बाढ़ से हुई तबाही से मिलने वाली नसीहतें

संपादकीय
10 जुलाई  2016
मध्यप्रदेश में आई बाढ़ से अब तक करीब दर्जन भर मौतों की खबर है, और सरकारी और निजी संपत्ति, सड़कों के ढांचे, इन सबकी भारी तबाही भी हुई है। बाढ़ को लेकर हिंदुस्तान के बहुत से प्रदेश हर बरस जूझते हैं, और चीन से लेकर अमरीका तक अनगिनत ऐसे देश हैं जो कि कुदरत की इस मार से लगातार नुकसान झेलते हैं। कुदरती नुकसानों में  बाढ़ ही अकेली नहीं है, और भूकंप से लेकर सुनामी तक, और सूखे से लेकर बवंडर तक, कई किस्म की मुसीबतें धरती पर आती हैं। इनमें से कुछ तो रोकथाम के लायक रहती हैं, और कुछ शायद नहीं भी रहतीं। लेकिन बाढ़ के लिए इंसान दो किस्म से जिम्मदार हैं, एक तो नदियों के इतने करीब इतनी बड़ी बसाहट कि बाढ़ आने पर लाखों लोगों को हटाने की नौबत आए, और दूसरी जिम्मेदारी यह कि जंगलों और पेड़ों का सफाया करके इंसानों ने बंधी हुई मिट्टी को बहकर नदियों में जाने, और उन्हें पाटने का सिलसिला चला रखा है, जो कि थमता ही नहीं, धीमा भी नहीं होता।
नदियों की बाढ़ से बचने के कई किस्म के तरीके हिंदुस्तान में शायद एक पूरी सदी से चर्चा में हों, लेकिन पिछले चौथाई सदी से तो नदियों को जोड़कर बाढ़ को दूसरी राह दिखाने की चर्चा चल ही रही है। नदी जोड़ योजना तो अब सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के तहत भी केंद्र सरकार को आगे बढ़ानी है, लेकिन उससे सिर्फ बाढ़ घटाने में मदद नहीं मिलेगी, सूखे से बचने में भी मदद मिलेगी, यह एक अलग बात है कि नदी जोड़ योजना से पर्यावरण को होने वाले खतरों पर अभी बहस किसी किनारे पहुंची नहीं है। लेकिन नदी जोड़ योजना से बाढ़ कम होना भी होगा तो उसमें बड़ा वक्त लगेगा, और तब तक इंसान पेड़ों और जंगलों को काट-काटकर, मिट्टी को बारिश के साथ नदियों में पहुंचाकर, उन्हें इस गाद से पाटकर, उथला करके बाढ़ के लायक तैयार करना जारी रखेंगे। इसलिए अभी मध्यप्रदेश की बाढ़ के सिलसिले में किसी ने यह ठीक ही लिखा है कि कुदरत को रिश्वत देकर नहीं रोका जा सकता। इंसान इस अंदाज में नदियों को तबाह कर रहे हैं कि उनकी अगली पीढ़ी को नदियों की जरूरत ही नहीं पडऩा है, जबकि हकीकत यह है कि समंदर से लेकर नदियों तक में साल के कुछ गिनेचुने महीनों में पानी इतना बढऩे लगा है कि नदियों के किनारे बसी और विकसित हुई सभ्यता का डूब जाना उन महीनों में तय सा हो गया है। और अभी तक समंदर के किनारे बसे हुए शहरों का डूबना शुरू होना भी बाकी है।
इसलिए भारत जैसे देश में सरकारों को आज एक तो आने वाली बसाहटों को नदियों से दूर बसाने की अक्लमंदी दिखानी होगी, दूसरा यह कि नदियों तक पहुंचने वाला कैचमेंट का पानी अगर उसके पहले ही बंजर जमीनों में बड़े-बड़े तालाब खोदकर भूजल के लिए रोक दिया जाए, तो भी बाढ़ की मार कुछ घट सकती है। इंसान जमीन के नीचे से पानी हजार-हजार फीट की गहराई से निकाल तो रहे हैं, लेकिन जमीन में पानी वापिस डालने का जिम्मा शहरी म्युनिसिपलों के नोटिसों की शक्ल में खबरों भर के लिए है। राज्य के स्तर पर हम छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय से यह सुझाव देते आ रहे हैं कि नदियों तक पहुंचने वाले पानी को धरती में समाने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर तालाब खोदने चाहिए, फिर चाहे वे आबादी से परे क्यों न हों, और फिर चाहे वे किसी और इंसान या जानवर के काम के क्यों न हों। धरती का भूगोल जहां-जहां ग्राउंड वॉटर रीचार्जिंग के लिए तालाब सुझाए, वहां-वहां ऐसे तालाब तेजी से बनाने चाहिए, तभी भूजल स्तर गिरने से रूकेगा, और नदियों की बाढ़ कम होगी, मिट्टी का बहकर नदियों में जाना भी घटेगा।
छत्तीसगढ़ में बाढ़ से नुकसान असम, बिहार, या मध्यप्रदेश जितना अधिक नहीं होता है, लेकिन यहां भी सड़क-पुलों की तबाही बहुत होती है, और सरकार को इनको बचाने के साथ-साथ पानी को बचाने की भी मिलीजुली सोच पर अमल करना चाहिए।

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