हमर छत्तीसगढ़, एक अनोखा अभियान, अनोखी संभावना भी

संपादकीय
1 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ सरकार आज से अगले करीब दो बरस के लिए एक महत्वाकांक्षी कार्यक्रम शुरू कर रही है। हमर छत्तीसगढ़ नाम के इस कार्यक्रम में राज्य के 11 हजार से अधिक गांवों से हर पंच-सरपंच को राजधानी रायपुर लाकर, मेहमान की तरह ठहराकर उन्हें राज्य स्तर की, राजधानी-स्थित कामयाबी के संस्थानों को दिखाया जाएगा। नया रायपुर, एयरपोर्ट, विधानसभा, साईंस सिटी जैसी जगहों को देखने के साथ-साथ ये जनप्रतिनिधि एक साथ पौधे भी लगाकर जाएंगे। एक भावनात्मक जुड़ाव के लिए इन सभी को अपने गांवों से मिट्टी-पानी, और पौधा लेकर आने को कहा गया है, ताकि राजधानी गांव-गांव से जुड़ सके। यह अपनी तरह का एक बड़ा अनोखा प्रयोग है, और शायद यह लोकतांत्रिक दुनिया में सबसे अधिक लोगों के साथ चलने वाला सबसे लंबा कार्यक्रम भी रहेगा। दो बरस में डेढ़-दो लाख लोगों का इस तरह आकर राजधानी देखकर लौटना, शायद ही दुनिया में कहीं और हुआ हो।
छत्तीसगढ़ के दूर-दूर बसे हुए आदिवासी इलाकों के बहुत से लोगों ने अभी तक रेलगाडिय़ां नहीं देखी हैं, और राजधानी देखने वाले लोग भी सीमित संख्या में ही होंगे। विधानसभा को भीतर से देखना शायद राजधानी के एक फीसदी लोगों को भी नसीब नहीं हुआ होगा, और 5डी डोम में एक नई तकनीक की फिल्म देखना भी राजधानी के एक फीसदी लोगों को भी कभी नहीं मिला होगा। इस तरह ये लोग बहुत सा नया अनुभव लेकर लौटेंगे, और चूंकि ये अलग-अलग राजनीतिक दलों के, या बिना किसी पार्टी वाले पंच-सरपंच हैं, इसलिए वे अपने-अपने इलाकों में सैकड़ों या हजारों लोगों के प्रतिनिधि भी रहेंगे। लोकतंत्र में किसी जनकल्याणकारी सरकार की यह जिम्मेदारी भी रहती है कि वह जनता के भीतर भरोसा कायम करे और उसे बढ़ाए, लोकतंत्र के फायदे दिखाए, और समझाए। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में यह बात इसलिए भी जरूरी है कि राज्य के एक बड़े हिस्से में नक्सल हिंसा छाई हुई है और वहां के लोगों को लोकतंत्र से न तो पूरी हिफाजत मिल पाती है, और न ही सरकार से अपने पूरे हक मिल पाते हैं। इसकी वजह से एक ऐसा खतरा भी खड़े रहता है कि इन इलाकों की जनता का लोकतंत्र पर से भरोसा कुछ उठने लगे, और उनमें से कुछ लोग नक्सलियों को लोकतंत्र का एक विकल्प चाहे बेबसी में ही मानने लगें।
इसलिए राज्य स्तर की उपलब्धियों से गांव-गांव की जनता का वास्ता अगर इस तरह से पड़ता है, तो यह राज्य के खर्चे पर गांव-गांव के जनप्रतिनिधियों के भीतर एक नया आत्मविश्वास और एक नया आत्मगौरव भी भर सकता है। यह एक अलग बात है कि ऐसा असर उसी हालत में कायम रह सकेगा जब इसी राजधानी से नियंत्रित होने वाले जिले और नीचे के स्तर के प्रशासन में भी जनप्रतिनिधियों के लिए वह सम्मान बना रहे, जिस सम्मान के साथ इनको गांव-गांव से लाकर राज्य की सरकार का मंत्रालय दिखाया जा रहा है। ऐसे प्रवास और ऐसे अनुभव से एक बात यह भी हो सकती है कि ये जनप्रतिनिधि लौटकर राज्य की योजनाओं के बारे में मिली हुई जानकारी का इस्तेमाल अपने गांवों और अपने इलाकों की जरूरतों के लिए, संभावनाओं के लिए कर सकें। इसलिए अच्छे-खासे खर्च से चलने वाले इस दो बरस के हमर छत्तीसगढ़ कार्यक्रम का नफा महज आंकड़ों में नापना मुमकिन नहीं है, और इसके लंबे समय तक मिलने वाले फायदों की कल्पना की जा सकती है।
राज्य सरकार को इस अभियान के साथ-साथ सरकारी कामकाज के तौर-तरीकों को भी संवेदनशील बनाना चाहिए। इतने लोगों के आने से सरकार को बहुत तरह की जानकारियों से रूबरू होने का मौका मिलेगा, लेकिन इसके बिना भी यह बात जगजाहिर है कि सरकारी अमले का बर्ताव आम जनता के साथ बहुत अच्छा नहीं रहता है, और जनप्रतिनिधि भी उनसे बहुत अलग नहीं हैं। इसलिए सरकार को ये दो बरस अपने तौर-तरीकों को बेहतर बनाने के लिए भी मिल रहे हैं, और डेढ़-दो लाख पंच-सरपंच यहां आने पर उनसे सरकार के बारे में उनका तजुर्बा भी पूछा जाना चाहिए, और आगे की संभावनाओं को लेकर उनकी कल्पनाएं भी पूछनी चाहिए। वे छोटे-छोटे गांवों या छोटे-छोटे इलाकों के जनप्रतिनिधि जरूर हैं, लेकिन उनकी समझ और सोच बड़े शहरों के लोगों की सोच-समझ से आगे की, और बड़ी हो सकती है। सरकार को इस मौके का फायदा उठाकर ऐसे सभी मेहमान ग्रामीणों से बातचीत का कोई ढांचा तैयार करना चाहिए, और उनसे मिली बातों का विश्लेषण करना चाहिए।

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