पर आने की वजह से बदलकर ऐसी हो गई है। लेकिन फिर भी भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस का खत्म होना कोई अच्छी बात नहीं होती, इसलिए आज अगर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने अपने लिए बेहतर लीडरशिप को छांटा है, तो यह राज्य की राजनीति और देश की राजनीति इन दोनों में कांग्रेस और लोकतंत्र दोनों के लिए अच्छा हो सकता है। कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश और उसी का हिस्सा रहे उत्तराखंड, इन दोनों राज्यों को बर्बाद करने का ठेका जिस तरह से बहुगुणा-भाईबहनों को दिया था, वह कुनबापरस्ती को सिर पर बिठाने के साथ-साथ बेवकूफी का फैसला भी था। इन दोनों ने मिलकर दो राज्यों में कांग्रेस को तबाह कर दिया, और अब उनसे छुटकारे के बाद  इन दोनों में कांग्रेस नए सिरे से बेहतर लोगों को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि शीला दीक्षित के बारे में यह बात कही जा सकती है कि वे खुद कुनबाई राजनीति की उपज हैं, और उन्होंने दिल्ली में अपने बेटे को सांसद बनाकर विरासत को आगे बढ़ाया है, लेकिन उत्तरप्रदेश की चुनावी संभावनाओं में वे चर्चा के तमाम चेहरों में सबसे बेहतर हैं, और कांग्रेस इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकती।

फोटो खिंचाने न आएं

संपादकीय
22 जुलाई  2016
गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर जिन दलितों को बुरी तरह से मारा गया, उनसे हमदर्दी जाहिर करने के लिए गुजरात की भाजपा मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल पहुंचीं, और फिर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। एक खबर यह है कि वहां मौजूद दलित परिवारों ने इन लोगों से कहा कि मिलने आए हैं वह तो ठीक है, लेकिन लौटकर उनके नाम पर राजनीति न करें। दूसरी तरफ देश के सभी प्रदेशों में जहां-जहां किसी हादसे या हिंसा के शिकार लोग अस्पतालों में भर्ती रहते हैं, उनसे मिलने के लिए, और उनके साथ तस्वीरें खिंचाने के लिए नेताओं की कतार लग जाती है। हादसा जितना हिलाने वाला हो, कतार उतनी ही लंबी, और कतार में नेता उतने ही बड़े कद के। इसके अलावा प्राकृतिक विपदाओं के समय भी सरकार में बैठे नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे जल्द से जल्द बाढ़ या भूकंप या समुद्री तूफान, सुनामी के शिकार लोगों के बीच पहुंचें।
ऐसी उम्मीदों के बीच यह बात याद दिलाना जरूरी है कि अमरीका में कुछ बरस पहले जब सबसे बुरा तूफान आया, तो राष्ट्रपति बराक ओबामा कई दिन तक वहां नहीं गए, और उन्होंने बताया कि वे स्थानीय प्रशासन को बचाव-राहत में लगे रहने देना चाहते थे, राष्ट्रपति के पहुंचने से उनको उनके इंतजाम में लग जाना पड़ता है। यह बात अस्पतालों में घायलों को देखने जाने वालों पर भी लागू होती है, और बीमार या ऑपरेशन से उबर रहे लोगों को देखने जाने पर भी। यह बड़ी सामान्य समझबूझ की बात है कि अस्पताल में इलाज पा रहे लोगों का ऐसे नेताओं, या मीडिया के लोगों के आने-जाने से कोई फायदा तो हो नहीं सकता, उनका नुकसान जरूर हो सकता है, उनको संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है, और बढ़ता ही है। लेकिन नेताओं को जाकर जख्मी या मरीज के बगल खड़े रहकर तस्वीरें खिंचवाना अच्छा लगता है, फिर चाहे इससे मरीज के मरने का खतरा ही क्यों न बढ़ जाए। बड़े-बड़े नेताओं के पहुंचने पर अस्पतालों का इंतजाम तबाह हो जाता है, लंबी-चौड़ी भीड़ जुट जाती है, और अस्पताल का स्टॉफ मरीज को छोड़, नेताओं को देखने में लग जाता है।
हमारी यह सलाह है कि अस्पतालों में मरीज तक पहुंचना पूरी तरह से रोकना चाहिए, और डॉक्टर अगर किसी को इजाजत दे सकते हैं, तो वह मरीज के परिवार तक सीमित रहनी चाहिए। न तो मीडिया को, और न ही नेताओं को मरीज या जख्मी तक पहुंचने देना चाहिए, क्योंकि तस्वीरें खिंचवाने का ऐसा मौका उन बेबस जख्मियों का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं करता। यह सिलसिला खत्म करने के लिए अगर नेताओं की तरफ से खुद पहल नहीं होती है, तो भी हमारा मानना है कि यह एक जनहित याचिका के लायक मुद्दा है, और अदालत ऐसी रोक लगा सकती है। हमारा यह भी मानना है कि जिस तरह गुजरात के घायल दलितों की तरफ से राजनीति न करने की बात उठी है, उस तरह की बात भी जनता के बीच से कई तबकों से उठनी चाहिए, और हमदर्द नेताओं से कहा जाना चाहिए कि अपनी सरकार या अपनी पार्टी की तरफ से जो मदद भेज सकें, वह भेज दें, और फोटो खिंचाने न आएं।

इससे न मायावती का नुकसान, न वेश्या का

संपादकीय
21 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश में चुनाव के ठीक पहले एक तरफ तो भाजपा दलितों को साथ जोडऩे के रास्ते ढूंढ रही है, और दूसरी तरफ उसके प्रदेश उपाध्यक्ष ने देश की सबसे बड़ी दलित राजनेता मायावती के बारे में सार्वजनिक बयान दिया कि वे वेश्या से भी गई बीती हैं। संसद के भीतर भाजपा के एक बड़े मंत्री को इस पर खेद जताना पड़ा, और पार्टी के इस बकवासी नेता को छह बरस के लिए पार्टी से निलंबित करना पड़ा। लेकिन जो नुकसान होना था, वह तो हो चुका है, और यह नुकसान अभी थमने वाला भी नहीं है, क्योंकि गुजरात में दलितों को जिस तरह से गौरक्षकों ने पुलिस की मेहरबानी से मारा है, वह दुनिया के सामने है, वहां दलित उबले हुए हैं, और सड़कों पर हैं। दूसरी तरफ कई महीनों से हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित से लेकर जेएनयू के छात्रों तक के खिलाफ स्मृति ईरानी ने जो कुछ किया था, उसे लेकर भी दलित खफा चल ही रहे थे। और कल ही शायद इस जगह पर हमने गोमांस पर रोक को लेकर यह लिखा ही है कि किस तरह इससे देश की एक बड़ी आबादी नाराज है।
लेकिन सवाल यह है कि भाजपा का एक के बाद एक नेता अगर लगातार इस तरह की हिंसक और हमलावर बयानबाजी जारी रखेगा, तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता का एजेंडा कहां जाएगा? कल जब यह आग लगी ही हुई थी, तो इसी उत्तरप्रदेश में अपनी साम्प्रदायिकता के लिए कुख्यात भाजपा के एक विधायक संगीत सोम ने आजम खां के बनवाए विश्वविद्यालय को लेकर बयान दिया कि वह आतंक का अड्डा है, इस यूनिवर्सिटी को आतंकियों की फौज तैयार करने के लिए बनाया गया है। अब एक तरफ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ रमजान के मौके पर इफ्तार दावत रख रहा है, और मुस्लिमों के साथ बातचीत को आगे बढ़ाना चाहता है, दूसरी तरफ भाजपा के मंत्री, सांसद, विधायक, और पदाधिकारी एक दिन भी बिना किसी नई आग के पार नहीं होने देते हैं। फिर भाजपा से जुड़े हुए दूसरे संगठन इसी तरह के कई हमलावर काम कर रहे हैं। पंजाब में कश्मीर के मुस्लिम ट्रक ड्राइवरों की गाडिय़ों को रोका गया, उन्हें उतारा गया, उनसे पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगवाए गए, भारत माता जिंदाबाद के नारे लगवाए गए, और पाकिस्तान के झंडे उनसे जलवाए गए। यह पूरा सिलसिला देश के भीतर एक निहायत गैरजरूरी तनाव और टकराव खड़ा कर रहा है, और एक तरह का बंटवारा कर रहा है।
लेकिन हम फिर मायावती को दी गई गाली पर लौटें, तो हिन्दू संस्कृति और भारतीय संस्कृति की रात-दिन दुहाई देने वाली भाजपा के इतने बड़े-बड़े नेता अगर  देश की सबसे बड़ी दलित नेता मायावती के बारे में ऐसी गंदी बातें कैमरों के सामने कहते हैं, तो इससे उन्हीं के कंधों पर उठाए हुए हिन्दू धर्म, और उन्हीं के कंधों पर उठाई हुई भारतीय संस्कृति, दोनों की बेइज्जती होती है। किसी भी धर्म या संस्कृति की पहचान उसका झंडा लेकर चलने वाले लोगों के काम से होती है। इस्लाम के नाम पर गैरलोकतांत्रिक देशों में आतंकी खून-खराबे करने वाले लोग खून कम बहाते हैं, इस्लाम का नाम अधिक बदनाम करते हैं। और वैसा ही काम हिन्दुस्तान में हिन्दू धर्म का नाम लेकर राजनीति करने वाले लोग करते हैं, जब वे देश के एक प्रमुख नेता को वेश्या से गई बीती कहते हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, उनकी पार्टी, और पार्टी के साथ जुड़े हुए आरएसएस जैसे संगठनों को चाहिए कि अपने साथियों की ऐसी बदजुबानी को बंद करवाने का इंतजाम करें, क्योंकि इससे न मायावती का कोई नुकसान, न वेश्या का कोई नुकसान है, नुकसान है तो ऐसी बकवासियों के संगठनों का ही है। वेश्या तो महज अपनी देह बेचती है, न कि ऐसे बकवासी नेताओं की तरह देश की शांति बेचती है। 

गाय को लेकर शुरू हुई हिंसा अब लोकतंत्र के साथ हिंसा में तब्दील

संपादकीय
20 जुलाई  2016
गुजरात में गौभक्तों ने जिस तरह मरे हुए जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को बुरी तरह पीटा है, उसके जवाब में गुजरात में भी आंदोलन चल रहा है, और देश भर में दलितों के बीच खासा गुस्सा सामने आ रहा है। कल मुंबई में लाखों दलित अंबेडकर के एक स्मारक को गिराने के खिलाफ अनायास ही नहीं जुट गए, उनके बीच एक बड़ी बेचैनी चल रही है। यह समझने की जरूरत है कि गाय को बचाने के नाम पर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले लोगों को अगर मारा जाएगा, तो यह बात तो पिछले दो दिनों से उठ गई है कि क्या इस देश के दलित कुछ दिनों के लिए अपने परंपरागत पेशों को बंद करके देश को यह बता दें कि बिना दलितों के गैरदलितों का काम कैसा चलेगा।
आज देश भर में बिना किसी आरक्षण के नाली-गटर से लेकर पखाने साफ करने तक का काम सौ फीसदी दलितों के कंधों पर ही है, मरे हुए जानवरों की लाशों का निपटारा दलितों पर ही है, और रोज की जिंदगी के बहुत से दूसरे काम दलितों के बिना चल नहीं सकती, और ये काम ऐसे हैं जिनमें गैरदलितों को सौ फीसदी आरक्षण भी दे दिया जाए, तो भी उनमें से कोई ये काम करने नहीं आएंगे। ऐसे देश में आज एक सवर्ण और ब्राम्हणवादी सोच के हिंसक और हमलावर तेवर गाय काटने के खिलाफ चारों तरफ हिंसा कर रहे हैं, लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि महाराष्ट्र में जो किसान खुद आत्महत्या कर रहे हैं, वे गैरजरूरी रह गए जानवरों के लिए खाना कहां से लाएं, उन्हें बेचने पर रोक है, तो फिर उनका आखिर क्या करें? और यह हिंसा बढ़ते-बढ़ते कई प्रदेशों में कानून की शक्ल ले चुकी है, और अब इसका फैलाव मरी गायों की खाल निकालने वाले दलितों तक हो चुका है।
एक आक्रामक सवर्ण सोच ने जिस तरह गोहत्या पर रोक लगाकर यह सोचा था कि इसका निशाना सिर्फ अल्पसंख्यक होंगे, उन्हें पता नहीं इस बात का अंदाज था या नहीं, है या नहीं, कि गाय खाने वाले लोगों में दलित और आदिवासी बड़ी संख्या में हैं। उनके अलावा हिन्दू समाज की दूसरी कई जातियों के लोग भी गाय या गोवंश के जानवरों का मांस खाते आए हैं, और बड़े जानवर का मांस गरीब तबकों के लिए अधिक प्रोटीन पाने का एकमात्र सस्ता विकल्प है। ऐसे में हिन्दू धर्म के एक तबके की सोच को जिस तरह कानून बनाकर, और उससे भी ऊपर, कानून अपने हाथ में लेकर बाकी लोगों पर थोपा जा रहा है, उससे देश बंट रहा है। और इस बंटवारे में कोई सरहद नहीं दिख रही है, लेकिन अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, और गरीबों को यह लग रहा है कि उनके खानपान पर देश का एक बहुत छोटा सा तबका काबू कर रहा है, और यह बेचैनी छोटी नहीं है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर ये तबके मिलकर वोटरों का भी बहुत बड़ा हिस्सा हैं, और हो सकता है कि अगले चुनाव में देश-प्रदेश में ऐसे हिंसक तेवरों की वजह से भाजपा और उसके साथियों को खासा नुकसान झेलना पड़े।
लेकिन चुनाव में किसको नुकसान होता है, यह हमारी कोई बड़ी फिक्र नहीं है, हमारी फिक्र यह है कि चुनाव के पहले आज की तारीख में देश के ताने-बाने को किन बातों से नुकसान पहुंच रहा है। और देश के धार्मिक या जातीय ढांचे को पहुंचने वाला ऐसा नुकसान किसी एक चुनाव से सरकार बदलने से भी नहीं सुधर पाएगा, और विविधताओं वाले इस देश में गाय को लेकर इतिहास और हकीकत को झुठलाकर जिस तरह का धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए आत्मघाती है। मतदाताओं के बहुमत से देश और प्रदेश में सरकारें बन जाना एक बात है, लेकिन यह एक बिल्कुल ही अलग बात है कि इतिहास को इस हद तक, इस तरह न बदल दिया जाए कि भविष्य का वर्तमान भी तबाह हो जाए।
आज गोवंश के एक निहायत गैरजरूरी मुद्दे को देश का सबसे जरूरी मुद्दा बनाकर इस हद तक उन्माद फैलाया जा रहा है कि मानो मोदी की किसी और योजना की देश को जरूरत नहीं है, और गोबर और गोमूत्र से सारा देश चल जाएगा। यह सोच देश का इतना लंबा नुकसान कर रही है कि उतने लंबे वक्त के लिए किसी पार्टी को सरकार चलाने का हक भी नहीं मिलता है।

बस्तर में मुठभेड़-मौत की न्यायिक जांच तो ठीक है लेकिन जज बाहरी होना था

संपादकीय
19 जुलाई  2016
बस्तर में एक युवती की पुलिस मुठभेड़ में बताई गई मौत, और उसे नक्सली बताने के बाद उसके परिवार और आदिवासी समुदाय ने हाईकोर्ट तक दौड़ लगाई, और उसका दुबारा पोस्टमार्टम हुआ, और अब हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के आरोप वाले इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। इसके पहले भी हाईकोर्ट ने बस्तर में पदस्थ वहां के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से पोस्टमार्टम करवाया था, अब न्यायिक जांच भी बस्तर के ही एक जिला न्यायाधीश करेंगे।
यह एक अच्छी बात है कि अदालत बस्तर से आने वाले बेबस आदिवासियों के ऐसे मुद्दों पर सीधे दखल देकर मेडिकल जांच या न्यायिक जांच करवा रही है, लेकिन इसके साथ-साथ फिक्र की एक बात यह भी है कि इसके लिए बस्तर में तैनात लोग ही लगाए जा रहे हैं। जो लोग बस्तर के हालात से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि वहां पर इस कदर फौलादी पुलिस-राज चल रहा है कि बाकी विभाग और अदालतों में भी पुलिस का दखल है। अभी कुछ ही अरसा हुआ है कि बस्तर के एक जज ने शिकायत की थी कि किस तरह प्रशासनिक अधिकारी उन्हें फोन पर धमका रहे हैं, और इसके बाद शायद किसी और मामले में इस जज को ही बर्खास्त कर दिया गया। जिले के अफसर और इस जज के बीच बातचीत बताई जा रही एक टेलीफोन रिकॉर्डिंग भी सामने आई थी, और हमारे सरीखे लोगों को यह उम्मीद थी कि हाईकोर्ट इसका नोटिस लेकर इसकी जांच का हुक्म देगा क्योंकि यह न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कार्यपालिका की एक भयानक दखल का मामला दिख रहा था।
बस्तर में होने वाली किसी भी जांच को लेकर हम हाईकोर्ट से इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि वहां पोस्टमार्टम दुबारा करवाना हो, या कि वहां कोई न्यायिक जांच करवानी हो, इसके लिए बाहर के अफसरों और जजों से ही काम लिया जाना चाहिए। बस्तर में जिसके चाहे उसके टेलीफोन टैप होते हैं, हर किसी के कॉल डिटेल्स निकलवाने का दावा पुलिस खुलेआम करती है, और सोशल मीडिया पर पुलिस की दी हुई धमकियां भी तैरती रहती हैं। ऐसे में बस्तर में तैनात लोग जाहिर है कि पुलिस के ऐसे राज के भीतर जी रहे हैं, और भ्रष्टाचार से परे भी उनकी निजी जिंदगी की कई ऐसी बातें हो सकती हैं जिन्हें रिकॉर्ड करके पुलिस उन पर एक दबाव बना सकती है, या बनाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट को बस्तर में तैनात जिला जज से जांच करवाने के बजाय बाहर के जज से जांच करवाना था।
बस्तर के हालात पर लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन ये तमाम वे बातें हैं जिन पर हम बार-बार लिखते आए हैं, और इस राज्य में उन बातों का असर खत्म सा हो गया है। अभी बस्तर से दिल्ली जाकर पे्रस कांफे्रंस लेने वाले कुछ पत्रकारों के खिलाफ बस्तर के एक पुलिस अफसर ने एक वॉट्सएप गु्रप में जिस तरह की धमकी लिखकर पोस्ट की है वह हक्का-बक्का करने वाली है। उसने इन लोगों को चोर और नक्सलियों के पालतू कुत्ते लिखते हुए याद दिलाया है कि ये लोग डंडा भूल गए हैं, और न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। ऐसी बात लिखने का मतलब राज्य सरकार चाहे न भी जानना चाहे, लेकिन कोई भी जागरूक न्यायपालिका इस पर नोटिस जारी करके इस अफसर से पूछ सकती है कि यह धमकी किसके लिए है, और किसे मिटाया जाएगा? बस्तर का यह सिलसिला खतरनाक है, और दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस युग में भी, आदिवासियों के साथ जिस देश में भी ज्यादातियां हुई हैं वहां की सरकार के सभ्य और लोकतांत्रिक होने के बाद भी उन आदिवासियों से माफी मांगी गई है।

प्रदेश में फिजूलखर्ची और बर्बादी दोनों रोकनी चाहिए

संपादकीय
18 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महल की तरह बनाए गए म्युनिसिपल के मुख्यालय के छत की तस्वीर आई है जहां पर स्कूली बच्चियों को सरकारी योजना के तहत बांटने के लिए बड़ी संख्या में साइकिलें खरीदी गईं, और किसी वजह से वे छत पर पड़ी रहीं, और अब बुरी तरह से जंग लगकर वे खराब हो रही हैं। यह प्रदेश अपनी खनिज कमाई के चलते बाकी कई प्रदेशों के मुकाबले कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाला तो है, लेकिन इसे चलाने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि इस तरह की बर्बादी करने के लिए पैसा प्रदेश के पास नहीं है। अभी विधानसभा में सरकार यह जवाब दे ही रही है कि सैकड़ों करोड़ रूपए की मजदूरी ग्रामीण मजदूरों को देना बकाया है, और केन्द्र सरकार से रकम मिलने के पहले वह चुकारा मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ इस तरह की बर्बादी कोई अकेली बात नहीं है। छात्राओं के लिए साइकिलों का यह हाल है, और प्रदेश में शायद ही कोई ऐसी स्कूल हो जहां पर एक या अधिक कमरे टूटे हुए फर्नीचर से भरे हुए न हों। फर्नीचर खरीदे जाते हैं, और कुछ महीनों के भीतर ही वे टूट-फूट जाते हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल सरकार के कई दूसरे विभागों का है, जहां पर महंगे दाम पर खरीदी हो रही है, कहीं पर दवा खराब हो रही है, तो कहीं चिकित्सा केन्द्रों में जांच की मशीनों में पड़े-पड़े जंग लग रहा है। कृषि विभाग से जुड़े कुछ दफ्तरों में खेती की मशीनें जंग खा रही हैं, और बीज छांटने की मशीन हो, या कोई और मशीन हो, खरीदने तक सबकी दिलचस्पी रहती है, उसके बाद उसका इस्तेमाल न हो, तो भी किसी को फिक्र नहीं है।
राजधानी के नगर निगम को देखें, तो उसकी इमारत को लंबा-चौड़ा खर्च करके एक महल की शक्ल का बनाया गया है। सरकार में बैठे लोगों को ऐसी फिजूलखर्ची बड़ी सुहाती है, और बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि उनकी गाडिय़ां बड़ी हों, उनके दफ्तर बड़े हों, उनके बंगले बड़े हों, उनके कर्मचारी अधिक हों, और किफायत तो मानो सरकार को छू नहीं गई है। नतीजा यह है कि इसी म्युनिसिपल को लेकर अखबारों में हर कुछ महीनों में यह लिस्ट छपती है कि यहां के कितने कर्मचारी राज्य के किस-किस नेता और अफसर के बंगलों पर तैनात हैं, और उनका पैसा जनता की जेब से जाता है।
एक तरफ तो सरकारी योजनाओं और सरकारी सामान की बर्बादी, और दूसरी तरफ सरकारी कामकाज में रईसी की फिजूलखर्ची। इन दोनों को मिलाकर राज्य सरकार का मिजाज ऐसा हो गया है कि किसी दिन अगर किफायत की जरूरत पड़ी, तो सत्ता को समझ ही नहीं आएगा कि किस खर्च को घटाया जाए। और आज भी ऐसा नहीं है कि प्रदेश के गरीबों की सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। आज भी शहर से लेकर गांव तक गरीब की जिंदगी मुश्किल है, और राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भी कमरों की कमी से, बिस्तरों की कमी से मरीजों के फर्श पर पड़े रहकर इलाज कराने की तस्वीरें अखबारों में छपती रहती हैं। ऐसे प्रदेश में जहां पर मजदूरों का सैकड़ों करोड़ का भुगतान बकाया है, सरकार में पैसों की इतनी बर्बादी रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस राज्य की कमाई का अधिकांश श्रेय तो धरती को है जो कि यहां से कोयला, लोहा, और चूना-पत्थर जैसे खनिज देती है। उस कमाई से परे भी इस राज्य ने बहुत कम जोड़ा है, और खर्च ही खर्च सीखा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह वित्त मंत्री भी हैं, और उन्हें फिजूलखर्ची रोकने, और बर्बादी रोकने का एक अभियान चलाना चाहिए। यह बात ठीक है कि आज लोहे-कोयले की कमाई से यह प्रदेश खासी सहूलियत वाला है, लेकिन जनता की जरूरतें अभी पूरी होने से कोसों दूर है, और ऐसे में लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी किफायत की होनी चाहिए।

राजा और प्रजा के बीच मीडिया का एकाधिकार खत्म, अब सीधा संवाद

संपादकीय
17 जुलाई  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर कुछ हफ्तों में अपने मन की बात रेडियो पर कहना शुरू किया, तो भूला-बिसरा रेडियो फिर खबरों में आया। इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हर महीने रेडियो पर प्रदेश की जनता से बातचीत शुरू की, तो ऐसे हर प्रसारण में कई खबरें भी निकलने लगीं, और लोगों का सवाल पूछना भी शुरू हुआ। इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज इंटरनेट पर लोगों के सवालों के जवाब दिए, और अपने मन की बातें भी कहीं। पिछले कुछ बरसों से भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से आम जनता नेताओं से, और सार्वजनिक जीवन के बाकी लोगों से सीधे सवाल पूछने लगी है, और बहुत से सवालों के या तो जवाब मिलने लगे हैं, या फिर यह उजागर होने लगा है कि इन सवालों के जवाब नहीं दिए जा रहे हैं। कुछ अरसा पहले तक ऐसे लोगों से सवाल पूछने का हक संसद या विधानसभा के भीतर वहां के सदस्यों का होता था, और इन सदनों के बाहर मीडिया का होता था। लेकिन अब ये एकाधिकार पूरी तरह धराशायी हो चुके हैं, और अब जनता को ऐसे ईश्वरों तक पहुंचने के लिए किसी पुजारी की जरूरत नहीं पड़ती है।
लोकतंत्र में जनता से सीधे बातचीत बहुत मायने रखती है, और लोगों के खुले सवालों का सामना करने के लिए थोड़ा सा हौसला भी लगता है। अब यह एक अलग बात है कि कौन से नेता कितने सवालों और कैसे सवालों का जवाब देने की हिम्मत रखते हैं, और कौन है जो महज अपने मन की बात कहकर बात खत्म कर देते हैं। लेकिन यह सिलसिला बहुत नया भी नहीं है। हिन्दुस्तान में आजादी के पहले के दिनों को देखें तो गांधी जिन अखबारों के संपादक थे, हरिजन, और यंग इंडिया नाम के इन अखबारों में वे कई बार या अक्सर लोगों के भेजे गए सवालों के जवाब देते थे, और किसी गांव का सरपंच भी फिलीस्तीन जैसे मुद्दे पर गांधी की सोच का जान पाता था। लोग पोस्टकार्ड पर सवाल पूछते थे, और गांधी अखबारों में उनके जवाब देते थे। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को शायद हर कुछ महीनों में, या हर महीने, चिट्ठी लिखना शुरू किया था जिसमें वे देश-प्रदेश के मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक अपनी बात लिखते थे। लिखने का शौक इस तरह रहता था कि नेहरू जेल में रहते हुए बाहर अपनी बेटी इंदिरा के नाम जो चिट्ठियां लिखते थे, वे समकालीन विश्व मुद्दों पर एक गहरी समझ वाली शिक्षा भी रहती थी, और बाद में वे चिट्ठियां किताबों की शक्ल में भी सामने आईं।
वैसे आज की सार्वजनिक और सामाजिक हवा बड़ी जहरीली और दुर्भावना से भरी हुई भी है। लोग सचमुच के सवाल पूछने के बजाय, तरह-तरह की झूठी तस्वीरें गढ़कर अफवाह फैलाने को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता की जिम्मेदारी समझते हैं, और इसके लिए वे कितने भी घटिया स्तर तक उतर आते हैं। ऐसी हवा के बीच यह एक अच्छी बात है कि देश-प्रदेश के नेता लोगों को सवालों के जवाब दें, या कम से कम अपनी बातें खुलकर कहें। यह एक अलग बात है कि इससे हमारी तरह के अखबार वालों का राजा-प्रजा के बीच का हरकारा बनने का एकाधिकार खत्म हो गया है, और आज तो देश का कोई मीडिया नेताओं और बाकी लोगों के सोशल मीडिया पन्नों पर जाकर वहां लिखी गई बातों से खबरें बनाए बिना रह नहीं पाता। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों को एक यह मौका भी मिला है कि जो सवाल पूछे नहीं जा सकते, या कि जो सवाल सुने नहीं जा रहे, तो भी लोग सोशल मीडिया पर उन सवालों को उछालकर एक असुविधा तो खड़ी कर ही सकते हैं। आगे-आगे देखें होता है क्या।

धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है

संपादकीय
16 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान में आज सुबह हो रही और यह खबर आने लगी कि किस तरह तुर्की में एक फौजी बगावत चल रही है और देश के बाहर सफर पर से राष्ट्रपति ने जनता को कहा कि वे सड़कों पर आकर इन बागियों का विरोध करें, और लोग निकलकर टैंकों के सामने खड़े हो गए। कुछ घंटों के भीतर अब ऐसा लग रहा है कि यह विद्रोह काबू में आ गया है, लेकिन इसके पीछे की साजिश में राष्ट्रपति ने एक इस्लामी धर्मगुरू फतहुल्लाह गुलेन की तरफ इशारा किया है जिनके कि लाखों अनुयायी हैं, डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में उनके स्कूल हैं, और अरबों डॉलर का उनका कारोबार है। पिछले दशकों से वे अमरीका में बस गए हैं, और ऐसा माना जाता है कि वे तुर्की की सरकार के खिलाफ बगावत भड़काते रहते हैं।
जिस वक्त आज सुबह तुर्की से यह खबर आ रही थी, उसी वक्त कल सुबह फ्रांस में एक इस्लामी आतंकी ने एक ट्रक लोगों के जश्न पर चढ़ा दी, और कोशिश करके अधिक से अधिक लोगों को कुचलकर मारा। इस हमले में 75 लोग मारे गए, और यह इस्लामी आतंक का एक नया तरीका सामने आया जिसमें बिना किसी हथियार या विस्फोटक के, रोज के इस्तेमाल की एक ट्रक से इतने लोगों को मार डाला गया। आज दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने 2014 में एक संदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि अगर आप बम नहीं फोड़ सकते, या गोली नहीं चला सकते, तो उन पर अपनी कार चढ़ा दो, ऐसा माना जा रहा है कि यह ताजा हमला इसी बात को मानकर ट्रक से किया गया। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देख रहे हैं कि किस तरह कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ हिन्दू संगठन आतंक में लगे हुए हैं। और हिन्दू संगठनों पर तो यह कार्रवाई केन्द्र की मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली देश की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी एनआईए कर रही है, और अदालत में इस बात को सुबूतों के साथ रख रही है।
पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और पड़ोस के म्यांमार तक धर्म के लिए लगातार हिंसा चल रही है, और इन धर्मों के मानने वाले बाकी लोग यह आड़ लेते हैं कि यह हिंसा धर्म के लिए नहीं है, धर्म के नाम पर है। कहने को यह भी कहा जाता है कि सभी धर्म शांति सिखाते हैं, और कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाते हैं। लेकिन यह बात हकीकत से कोसों परे है। धर्म खून बिखेरने से परे भी कई तरह की हिंसा करता है। एक समय धर्म सती बनाता था, देवदासी बनाता था, और अपने ही धर्म के भीतर हिंसा की बहुत सारी तरकीबें हिन्दू धर्म से लेकर इस्लामिक स्टेट तक चारों तरफ अच्छी तरह दर्ज हैं। इसलिए धर्म को शांतिप्रिय करार देना महज एक नारा है जिसका कि सच से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म की हकीकत यह है कि वह अपने आपको कानून से ऊपर, संविधान से ऊपर, लोकतंत्र और इंसानियत से ऊपर मानता है, और उसका बुनियादी मिजाज अराजकता का है, हैवानियत का है, और हिंसा का है। धर्म में अपने अलावा दूसरे धर्मों को कुचल देने की सोच कूट-कूटकर भरी रहती है, और हम हिन्द महासागर के देशों में चारों तरफ इसके नमूने देख रहे हैं। और जब किसी धर्म के लोगों को, उसके आतंकियों को मारने के लिए दूसरे धर्म के लोग नहीं मिलते, तब वे अपने ही धर्म के लोगों को मारना शुरू कर देते हैं, जैसा कि आज इस्लामी आतंकी कर रहे हैं, उनके मारे हुए लोगों में सौ में से निन्यानबे मुस्लिम ही हैं।
अभी तस्लीमा नसरीन ने एक बात कही थी कि जो बच्चे बचपन से ही धर्मग्रंथ जरूरत से अधिक पढऩे लगते हैं, उनके मां-बाप को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि आगे चलकर उनके आतंकी होने का खतरा रहता है। यह बात हमारे हिसाब से अधिकतर धर्मों पर लागू होती है, और दुनिया में समझदार लोगों को इस पर सोचने की जरूरत है कि किस तरह धर्म की भूमिका को आस्था तक सीमित रखा जाए, और निजी आस्था को दूसरों की आस्थाओं का खून बहाने जैसा हिंसक बनने से रोका जाए। आज तो चारों तरफ, धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है। 

सानिया मिर्जा की तरह विरोध करना सीखने की जरूरत

संपादकीय
15 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान की सबसे कामयाब महिलाओं में से एक, टेनिस की दुनिया की अव्वल दर्जे की खिलाड़ी, सानिया मिर्जा ने अभी दो दिन पहले एक नामी-गिरामी टीवी पत्रकार को एक इंटरव्यू के दौरान बेजुबान कर दिया, और उसे माफी मांगनी पड़ी। इस पत्रकार ने पूछा था कि वे कब बसने वाली हैं, कब मां बनने वाली हैं? इस पर सानिया का कहना था कि वह पत्रकार निराश लग रहा है क्योंकि उन्होंने इस वक्त मां बनने के बजाय दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनना चुना है। सानिया ने कहा कि ऐसे कई मौके रहते हैं जब महिलाओं को ही ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है, और आदमियों को ऐसे सवाल कभी नहीं घेरते।
यह अच्छी बात है कि ऐसी बारीक बातचीत के फर्क को जानते और गिनाते हुए सानिया ने एक दिग्गज टीवी पत्रकार को घेर दिया, और माफी मंगवा ली। इसी वक्त देश के कई अलग-अलग हिस्सों में राजनीति और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं किसी नेता या अफसर को नालायकी पर सजा के तौर पर चूडिय़ां भेंट कर रही होंगी, और अपनी बातचीत की जुबान में औरत शब्द की जगह आदमी को काफी मान रही होंगी। बहुत सी महिलाएं इस फेर में होंगी कि परिवार की अपने से छोटी महिलाओं का भू्रण परीक्षण करवाकर अजन्मी कन्याओं की हत्या करवा दें, और बहुत सी आस्थावान महिलाएं पुत्र जन्म के लिए तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान करने में लगी होंगी।
जिस सानिया मिर्जा की वजह से न सिर्फ उसके परिवार का सिर पूरी दुनिया में ऊंचा हुआ है, बल्कि हिंदुस्तान का नाम भी रौशन हुआ है, उस सानिया की जगह अगर कोई सोनू मिर्जा पैदा हुआ होता, और नालायक निकल गया होता तो वह किस काम का रहता? और देश भर में अनगिनत ऐसी लड़कियां हैं जो कि शादी के पहले या शादी के बाद भी अपने मां-बाप का ख्याल रखती हैं, और मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ देने वाले खानदान के चिराग बेटों के मुकाबले उनकी सेवा करती हैं। ऐसे में समाज को महिलाओं के लिए अपना नजरिया बदलना चाहिए, और इसकी शुरूआत खुद महिलाओं को भी करनी चाहिए कि वे अपनी बातचीत में, अपनी भाषा में, अपने उदाहरणों में, कहावतों और मुहावरों में, प्रतीकों में कहीं भी महिला-तबके की कमजोरी न मानें, न बताएं। और इसके लिए यह भी जरूरी रहेगा कि महिलाओं को गैरबराबरी की नौबत आने पर चुप रहने के बजाय विरोध करना होगा, और आसपास के लोगों को याद दिलाना होगा कि उनका दर्जा न सिर्फ बराबरी का है, बल्कि मर्दों को पैदा करने वाली औरतों का भी है।
न सिर्फ हिंदी में, या हिंदुस्तानी जुबानों में, बल्कि दुनिया की बहुत सी दूसरी भाषाओं में भी औरतों के लिए गैरबराबरी और हिकारत का नजरिया रहता है। हम इसी कॉलम में हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर लिखते हैं कि किस तरह हिंदी का नरभक्षी, उर्दू में आदमखोर और अंगे्रजी में मैनईटर हो जाता है, मानो कि किसी शेर या चीते को औरत खाने के लायक भी नहीं रहती है। जब हिरोशिमा में बड़े पैमाने पर लोग मारे जाते हैं, या भोपाल में गैस त्रासदी होती है तो उसे नरसंहार कहा जाता है, मानो कि कोई नारी इसमें मरी ही न हो। इस तरह भाषा का सामाजिक रूख गैरबराबरी का रहते आया है, और जहां-जहां ऐसे शब्द सामने आएं, उनका खुलकर विरोध किया जाना चाहिए।

सहअस्तित्व का महत्व समझने की जरूरत है

संपादकीय
14 जुलाई  2016
अफ्रीकी देश सूडान में खड़े हुए भारी घरेलू तनाव को देखते हुए वहां काम कर रहे सैकड़ों हिन्दुस्तानियों को सुरक्षित वापिस लाने के लिए विदेश राज्यमंत्री, पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह एयरफोर्स के विमानों के साथ वहां पहुंचे हैं, और लोगों को हिफाजत से वापिस लाने में लगे हैं। पिछले दो बरस में कुछ और देशों से हिन्दुस्तानियों को इसी तरह निकालकर लाना पड़ा है क्योंकि खाड़ी के  देशों से लेकर अफ्रीकी देशों तक दसियों लाख हिन्दुस्तानी कारोबारी और कामगार हैं, और उनकी जिंदगी भी इस देश के लिए मायने रखती है, और उनकी कमाई भी। लेकिन ऐसे मौके पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि उन देशों के स्थानीय तनाव से अगर मजबूरी में हिन्दुस्तानियों को निकलना पड़े, तो यह अलग बात है, लेकिन बीच-बीच में ऐसा भी हो रहा है कि भारत में किसी अफ्रीकी पर्यटक या छात्र को मार दिया गया, और उसका जवाबी तनाव अफ्रीका के देशों में वहां रह रहे हिन्दुस्तानियों को झेलना पड़ा है। अभी इसी पखवाड़े की बात है कि ऐसे ही एक देश में हिन्दुस्तानियों की दुकानों को जला दिया गया।
लेकिन ऐसी जवाबी हिंसा देश के बाहर ही होती हो, यह जरूरी नहीं है। देश के भीतर भी ऐसी जवाबी हिंसा होती है, और कश्मीर, उत्तर-पूर्व, महाराष्ट्र, यूपी-बिहार में कुछ दूसरे इलाके के लोगों के लिए तनाव होता है, या इन प्रदेशों के लोगों के लिए बाकी प्रदेशों में कहीं तनाव होता है, तो उसकी हिंसक प्रतिक्रिया भी होती है। लोगों को याद होगा कि महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को भगाने का काम जमाने से शिवसेना के दोनों हिस्से करते आ रहे हैं, उनके खिलाफ हिंसा भी करते आ रहे हैं, और फतवे भी जारी करते आ रहे हैं। पिछले बरस की ही बात है कि कर्नाटक से उत्तर-पूर्व के लोगों को मारकर भगाया गया, और ट्रेनों में भर-भरकर लोग वहां से निकले। भारत जैसे विविधता वाले देश में जाति के आधार पर, धर्म या क्षेत्रीयता के आधार पर, पहरावे और खानपान के आधार पर कई बार ऐसा हिंसक भेदभाव होता है। अभी तीन दिन पहले ही दिल्ली एयरपोर्ट पर मणिपुर की एक युवती से विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने ऐसा बर्ताव किया कि उसे अपनी राष्ट्रीयता साबित करने को कहा गया।
देश के भीतर हो या कि दुनिया के दूसरे देशों में, एक जगह की प्रतिक्रिया दूसरी जगह होती है, एक हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा से दिया जाता है, और हर जगह एक बात आम रहती है कि दूसरों से हिंसा करने वाले लोग ऐसे रहते हैं जिनके अपने कोई लोग उन दूसरे लोगों के देश-प्रदेश में बसे हुए नहीं रहते हैं। आज ऐसे ही मौके पर नेहरू की सोच याद पड़ती है और यह भी कि किस तरह उन्होंने भिलाई जैसे आधुनिक औद्योगिक तीर्थ बनाए थे जहां कि देश के हर कोने से आए हुए लोग मिलकर काम करते थे, आज भी करते हैं, और उनके बीच एक राष्ट्रीय ताने-बाने की सोच विकसित होती है, मजबूत बनती है, और कायम रहती है। आज भारत को भड़काऊ बातों से परे रहकर उसी दरियादिली की जरूरत है जिसके साथ नेहरू कश्मीर को एक अलग दर्जा देकर उसके हक को मानते थे। आज उसे नकारकर भारत की सरकार या भारत के लोग किसी किनारे नहीं पहुंच सकते। जिन लोगों को कश्मीर महज एक राज्य समझ पड़ता है, उनको यह भी समझना चाहिए कि बाकी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच का यह राज्य देश की फौजी जरूरतों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग कश्मीर की राजनीतिक समस्या का अतिसरलीकरण करते हुए यह कह बैठते हैं कि एक बार कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान में शामिल होने दिया जाए और फिर उनको अकल आ जाएगी। लेकिन इन लोगों को उन फौजियों की जिंदगी की कीमत नहीं मालूम है जो कि सरहद को बचाने के लिए शहीद होते हैं। जिस दिन कश्मीर पाकिस्तान चले जाएगा, उस दिन पंजाब से लगी हुई सरहद देश के लिए कितनी महंगी पड़ेगी इसका कोई अंदाज आज के फतवेबाजों को नहीं है।
सारी दुनिया को एक-दूसरे से सबक लेना चाहिए। आज अफगानिस्तान से या इराक से हिन्दुस्तानियों को वापिस लाना हो, या कि सूडान से उन्हें वापिस लाया जा रहा है, तो यह महज सरकार के खर्च की बात नहीं है, ऐसे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल भी है, और देश की अर्थव्यवस्था का सवाल भी। इसलिए दुनिया में, और  देश के भीतर भी विविधता का, क्षेत्रीयता का, जातीयता का, और धर्मों का सम्मान करते हुए एक-दूसरे के लिए सहनशक्ति बढ़ाने की जरूरत है और सहअस्तित्व के महत्व को समझने की भी।

कश्मीर के समाधान के लिए पूरे देश में माहौल बदलना होगा

संपादकीय
13 जुलाई  2016
कश्मीर में पिछले कई दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई में मारे गए एक स्वघोषित उग्रवादी नौजवान की मौत के बाद का तनाव जारी है, और दो दर्जन मौतें हो चुकी हैं, केन्द्र और राज्य के सुरक्षा कर्मचारी कश्मीरी लोगों के एक बड़े तबके के हमले झेल रहे हैं, और इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जारी हिन्दुओं की एक बड़ी तीर्थयात्रा, अमरनाथ, पर भी इस तनाव का असर पड़ा है। देश में यह पहला मौका है जब कश्मीर में हो रहीं इतनी अलगाववादी और आतंकी हिंसा के चलते हुए भी भाजपा चुप है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार में हिस्सेदार है। राज्य में कानून व्यवस्था को ठीक रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और उसकी मदद के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से भेजी गई जो फौज और पैरामिलिट्री वहां तैनात है, वह भी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में कश्मीर उस भाजपा के लिए परेशानी का एक बड़ा सबब बन गया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में जनसंघ के दिया छाप के वक्त से धारा 370 खत्म करने, कश्मीर का अलग झंडा खत्म करने, कश्मीर का अलग दर्जा खत्म करने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ते आई थी। हम भाजपा की आज की सत्ता की बेबसी को समझते हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता की अलग-अलग और एक-दूसरे से विपरीत प्राथमिकताएं होती हैं, और उनके चलते आज अगर भाजपा को, और मोदी सरकार को अपना रूख बदलना पड़ रहा है, बर्दाश्त बढ़ाना पड़ रहा है, तो ऐसे में हम उन्हें उनकी पुरानी बातें याद दिलाकर फिर भड़काऊ बातें करना नहीं चाहते। सत्ता की जिम्मेदारी लोगों को सहनशील बना देती हैं, और विपक्ष की बेफिक्री लोगों को गैरजिम्मेदार भी बना देती है। यह एक अच्छी नौबत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मोर्चे से लेकर कश्मीर के मुद्दों तक केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नजरिए से सोचना और काम करना पड़ रहा है, और यह बात लोकतंत्र के लिए एक नई विकसित हो रही समझ की भी है।
जहां तक सवाल कश्मीर का है, तो वहां के नौजवानों के एक तबके में अलगाववादी या कि उग्रवादी, या आतंकी सोच कोई नई बात नहीं है। और इसके पीछे के कई ऐतिहासिक कारण हैं, और उनका कोई आसान हल भी नहीं है। फिर यह भी है कि देश भर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथी मंत्री और पार्टी पदाधिकारी किस तरह से मुस्लिमों को लेकर भड़काने वाली बातें करते हैं, उन बातों को लेकर मुस्लिमों से भरी हुई कश्मीर घाटी में भी बेचैनी होती है। भारत जैसे देश में यह नहीं हो सकता कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर उत्तर-पूर्व की एक लड़की से परदेसी जैसा बर्ताव किया जाए, और फिर यह उम्मीद की जाए कि उत्तर-पूर्वी लोग अपने आपको देश का हिस्सा मानकर चलें। वे लोग तो अपने को हिन्दुस्तानी मानते हैं, लेकिन बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक उनको सड़कों पर पीटने वाले बाकी हिन्दुस्तानी उनको इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट का मानते हैं कि मानो वह इलाका भारत से बाहर का हो। कमोबेश यही हाल कश्मीर को लेकर देश में कई जगह लोगों के बर्ताव में आता है, और इसके जवाब में कश्मीर के लोगों के मन में भी ऐसी बात आती है कि वे अपने आपको कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान को इंडिया कहते हैं।
किसी भी इलाके में सुरक्षा बलों की बंदूकें जब बहुत लंबे समय तक तैनात रहती हैं, तो वहां स्थानीय लोगों पर कई किस्म की ज्यादतियां होने लगती हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर लगे आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, वरना मणिपुर और कश्मीर जैसी जगहों पर फौज एक ऐसे खास कानून के साये में आरोपों से परे बैठती है जो कि उन्हें स्थानीय लोगों के आरोपों से बचाने के लिए बनाया गया है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों में नाराजगी, और शायद नफरत भी, उबल रही है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई सुनवाई आसानी से हो नहीं रही है। इसलिए कश्मीर में फौज की लगातार मौजूदगी में जनता के एक तबके के बीच में लगातार बागी तेवर खड़े किए हैं, और इससे निपटना कोई आसान बात नहीं है।
केन्द्र सरकार ने आज कश्मीर पर एक बैठक की है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव की मौजूदगी में कश्मीर पर ही चर्चा हुई है। इसमें विदेश मंत्री और विदेश सचिव की मौजूदगी यह बात जाहिर करती है कि कश्मीर के मामले से देश की विदेश नीति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कैसे जुड़ी हुई है। अभी हम वहां की जटिल स्थिति को लेकर कोई तुरत-समाधान सुझाना नहीं चाहते, लेकिन हमारा यह पक्का मानना है कि जब तक पूरे देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को बचाने के लिए ठोस कोशिशें नहीं होंगी, और अल्पसंख्यकों या सरहदी लोगों के खिलाफ दिल्ली से हिकारत और नफरत दिखेगी, तब तक कश्मीर का कोई स्थानीय हल नहीं निकल पाएगा। कश्मीर की सोच बाकी देश के माहौल से जुड़ी रहेगी, और इस सोच को तबाह करने के लिए पिछले दो बरसों में देश में बहुत सी घटनाएं हुई हैं, और दिल्ली को पहले अपना घर सुधारना होगा, वरना श्रीनगर के पास कोई समाधान नहीं होगा।

कश्मीर के समाधान के लिए पूरे देश में माहौल बदलना होगा

संपादकीय
12 जुलाई  2016
कश्मीर में पिछले कई दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई में मारे गए एक स्वघोषित उग्रवादी नौजवान की मौत के बाद का तनाव जारी है, और दो दर्जन मौतें हो चुकी हैं, केन्द्र और राज्य के सुरक्षा कर्मचारी कश्मीरी लोगों के एक बड़े तबके के हमले झेल रहे हैं, और इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जारी हिन्दुओं की एक बड़ी तीर्थयात्रा, अमरनाथ, पर भी इस तनाव का असर पड़ा है। देश में यह पहला मौका है जब कश्मीर में हो रहीं इतनी अलगाववादी और आतंकी हिंसा के चलते हुए भी भाजपा चुप है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार में हिस्सेदार है। राज्य में कानून व्यवस्था को ठीक रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और उसकी मदद के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से भेजी गई जो फौज और पैरामिलिट्री वहां तैनात है, वह भी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में कश्मीर उस भाजपा के लिए परेशानी का एक बड़ा सबब बन गया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में जनसंघ के दिया छाप के वक्त से धारा 370 खत्म करने, कश्मीर का अलग झंडा खत्म करने, कश्मीर का अलग दर्जा खत्म करने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ते आई थी। हम भाजपा की आज की सत्ता की बेबसी को समझते हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता की अलग-अलग और एक-दूसरे से विपरीत प्राथमिकताएं होती हैं, और उनके चलते आज अगर भाजपा को, और मोदी सरकार को अपना रूख बदलना पड़ रहा है, बर्दाश्त बढ़ाना पड़ रहा है, तो ऐसे में हम उन्हें उनकी पुरानी बातें याद दिलाकर फिर भड़काऊ बातें करना नहीं चाहते। सत्ता की जिम्मेदारी लोगों को सहनशील बना देती हैं, और विपक्ष की बेफिक्री लोगों को गैरजिम्मेदार भी बना देती है। यह एक अच्छी नौबत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मोर्चे से लेकर कश्मीर के मुद्दों तक केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नजरिए से सोचना और काम करना पड़ रहा है, और यह बात लोकतंत्र के लिए एक नई विकसित हो रही समझ की भी है।
जहां तक सवाल कश्मीर का है, तो वहां के नौजवानों के एक तबके में अलगाववादी या कि उग्रवादी, या आतंकी सोच कोई नई बात नहीं है। और इसके पीछे के कई ऐतिहासिक कारण हैं, और उनका कोई आसान हल भी नहीं है। फिर यह भी है कि देश भर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथी मंत्री और पार्टी पदाधिकारी किस तरह से मुस्लिमों को लेकर भड़काने वाली बातें करते हैं, उन बातों को लेकर मुस्लिमों से भरी हुई कश्मीर घाटी में भी बेचैनी होती है। भारत जैसे देश में यह नहीं हो सकता कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर उत्तर-पूर्व की एक लड़की से परदेसी जैसा बर्ताव किया जाए, और फिर यह उम्मीद की जाए कि उत्तर-पूर्वी लोग अपने आपको देश का हिस्सा मानकर चलें। वे लोग तो अपने को हिन्दुस्तानी मानते हैं, लेकिन बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक उनको सड़कों पर पीटने वाले बाकी हिन्दुस्तानी उनको इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट का मानते हैं कि मानो वह इलाका भारत से बाहर का हो। कमोबेश यही हाल कश्मीर को लेकर देश में कई जगह लोगों के बर्ताव में आता है, और इसके जवाब में कश्मीर के लोगों के मन में भी ऐसी बात आती है कि वे अपने आपको कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान को इंडिया कहते हैं।
किसी भी इलाके में सुरक्षा बलों की बंदूकें जब बहुत लंबे समय तक तैनात रहती हैं, तो वहां स्थानीय लोगों पर कई किस्म की ज्यादतियां होने लगती हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर लगे आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, वरना मणिपुर और कश्मीर जैसी जगहों पर फौज एक ऐसे खास कानून के साये में आरोपों से परे बैठती है जो कि उन्हें स्थानीय लोगों के आरोपों से बचाने के लिए बनाया गया है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों में नाराजगी, और शायद नफरत भी, उबल रही है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई सुनवाई आसानी से हो नहीं रही है। इसलिए कश्मीर में फौज की लगातार मौजूदगी में जनता के एक तबके के बीच में लगातार बागी तेवर खड़े किए हैं, और इससे निपटना कोई आसान बात नहीं है।
केन्द्र सरकार ने आज कश्मीर पर एक बैठक की है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव की मौजूदगी में कश्मीर पर ही चर्चा हुई है। इसमें विदेश मंत्री और विदेश सचिव की मौजूदगी यह बात जाहिर करती है कि कश्मीर के मामले से देश की विदेश नीति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कैसे जुड़ी हुई है। अभी हम वहां की जटिल स्थिति को लेकर कोई तुरत-समाधान सुझाना नहीं चाहते, लेकिन हमारा यह पक्का मानना है कि जब तक पूरे देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को बचाने के लिए ठोस कोशिशें नहीं होंगी, और अल्पसंख्यकों या सरहदी लोगों के खिलाफ दिल्ली से हिकारत और नफरत दिखेगी, तब तक कश्मीर का कोई स्थानीय हल नहीं निकल पाएगा। कश्मीर की सोच बाकी देश के माहौल से जुड़ी रहेगी, और इस सोच को तबाह करने के लिए पिछले दो बरसों में देश में बहुत सी घटनाएं हुई हैं, और दिल्ली को पहले अपना घर सुधारना होगा, वरना श्रीनगर के पास कोई समाधान नहीं होगा।

एक सदी की कोशिश के बाद हासिल कामयाबी

संपादकीय
11 जुलाई  2016
इस बार के यूरोपियन फुटबॉल के एक रोमांचक मैच में कल रात पुर्तगाल ने फ्रांस की जमीन पर खेलते हुए फ्रांस को हराकर चैंपियनशिप हासिल की है और उसकी यह मेहनत करीब एक सदी बाद रंग लाई है। इस बीच खिलाडिय़ों की कम से कम 20 पीढिय़ां आई-गई हो गई होंगी और इस टूर्नामेंट में मेहनत करते-करते पुर्तगाल को पहली बार यह जीत हासिल हुई है। इस खबर के साथ ही यह जानकारी भी सामने आई है कि पुर्तगाल ने फ्रांस को 41 बरस बाद हराया है। अब इस मुद्दे पर लिखने को विचार तो बहुत अधिक नहीं हो सकते, लेकिन कितनी मेहनत से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है, इसकी एक मिसाल पुर्तगाल की इस जीत से सामने आती है।
हिन्दुस्तान की हिन्दी जुबान में बड़े जानकार की लिखी हुई एक बात कही जाती है- रसरि आवत-जात से सिल पर परत निसान...। मतलब यह कि कुएं की पाल पर जिस जगह से लोग पानी निकालते हैं, वहां पर रस्सी से घिस-घिसकर पाल के पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि किसी मंदिर-मस्जिद में मत्था टेक-टेककर माथे पर निशान पड़ जाता है। बहुत से दूसरे लोग यह नसीहत भी देते हैं कि करत-करत अभ्यास से, जड़मति होत सुजान..., मतलब यह कि कोशिश करते-करते मूर्ख भी ज्ञानी हो सकते हैं। कुछ ऐसा ही हाल पुर्तगाल की मेहनत के पीछे दिखता है जहां पर लोगों की कई पीढिय़ां ऐसी जीत के इंतजार में गुजर चुकी होंगी, और दस बरस की औसत खेल जिंदगी वाले खिलाडिय़ों की तो दस पीढिय़ां पुर्तगाल की फुटबॉल टीम में खेल-खेलकर निकल गई होंगी।
वैसे तो खेल में जीत और हार लगी ही रहती है, लेकिन कोई टीम किस तरह अपने सबसे बड़े सितारा खिलाड़ी रोनाल्डो के जख्मी होने के बाद भी मैदान पर डटी रही, और फ्रांस में हो रहे मैच में स्थानीय दर्शकों के समर्थन के बाद भी हौसले से खेलकर जिस तरह पुर्तगाल ने मैच जीता, उससे जिंदगी के अलग-अलग बहुत से दायरों के सभी लोगों को सीखने को कुछ न कुछ मिलता है। मुकाबला तो खेल के मैदान में भी होता है, इम्तिहान में भी होता है, और किसी कारोबार से लेकर किसी जगह की नौकरी में भी साथी कामगारों के साथ काम का मुकाबला भी होता है। बहुत से लोग हौसला खोकर, थककर बीच में बैठ जाते हैं, या कि दौड़ या सफर छोड़ बैठते हैं। ऐसे लोगों को 95 बरस बाद पुर्तगाल को मिली इस जीत को याद रखना चाहिए। और ऐसी जीत कारोबार की तरह किसी नाजायज तरीके से हासिल होने वाली जीत नहीं होती, इम्तिहान में नकल करके, या भोपाल की तरह पर्चे खरीदकर होने वाली जीत नहीं होती, यह किसी दफ्तर में बॉस की चापलूसी करके सहकर्मियों के ऊपर पाई हुई जीत भी नहीं होती, यह तो खुले मैदान में सैकड़ों करोड़ दर्शकों की नजरों के सामने मुकाबला करके पाई हुई एक निहायत पारदर्शी जीत होती है, और दुनिया की एक महाशक्ति फ्रांस की टीम के सामने एक कमजोर देश पुर्तगाल ने भी ऐसी जीत पाकर दिखाई है। इन नतीजों को इन ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ जोड़कर लोगों को देखना चाहिए कि वे अपनी जिंदगी के दायरे में कोशिश और जीत का कैसा रिश्ता कायम कर सकते हैं। बहुत से जगहों पर यह बात पढऩे मिलती है कि थककर हार मानने वाले बहुत से लोग यह नहीं जानते कि जीत या कामयाबी बस कुछ ही कदम दूर खड़ी हुई थी।

बाढ़ से हुई तबाही से मिलने वाली नसीहतें

संपादकीय
10 जुलाई  2016
मध्यप्रदेश में आई बाढ़ से अब तक करीब दर्जन भर मौतों की खबर है, और सरकारी और निजी संपत्ति, सड़कों के ढांचे, इन सबकी भारी तबाही भी हुई है। बाढ़ को लेकर हिंदुस्तान के बहुत से प्रदेश हर बरस जूझते हैं, और चीन से लेकर अमरीका तक अनगिनत ऐसे देश हैं जो कि कुदरत की इस मार से लगातार नुकसान झेलते हैं। कुदरती नुकसानों में  बाढ़ ही अकेली नहीं है, और भूकंप से लेकर सुनामी तक, और सूखे से लेकर बवंडर तक, कई किस्म की मुसीबतें धरती पर आती हैं। इनमें से कुछ तो रोकथाम के लायक रहती हैं, और कुछ शायद नहीं भी रहतीं। लेकिन बाढ़ के लिए इंसान दो किस्म से जिम्मदार हैं, एक तो नदियों के इतने करीब इतनी बड़ी बसाहट कि बाढ़ आने पर लाखों लोगों को हटाने की नौबत आए, और दूसरी जिम्मेदारी यह कि जंगलों और पेड़ों का सफाया करके इंसानों ने बंधी हुई मिट्टी को बहकर नदियों में जाने, और उन्हें पाटने का सिलसिला चला रखा है, जो कि थमता ही नहीं, धीमा भी नहीं होता।
नदियों की बाढ़ से बचने के कई किस्म के तरीके हिंदुस्तान में शायद एक पूरी सदी से चर्चा में हों, लेकिन पिछले चौथाई सदी से तो नदियों को जोड़कर बाढ़ को दूसरी राह दिखाने की चर्चा चल ही रही है। नदी जोड़ योजना तो अब सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के तहत भी केंद्र सरकार को आगे बढ़ानी है, लेकिन उससे सिर्फ बाढ़ घटाने में मदद नहीं मिलेगी, सूखे से बचने में भी मदद मिलेगी, यह एक अलग बात है कि नदी जोड़ योजना से पर्यावरण को होने वाले खतरों पर अभी बहस किसी किनारे पहुंची नहीं है। लेकिन नदी जोड़ योजना से बाढ़ कम होना भी होगा तो उसमें बड़ा वक्त लगेगा, और तब तक इंसान पेड़ों और जंगलों को काट-काटकर, मिट्टी को बारिश के साथ नदियों में पहुंचाकर, उन्हें इस गाद से पाटकर, उथला करके बाढ़ के लायक तैयार करना जारी रखेंगे। इसलिए अभी मध्यप्रदेश की बाढ़ के सिलसिले में किसी ने यह ठीक ही लिखा है कि कुदरत को रिश्वत देकर नहीं रोका जा सकता। इंसान इस अंदाज में नदियों को तबाह कर रहे हैं कि उनकी अगली पीढ़ी को नदियों की जरूरत ही नहीं पडऩा है, जबकि हकीकत यह है कि समंदर से लेकर नदियों तक में साल के कुछ गिनेचुने महीनों में पानी इतना बढऩे लगा है कि नदियों के किनारे बसी और विकसित हुई सभ्यता का डूब जाना उन महीनों में तय सा हो गया है। और अभी तक समंदर के किनारे बसे हुए शहरों का डूबना शुरू होना भी बाकी है।
इसलिए भारत जैसे देश में सरकारों को आज एक तो आने वाली बसाहटों को नदियों से दूर बसाने की अक्लमंदी दिखानी होगी, दूसरा यह कि नदियों तक पहुंचने वाला कैचमेंट का पानी अगर उसके पहले ही बंजर जमीनों में बड़े-बड़े तालाब खोदकर भूजल के लिए रोक दिया जाए, तो भी बाढ़ की मार कुछ घट सकती है। इंसान जमीन के नीचे से पानी हजार-हजार फीट की गहराई से निकाल तो रहे हैं, लेकिन जमीन में पानी वापिस डालने का जिम्मा शहरी म्युनिसिपलों के नोटिसों की शक्ल में खबरों भर के लिए है। राज्य के स्तर पर हम छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय से यह सुझाव देते आ रहे हैं कि नदियों तक पहुंचने वाले पानी को धरती में समाने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर तालाब खोदने चाहिए, फिर चाहे वे आबादी से परे क्यों न हों, और फिर चाहे वे किसी और इंसान या जानवर के काम के क्यों न हों। धरती का भूगोल जहां-जहां ग्राउंड वॉटर रीचार्जिंग के लिए तालाब सुझाए, वहां-वहां ऐसे तालाब तेजी से बनाने चाहिए, तभी भूजल स्तर गिरने से रूकेगा, और नदियों की बाढ़ कम होगी, मिट्टी का बहकर नदियों में जाना भी घटेगा।
छत्तीसगढ़ में बाढ़ से नुकसान असम, बिहार, या मध्यप्रदेश जितना अधिक नहीं होता है, लेकिन यहां भी सड़क-पुलों की तबाही बहुत होती है, और सरकार को इनको बचाने के साथ-साथ पानी को बचाने की भी मिलीजुली सोच पर अमल करना चाहिए।

दूसरी जगहों के हादसों से सबक ले अपने को बचाएं

संपादकीय
9 जुलाई  2016
इंडोनेशिया में ईद के मौके पर लोगों की भीड़ सड़कों पर इतनी रहती है कि हाईवे पर इक्कीस किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम तीन दिन से अधिक चलते रहा, और इसमें फंसे लोगों में से बारह लोगों की मौत हो गई, जिनमें बुजुर्ग अधिक थे। हालांकि यह ट्रैफिक जाम दुनिया का सबसे बड़ा कहा जा रहा है, लेकिन लंबाई अधिक न हो, तो भी कई जगहों पर ऐसी नौबत आती है, और यह जरूरी नहीं कि तीन दिन जाम रहने पर भी लोग मरें।
एक जगह के हादसे से बाकी लोगों को सबक लेना चाहिए, और जिस किस्म का हादसा हुआ है, उससे परे के सबक भी लेने चाहिए। हम अपने आसपास छत्तीसगढ़ को ही देखें, तो यहां बस्तर में केसकाल की घाटी में कई बार एक-एक दिन लंबा ट्रैफिक जाम हो चुका है। भारत में और जगहों पर भी लोग इस तरह फंस चुके हैं। इससे कारों में या दूसरी गाडिय़ों में सड़क पर चलने वाले लोगों को ये सबक लेना चाहिए कि मुसीबत में फंसने पर कम से कम एक-दो दिन गुजारने के लायक कुछ ऐसा सूखा और पैक खाना-पीना रखना चाहिए जिसे कि हर कुछ हफ्तों या महीनों के बाद इस्तेमाल करके, उसकी जगह नया सामान रख लिया जाए। हर लंबे सफर में इतना पानी साथ रखना चाहिए कि कम से कम एक दिन तो उसके सहारे गुजर जाए, क्योंकि दो शहरों के बीच, ढाबों से दूर अगर कहीं गाड़ी बिगड़े या ट्रैफिक जाम हो जाए, तो प्यासे न मरना पड़े। इसी तरह गाड़ी में मोबाइल फोन का चार्जर रखना न भूलें, छोटी-मोटी चोट के इलाज के लिए फस्र्टएड किट रखना कानूनी रूप से भी जरूरी है, लेकिन शायद ही कोई इसका ख्याल रखते हों। इसके अलावा एक टॉर्च रखना ही रखना चाहिए क्योंकि अंधेरे में किसी खराबी या हादसे के वक्त वह जान बचा सकती है। आज कल हाईवे के किनारे की दवा दूकानों पर भरोसा करते हुए लोग बिना पूरी दवा रखे रवाना हो जाते हैं, लेकिन रास्ते में कोई शहर बंद हो, या शहर के पहले ही गाड़ी बिगड़े, या ट्रैफिक जाम हो, तो दवा कहां से मिलेगी?
यह बात लोगों को बड़ी मामूली लग सकती है, और यह भी लग सकता है कि विचारों को लिखने के इस कॉलम का ऐसा हल्का इस्तेमाल क्यों किया जा रहा है। लेकिन हमारे हिसाब से जिंदगी को बचाने वाली बातें चाहे दिखने में बड़ी सहज लगती हों, वे हल्की बात नहीं रहतीं, और भारी महत्व की रहती हैं। इसलिए हमारी यह सिफारिश भी है कि लोगों को शहर के बाहर के लंबे सफर पर जाते हुए ऐसी बहुत सी बातों को ध्यान से देखना चाहिए, बजाय रास्ते पर मिल सकने वाली सहूलियतों पर भरोसा करने के। जिन लोगों को बहुत अधिक गर्म इलाके में सफर करना हो, उन्हें लू से बचने के इंतजाम करके चलना चाहिए और उसके हिसाब से खाना-पीना भी रखना चाहिए। जिन लोगों को बहुत ठंड में सफर करना है, उन्हें कारों के हीटर पर भरोसा करने के बजाय कंबल या गर्म कपड़े भी रखना चाहिए, क्योंकि अगर कार ही खराब हो गई, तो उसका हीटर कहां से काम करेगा? जब कभी किसी दूसरी जगह हादसे होते हैं, तो उनसे सबक लेना भी सीखना चाहिए।

इराक-हमले पर ब्रिटेन की जांच-रिपोर्ट सिखाती है हमलावर-ध्रुवीकरण के खतरे

संपादकीय
8 जुलाई  2016
ब्रिटेन में चिलकॉट कमेटी सात बरस से जांच कर रही थी और उसने अब यह नतीजा सामने रखा है इराक पर अमरीका द्वारा किए गए हमले में ब्रिटेन की भागीदारी अधूरे और अपुष्ट तथ्यों पर टिकी हुई थी, और युद्ध के पहले शांतिपूर्ण राजनीतिक विकल्पों पर विचार नहीं किया गया था। उस वक्त ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से दुनिया को संभावित खतरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था और ऐसी आशंकाएं पूरी तरह बेबुनियाद थीं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस हमले को अमरीकी गिरोह का हमला लिखते आ रहे थे, और अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर को हम युद्ध अपराधी भी लिखते आ रहे थे, और यह वकालत कर रहे थे कि इन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। बरसों से हमारे ऐसा लिखते आने के बाद, अब यह पहली इतनी महत्वपूर्ण जांच-रिपोर्ट सामने आई है, और इसके नतीजे देखकर, इसके निष्कर्षों के मुताबिक ब्रिटेन में बुश-ब्लेयर पर युद्ध अपराध के मुकदमे की मांग की जा रही है। इसके साथ ही यह मांग भी उठ रही है कि ब्रिटेन के जितने सैनिक और नागरिक इस युद्ध में मारे गए और शारीरिक और मानसिक जख्मों के साथ लौटे, उनके लिए मुआवजे की बात भी ब्रिटेन सहित पश्चिमी देशों में उठ रही है। यह बात कही जा रही है कि दुनिया के दो सबसे ताकतर ओहदों पर बैठे हुए लोगों की गलती और जिद का नुकसान इराक और अरब देशों सहित पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा है, और दुनिया में आतंकी हिंसा उसके बाद से लगातार बढ़ते हुए आज अनगिनत देशों में फैल चुकी है। हम लगातार इस बात को भी लिखते आ रहे थे कि अमरीका और उसका गिरोह दुनिया के एक हिंसा और खतरे में झोंक रहे हैं, क्योंकि इन मुस्लिम या इस्लामी देशों में जब पश्चिमी हवाई और जमीनी हमलों में लाखों लोग मारे जा रहे हैं, तो उनका बदला लेने की बात कुछ या अधिक लोगों को तो सूझेगी ही, और आज वही हो रहा है। दुनिया में आतंक इराक पर हमले के पहले जितना था, उससे सैकड़ों गुना अधिक आज है, और जिन व्यापक जनसंहार के हथियारों, रासायनिक हथियारों, का आरोप लगाते हुए सद्दाम हुसैन के इराक पर हमला किया गया, सद्दाम को एक फर्जी अदालती कार्रवाई के बाद मार डाला गया, उसके खिलाफ भी हमने लगातार लिखा था।
दुनिया को यह बात सीखनी चाहिए कि बेकसूरों को मारकर दुनिया की कोई भी ताकत अपनी हिफाजत नहीं खरीद सकती। जिन लोगों ने अपने पूरे कुनबे को, अपनी पूरी बस्ती को, और अपनी पूरी पीढ़ी को गुंडागर्दी के एक हमले में खोया है, उसमेें से सारे के सारे लोग गांधीवादी अहिंसा के हिमायती नहीं हो सकते। और चाहे वह फिलीस्तीन हो, कश्मीर हो, मणिपुर हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर हो, बेकसूरों पर हिंसा के खिलाफ कभी न कभी, कहीं न कहीं से, कोई न कोई हथियार जरूर उठाते हैं। आज हालत यह है कि अमरीका अपनी सरहदों को सीलबंद कर लेने के बाद भी महफूज नहीं है, और वहां बसे हुए लोगों में से ही कई लोग वहां हिंसा की सोच रहे हैं, कर रहे हैं। यही हाल ब्रिटेन का हो रहा है, और यही हाल योरप के उन तमाम देशों का हो रहा है जो कि हमले में चाहे बुश-ब्लेयर के साथ न रहे हों, लेकिन जिन्होंने इस्लाम की खिल्ली उड़ाते हुए कार्टून बनाए, या किसी और तरह की धार्मिक छींटाकशी की। इराक पर हमले के बाद, अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर हमले के बाद जिस तरह का माहौल दुनिया का बना, उसके चलते धार्मिक उन्माद के किनारे बैठे लोग भी उसके लपेटे में आ गए, और उन्होंने भी हथियार उठा लिए। नतीजा यह हुआ कि उस धमाके से उड़े टुकड़े हिन्दुस्तान में भी लोगों को मार रहे हैं, और पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक भी।
लेकिन इससे सिर्फ पश्चिमी देशों, और सिर्फ इस्लाम-समर्थकों या इस्लाम पर हमला करने वाले लोगों को ही सीखने की जरूरत नहीं है। हम अक्सर इस बात को यहां लिखते हैं कि जब कभी धार्मिक उन्माद या साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाएगा, तब-तब ऐसे बोए हुए बीज के पेड़ निकलकर दूर तक जाएंगे, और देर तक ऐसे जहर को फैलाएंगे। जिस किसी धर्म से जुड़ी हुई सोच, जिस किसी देश से जुड़ी हुई राजनीति यह सोचती है कि वह दुनिया के दूसरे धर्म को, या दूसरे इलाके को खत्म कर सकती है, वह गलती पर है। और भारत के लिए भी इस पूरी नौबत में बहुत से सबक हैं। इस देश को भी एक हमलावर-ध्रुवीकरण से बचना चाहिए, क्योंकि उसके नतीजे बेकाबू होंगे।

धर्म के नाम पर जारी हिंसा लोकतंत्र में समाधान के रास्ते

संपादकीय
7 जुलाई  2016
आज जब पूरी मुस्लिम दुनिया, और दुनिया भर के मुस्लिम ईद की नमाज पढ़ रहे थे, सालाना खुशियां मना रहे थे, तब बांग्लादेश में एक बार फिर मजहब के नाम पर दहशत फैलाने वाले लोगों ने धमाका किया, और लाखों की भीड़ के बीच मौतें तो कम हुईं लेकिन यह बात जाहिर हुई कि आतंकियों की नजरों में उस धर्म के किसी त्यौहार का भी कोई मतलब नहीं है, जिस धर्म का नाम लेकर वे हिंसा कर रहे हैं, और लहू बिखेर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत में मुस्लिम समाज के एक प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक की बातों को भड़काऊ और हिंसक मानते हुए उनके खिलाफ प्रतिबंध की मांग की जा रही है, और ईद के इस मौके पर मुंबई में उन पर कार्रवाई के बैनर भी देखने मिले। दो दिन पहले ही यह रिपोर्ट आई थी कि मुस्लिमों के इस पवित्र महीने रमजान में दुनिया में जगह-जगह इस्लाम के नाम पर कितनी हिंसा हुई, और कितने लोग मारे गए। दूसरी एक रिपोर्ट पिछले साल-दो साल से हर कुछ हफ्तों में आती ही है कि किस तरह खाड़ी के देशों में इस्लामी आतंकी अपने कब्जे में रखी गई, गुलाम बनाई गईं लड़कियों की नीलामी इंटरनेट और वॉट्सऐप पर करते हैं। ये तस्वीरें भी सामने आईं कि इस्लामिक स्टेट के आतंकी किस तरह एक कमरे में बैठे हुए ठहाके लगा रहे हैं, और उन्हीं के पीछे उनके साथी किस तरह लड़कियों से बलात्कार कर रहे हैं।
दुनिया में धर्म के नाम पर हिंसा और आतंक का लंबा इतिहास है। भारत के बगल के म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यकों ने जिस अंदाज में वहां के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को मारना जारी रखा है, उसे खत्म करवाने में वहां की नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त सत्तारूढ़ आंग-सान-सू-की की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है। लेकिन धर्म का हिंसा से लेना-देना नया नहीं है। हिटलर के इतिहास को खोलकर देखें तो दिखता है कि किस तरह चर्च की मदद से हिटलर सत्ता में आ पाया था। और दूसरी तरफ वेटिकन का इतिहास देखें तो यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि किस तरह पोप ने अपने पादरी-साथियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों को दबाने का काम किया, और ऐसे धार्मिक चोगों को जेल जाने से बचाकर रखा। भारत में कई धर्मों में तरह-तरह की हिंसा दिखाई पड़ती है, और हिन्दुओं में भी सतीप्रथा से लेकर कन्या भ्रूण हत्या, और देवदासी प्रथा जैसी कई तरह की हिंसा रही है, और अभी तो मोदी सरकार की जांच एजेंसी ही अदालत में ले जाकर एक हिन्दू संगठन के खिलाफ सुबूत पेश कर रही है कि किस तरह उसने एक न्यायप्रिय व्यक्ति नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की थी, और आतंक की और घटनाओं की साजिश रची थी।
दरअसल धर्म की सोच को जब तक लोकतंत्र और न्याय की आधुनिक सोच के साथ नहीं ढाला जाएगा, तब तक धर्म का आतंक और हिंसा से रिश्ता टूट नहीं पाएगा। भारत में बहुत से मामलों में यह साम्प्रदायिक या कट्टर जिद सामने आती है कि धार्मिक मान्यता या आस्था, या धार्मिक रीति-रिवाज कानून से ऊपर हैं, संविधान से ऊपर हैं। और जब सरकारें ऐसी सोच को बढ़ावा देती हैं, तो फिर भावनाओं को भड़काकर अपनी ठेकेदारी चलाने वाले लोग इसे हिंसा तक ले ही जाते हैं, और फिर एक धर्म के भीतर चल रहे भड़कावे के जवाब में दूसरे धर्म के लोगों के बीच भी जवाबी भड़काना शुरू हो जाता है, आगे बढऩे लगता है। भारत जैसे लोकतंत्र में इस बात की बड़ी साफ जरूरत है कि तमाम किस्म की आस्थाओं को कानून के तहत ही रखा जाए, न कि छांट-छांटकर, समय और माहौल देखकर उन्हें कानून से ऊपर साबित करने की कोशिश की जाए। आज बहुत से मामलों में ऐसा दिखता है कि केन्द्र या राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और बाकी संगठन धार्मिक भावनाओं को कानून से ऊपर बिठाने कीक कोशिश करते हैं, और देश की अदालतों को ऐसी कोशिशों के खिलाफ फैसले देने पड़ते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और देश के लोगों के बीच एक वैज्ञानिक और न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक और तर्कसंगत सोच विकसित होने देनी चाहिए, वरना यह देश कई सदी पीछे पहुंच जाएगा।

अब स्मृति शेष

संपादकीय
6 जुलाई  2016
केंद्र सरकार में कल हुए फेरबदल को लेकर इसी जगह हमने मंत्रियों के चेहरों और विभागों में फेरबदल को बेहतर कामकाज के लिए एक जरूरी रास्ता कहा था। कल शाम होते-होते यह खबर आ गई कि स्मृति ईरानी अब देश की शिक्षा (मानव संसाधन) मंत्री के बजाय, कपड़ा मंत्री रहेंगी। इस घोषणा के कई घंटे पहले हमने जो लिखा था, वह ऐसे ही फेरबदल को लेकर था कि जो लोग अपने काम को ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, या तो उन्हें हटाकर दूसरों को मंत्रालय दिए जाएं, या फिर उनके विभाग बदलकर उन्हें कोई दूसरा काम दिया जाए। देश की शिक्षा में जितनी तबाही स्मृति ईरानी के इन दो बरसों में हुई, उसकी अगले ढाई-तीन बरस में प्रकाश जावड़ेकर कितनी भरपाई कर पाएंगे, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन मोदी सरकार की पहली लिस्ट में जो सबसे विनाशकारी पसंद थी, वह अब देश के सामाजिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने के बजाय कपड़ों के तानेबानों में उलझी रहेगी, यह देश की आने वाली पीढिय़ों के लिए बड़ी राहत की बात है।
इससे कुछ कम राहत की बात यह है कि विदेश मंत्रालय में अब तक राज्य मंत्री चले आ रहे भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह के अलावा एम.जे. अकबर भी विदेश राज्य मंत्री रहेंगे। अकबर पहले लंबे समय तक अखबारनवीस रहे, फिर वे कांगे्रस पार्टी में जाकर पार्टी प्रवक्ता भी रहे, और चुनाव भी लड़ा। फिर उन्होंने अपने उगले हुए लाखों शब्दों को निगलते हुए अब मोदी का साथ चुना, और कल मंत्री बने। अखबारनवीसों की जिस नस्ल को जनरल वी.के. सिंह वेश्याओं के बराबर गिनते हुए प्रेस्टीट्यूट कहते हैं, उसी नस्ल में कोई चौथाई सदी काम करने वाला अब उन्हीं की बराबरी में आकर बैठा है, और ऐसा समझ पड़ता है कि विदेश मंत्रालय में इस बड़बोली तोप के मुकाबले एक सूखी हुई कलम को अधिक महत्व मिलेगा। वी.के. सिंह ने बेमौके के अपने बेतुके बयानों को लेकर जो रिकॉर्ड कायम किया था, वह बेमिसाल है, और विदेश मंत्रालय जैसे नाजुक काम में उन्होंने फौजी बूटों से काम लिया, और खासी तबाही की। लेकिन इस फेरबदल में जो एक-दो उम्मीदें की जा रही थीं, उनका न होना भी एक किस्म का संदेश है। मोदी मंत्रिमंडल के जो लोग घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बयानों के लिए जाने जाते हैं, उनकी बिदाई की अटकलें चल रही थीं, उनमें से एक राम शंकर कठेरिया का हटना जरूर हुआ है, लेकिन उनके कुछ और तेजाबी भाई-बहन मंत्रिमंडल में बने हुए हैं।
जैसा कि हमने कल भी लिखा था, किसी भी पार्टी की सरकार में लोगों का फेरबदल कम से कम एक बार जरूर होना चाहिए, और ऐसा होने पर अगले चुनाव की टिकटों की लिस्ट में बदलने वाले चेहरों की गिनती कम हो सकती है। खराब काम करने वाले, बदनामी वाले, भ्रष्टाचार और विवाद में फंसे हुए लोग अगर पूरे पांच बरस जारी रहते हैं, तो हो सकता है कि वे तो अपनी भारी-भरकम कमाई की वजह से अगला चुनाव जीत भी जाएं, लेकिन वे बाकी तमाम सीटों पर थोड़ा-थोड़ा नुकसान करके पार्टी की संभावना को तबाह कर सकते हैं, करते हैं। मोदी सरकार में अब कोई बड़ा फेरबदल बाकी नहीं है। लेकिन देश के राज्यों में न सिर्फ भाजपा की सरकारों को, बल्कि सभी पार्टियों और गठबंधन की सरकारों को एक मध्यावधि-फेरबदल करना ही चाहिए, ऐसा करने पर मंत्रियों, विधायकों से लेकर सरकार और जनता का भी भला होगा। बिना फेरबदल पांच बरस बहुत लंबा वक्त होता है, और कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि पांच बरस शिक्षा मंत्री रहते हुए स्मृति ईरानी देश का क्या हाल करके गई होतीं?