एक सदी की कोशिश के बाद हासिल कामयाबी

संपादकीय
11 जुलाई  2016
इस बार के यूरोपियन फुटबॉल के एक रोमांचक मैच में कल रात पुर्तगाल ने फ्रांस की जमीन पर खेलते हुए फ्रांस को हराकर चैंपियनशिप हासिल की है और उसकी यह मेहनत करीब एक सदी बाद रंग लाई है। इस बीच खिलाडिय़ों की कम से कम 20 पीढिय़ां आई-गई हो गई होंगी और इस टूर्नामेंट में मेहनत करते-करते पुर्तगाल को पहली बार यह जीत हासिल हुई है। इस खबर के साथ ही यह जानकारी भी सामने आई है कि पुर्तगाल ने फ्रांस को 41 बरस बाद हराया है। अब इस मुद्दे पर लिखने को विचार तो बहुत अधिक नहीं हो सकते, लेकिन कितनी मेहनत से क्या कुछ हासिल किया जा सकता है, इसकी एक मिसाल पुर्तगाल की इस जीत से सामने आती है।
हिन्दुस्तान की हिन्दी जुबान में बड़े जानकार की लिखी हुई एक बात कही जाती है- रसरि आवत-जात से सिल पर परत निसान...। मतलब यह कि कुएं की पाल पर जिस जगह से लोग पानी निकालते हैं, वहां पर रस्सी से घिस-घिसकर पाल के पत्थर पर भी निशान पड़ जाता है। कुछ लोग ऐसा भी मानते हैं कि किसी मंदिर-मस्जिद में मत्था टेक-टेककर माथे पर निशान पड़ जाता है। बहुत से दूसरे लोग यह नसीहत भी देते हैं कि करत-करत अभ्यास से, जड़मति होत सुजान..., मतलब यह कि कोशिश करते-करते मूर्ख भी ज्ञानी हो सकते हैं। कुछ ऐसा ही हाल पुर्तगाल की मेहनत के पीछे दिखता है जहां पर लोगों की कई पीढिय़ां ऐसी जीत के इंतजार में गुजर चुकी होंगी, और दस बरस की औसत खेल जिंदगी वाले खिलाडिय़ों की तो दस पीढिय़ां पुर्तगाल की फुटबॉल टीम में खेल-खेलकर निकल गई होंगी।
वैसे तो खेल में जीत और हार लगी ही रहती है, लेकिन कोई टीम किस तरह अपने सबसे बड़े सितारा खिलाड़ी रोनाल्डो के जख्मी होने के बाद भी मैदान पर डटी रही, और फ्रांस में हो रहे मैच में स्थानीय दर्शकों के समर्थन के बाद भी हौसले से खेलकर जिस तरह पुर्तगाल ने मैच जीता, उससे जिंदगी के अलग-अलग बहुत से दायरों के सभी लोगों को सीखने को कुछ न कुछ मिलता है। मुकाबला तो खेल के मैदान में भी होता है, इम्तिहान में भी होता है, और किसी कारोबार से लेकर किसी जगह की नौकरी में भी साथी कामगारों के साथ काम का मुकाबला भी होता है। बहुत से लोग हौसला खोकर, थककर बीच में बैठ जाते हैं, या कि दौड़ या सफर छोड़ बैठते हैं। ऐसे लोगों को 95 बरस बाद पुर्तगाल को मिली इस जीत को याद रखना चाहिए। और ऐसी जीत कारोबार की तरह किसी नाजायज तरीके से हासिल होने वाली जीत नहीं होती, इम्तिहान में नकल करके, या भोपाल की तरह पर्चे खरीदकर होने वाली जीत नहीं होती, यह किसी दफ्तर में बॉस की चापलूसी करके सहकर्मियों के ऊपर पाई हुई जीत भी नहीं होती, यह तो खुले मैदान में सैकड़ों करोड़ दर्शकों की नजरों के सामने मुकाबला करके पाई हुई एक निहायत पारदर्शी जीत होती है, और दुनिया की एक महाशक्ति फ्रांस की टीम के सामने एक कमजोर देश पुर्तगाल ने भी ऐसी जीत पाकर दिखाई है। इन नतीजों को इन ऐतिहासिक आंकड़ों के साथ जोड़कर लोगों को देखना चाहिए कि वे अपनी जिंदगी के दायरे में कोशिश और जीत का कैसा रिश्ता कायम कर सकते हैं। बहुत से जगहों पर यह बात पढऩे मिलती है कि थककर हार मानने वाले बहुत से लोग यह नहीं जानते कि जीत या कामयाबी बस कुछ ही कदम दूर खड़ी हुई थी।

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