कश्मीर के समाधान के लिए पूरे देश में माहौल बदलना होगा

संपादकीय
13 जुलाई  2016
कश्मीर में पिछले कई दिनों से सुरक्षा एजेंसियों की कार्रवाई में मारे गए एक स्वघोषित उग्रवादी नौजवान की मौत के बाद का तनाव जारी है, और दो दर्जन मौतें हो चुकी हैं, केन्द्र और राज्य के सुरक्षा कर्मचारी कश्मीरी लोगों के एक बड़े तबके के हमले झेल रहे हैं, और इन दिनों जम्मू-कश्मीर में जारी हिन्दुओं की एक बड़ी तीर्थयात्रा, अमरनाथ, पर भी इस तनाव का असर पड़ा है। देश में यह पहला मौका है जब कश्मीर में हो रहीं इतनी अलगाववादी और आतंकी हिंसा के चलते हुए भी भाजपा चुप है, क्योंकि वह जम्मू-कश्मीर की राज्य सरकार में हिस्सेदार है। राज्य में कानून व्यवस्था को ठीक रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है, और उसकी मदद के लिए केन्द्र सरकार की तरफ से भेजी गई जो फौज और पैरामिलिट्री वहां तैनात है, वह भी केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है। ऐसे में कश्मीर उस भाजपा के लिए परेशानी का एक बड़ा सबब बन गया है जो कि पूरे देश के आम चुनावों में जनसंघ के दिया छाप के वक्त से धारा 370 खत्म करने, कश्मीर का अलग झंडा खत्म करने, कश्मीर का अलग दर्जा खत्म करने को राष्ट्रीय मुद्दा बनाकर लड़ते आई थी। हम भाजपा की आज की सत्ता की बेबसी को समझते हैं, लेकिन विपक्ष और सत्ता की अलग-अलग और एक-दूसरे से विपरीत प्राथमिकताएं होती हैं, और उनके चलते आज अगर भाजपा को, और मोदी सरकार को अपना रूख बदलना पड़ रहा है, बर्दाश्त बढ़ाना पड़ रहा है, तो ऐसे में हम उन्हें उनकी पुरानी बातें याद दिलाकर फिर भड़काऊ बातें करना नहीं चाहते। सत्ता की जिम्मेदारी लोगों को सहनशील बना देती हैं, और विपक्ष की बेफिक्री लोगों को गैरजिम्मेदार भी बना देती है। यह एक अच्छी नौबत है कि भाजपा के प्रधानमंत्री को पाकिस्तान के मोर्चे से लेकर कश्मीर के मुद्दों तक केन्द्र और राज्य में सत्तारूढ़ पार्टी के नजरिए से सोचना और काम करना पड़ रहा है, और यह बात लोकतंत्र के लिए एक नई विकसित हो रही समझ की भी है।
जहां तक सवाल कश्मीर का है, तो वहां के नौजवानों के एक तबके में अलगाववादी या कि उग्रवादी, या आतंकी सोच कोई नई बात नहीं है। और इसके पीछे के कई ऐतिहासिक कारण हैं, और उनका कोई आसान हल भी नहीं है। फिर यह भी है कि देश भर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथी मंत्री और पार्टी पदाधिकारी किस तरह से मुस्लिमों को लेकर भड़काने वाली बातें करते हैं, उन बातों को लेकर मुस्लिमों से भरी हुई कश्मीर घाटी में भी बेचैनी होती है। भारत जैसे देश में यह नहीं हो सकता कि दिल्ली के एयरपोर्ट पर उत्तर-पूर्व की एक लड़की से परदेसी जैसा बर्ताव किया जाए, और फिर यह उम्मीद की जाए कि उत्तर-पूर्वी लोग अपने आपको देश का हिस्सा मानकर चलें। वे लोग तो अपने को हिन्दुस्तानी मानते हैं, लेकिन बेंगलुरू से लेकर दिल्ली तक उनको सड़कों पर पीटने वाले बाकी हिन्दुस्तानी उनको इस अंदाज में नार्थ-ईस्ट का मानते हैं कि मानो वह इलाका भारत से बाहर का हो। कमोबेश यही हाल कश्मीर को लेकर देश में कई जगह लोगों के बर्ताव में आता है, और इसके जवाब में कश्मीर के लोगों के मन में भी ऐसी बात आती है कि वे अपने आपको कश्मीर और बाकी हिन्दुस्तान को इंडिया कहते हैं।
किसी भी इलाके में सुरक्षा बलों की बंदूकें जब बहुत लंबे समय तक तैनात रहती हैं, तो वहां स्थानीय लोगों पर कई किस्म की ज्यादतियां होने लगती हैं। अभी दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में भारतीय सेना पर लगे आरोपों की जांच के आदेश दिए हैं, वरना मणिपुर और कश्मीर जैसी जगहों पर फौज एक ऐसे खास कानून के साये में आरोपों से परे बैठती है जो कि उन्हें स्थानीय लोगों के आरोपों से बचाने के लिए बनाया गया है। आज छत्तीसगढ़ के बस्तर में भी सुरक्षा बलों की ज्यादतियों के खिलाफ स्थानीय आदिवासियों में नाराजगी, और शायद नफरत भी, उबल रही है, यह एक अलग बात है कि उसकी कोई सुनवाई आसानी से हो नहीं रही है। इसलिए कश्मीर में फौज की लगातार मौजूदगी में जनता के एक तबके के बीच में लगातार बागी तेवर खड़े किए हैं, और इससे निपटना कोई आसान बात नहीं है।
केन्द्र सरकार ने आज कश्मीर पर एक बैठक की है जिसमें प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, रक्षामंत्री, विदेशमंत्री, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, विदेश सचिव की मौजूदगी में कश्मीर पर ही चर्चा हुई है। इसमें विदेश मंत्री और विदेश सचिव की मौजूदगी यह बात जाहिर करती है कि कश्मीर के मामले से देश की विदेश नीति भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कैसे जुड़ी हुई है। अभी हम वहां की जटिल स्थिति को लेकर कोई तुरत-समाधान सुझाना नहीं चाहते, लेकिन हमारा यह पक्का मानना है कि जब तक पूरे देश में राष्ट्रीय एकता के ताने-बाने को बचाने के लिए ठोस कोशिशें नहीं होंगी, और अल्पसंख्यकों या सरहदी लोगों के खिलाफ दिल्ली से हिकारत और नफरत दिखेगी, तब तक कश्मीर का कोई स्थानीय हल नहीं निकल पाएगा। कश्मीर की सोच बाकी देश के माहौल से जुड़ी रहेगी, और इस सोच को तबाह करने के लिए पिछले दो बरसों में देश में बहुत सी घटनाएं हुई हैं, और दिल्ली को पहले अपना घर सुधारना होगा, वरना श्रीनगर के पास कोई समाधान नहीं होगा।

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