सहअस्तित्व का महत्व समझने की जरूरत है

संपादकीय
14 जुलाई  2016
अफ्रीकी देश सूडान में खड़े हुए भारी घरेलू तनाव को देखते हुए वहां काम कर रहे सैकड़ों हिन्दुस्तानियों को सुरक्षित वापिस लाने के लिए विदेश राज्यमंत्री, पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह एयरफोर्स के विमानों के साथ वहां पहुंचे हैं, और लोगों को हिफाजत से वापिस लाने में लगे हैं। पिछले दो बरस में कुछ और देशों से हिन्दुस्तानियों को इसी तरह निकालकर लाना पड़ा है क्योंकि खाड़ी के  देशों से लेकर अफ्रीकी देशों तक दसियों लाख हिन्दुस्तानी कारोबारी और कामगार हैं, और उनकी जिंदगी भी इस देश के लिए मायने रखती है, और उनकी कमाई भी। लेकिन ऐसे मौके पर यह भी याद रखने की जरूरत है कि उन देशों के स्थानीय तनाव से अगर मजबूरी में हिन्दुस्तानियों को निकलना पड़े, तो यह अलग बात है, लेकिन बीच-बीच में ऐसा भी हो रहा है कि भारत में किसी अफ्रीकी पर्यटक या छात्र को मार दिया गया, और उसका जवाबी तनाव अफ्रीका के देशों में वहां रह रहे हिन्दुस्तानियों को झेलना पड़ा है। अभी इसी पखवाड़े की बात है कि ऐसे ही एक देश में हिन्दुस्तानियों की दुकानों को जला दिया गया।
लेकिन ऐसी जवाबी हिंसा देश के बाहर ही होती हो, यह जरूरी नहीं है। देश के भीतर भी ऐसी जवाबी हिंसा होती है, और कश्मीर, उत्तर-पूर्व, महाराष्ट्र, यूपी-बिहार में कुछ दूसरे इलाके के लोगों के लिए तनाव होता है, या इन प्रदेशों के लोगों के लिए बाकी प्रदेशों में कहीं तनाव होता है, तो उसकी हिंसक प्रतिक्रिया भी होती है। लोगों को याद होगा कि महाराष्ट्र से उत्तर भारतीयों को भगाने का काम जमाने से शिवसेना के दोनों हिस्से करते आ रहे हैं, उनके खिलाफ हिंसा भी करते आ रहे हैं, और फतवे भी जारी करते आ रहे हैं। पिछले बरस की ही बात है कि कर्नाटक से उत्तर-पूर्व के लोगों को मारकर भगाया गया, और ट्रेनों में भर-भरकर लोग वहां से निकले। भारत जैसे विविधता वाले देश में जाति के आधार पर, धर्म या क्षेत्रीयता के आधार पर, पहरावे और खानपान के आधार पर कई बार ऐसा हिंसक भेदभाव होता है। अभी तीन दिन पहले ही दिल्ली एयरपोर्ट पर मणिपुर की एक युवती से विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने ऐसा बर्ताव किया कि उसे अपनी राष्ट्रीयता साबित करने को कहा गया।
देश के भीतर हो या कि दुनिया के दूसरे देशों में, एक जगह की प्रतिक्रिया दूसरी जगह होती है, एक हिंसा का जवाब दूसरी हिंसा से दिया जाता है, और हर जगह एक बात आम रहती है कि दूसरों से हिंसा करने वाले लोग ऐसे रहते हैं जिनके अपने कोई लोग उन दूसरे लोगों के देश-प्रदेश में बसे हुए नहीं रहते हैं। आज ऐसे ही मौके पर नेहरू की सोच याद पड़ती है और यह भी कि किस तरह उन्होंने भिलाई जैसे आधुनिक औद्योगिक तीर्थ बनाए थे जहां कि देश के हर कोने से आए हुए लोग मिलकर काम करते थे, आज भी करते हैं, और उनके बीच एक राष्ट्रीय ताने-बाने की सोच विकसित होती है, मजबूत बनती है, और कायम रहती है। आज भारत को भड़काऊ बातों से परे रहकर उसी दरियादिली की जरूरत है जिसके साथ नेहरू कश्मीर को एक अलग दर्जा देकर उसके हक को मानते थे। आज उसे नकारकर भारत की सरकार या भारत के लोग किसी किनारे नहीं पहुंच सकते। जिन लोगों को कश्मीर महज एक राज्य समझ पड़ता है, उनको यह भी समझना चाहिए कि बाकी हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बीच का यह राज्य देश की फौजी जरूरतों के लिए कितना महत्वपूर्ण है। बहुत से लोग कश्मीर की राजनीतिक समस्या का अतिसरलीकरण करते हुए यह कह बैठते हैं कि एक बार कश्मीर के लोगों को पाकिस्तान में शामिल होने दिया जाए और फिर उनको अकल आ जाएगी। लेकिन इन लोगों को उन फौजियों की जिंदगी की कीमत नहीं मालूम है जो कि सरहद को बचाने के लिए शहीद होते हैं। जिस दिन कश्मीर पाकिस्तान चले जाएगा, उस दिन पंजाब से लगी हुई सरहद देश के लिए कितनी महंगी पड़ेगी इसका कोई अंदाज आज के फतवेबाजों को नहीं है।
सारी दुनिया को एक-दूसरे से सबक लेना चाहिए। आज अफगानिस्तान से या इराक से हिन्दुस्तानियों को वापिस लाना हो, या कि सूडान से उन्हें वापिस लाया जा रहा है, तो यह महज सरकार के खर्च की बात नहीं है, ऐसे हजारों परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल भी है, और देश की अर्थव्यवस्था का सवाल भी। इसलिए दुनिया में, और  देश के भीतर भी विविधता का, क्षेत्रीयता का, जातीयता का, और धर्मों का सम्मान करते हुए एक-दूसरे के लिए सहनशक्ति बढ़ाने की जरूरत है और सहअस्तित्व के महत्व को समझने की भी।

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