सानिया मिर्जा की तरह विरोध करना सीखने की जरूरत

संपादकीय
15 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान की सबसे कामयाब महिलाओं में से एक, टेनिस की दुनिया की अव्वल दर्जे की खिलाड़ी, सानिया मिर्जा ने अभी दो दिन पहले एक नामी-गिरामी टीवी पत्रकार को एक इंटरव्यू के दौरान बेजुबान कर दिया, और उसे माफी मांगनी पड़ी। इस पत्रकार ने पूछा था कि वे कब बसने वाली हैं, कब मां बनने वाली हैं? इस पर सानिया का कहना था कि वह पत्रकार निराश लग रहा है क्योंकि उन्होंने इस वक्त मां बनने के बजाय दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी बनना चुना है। सानिया ने कहा कि ऐसे कई मौके रहते हैं जब महिलाओं को ही ऐसे सवालों का सामना करना पड़ता है, और आदमियों को ऐसे सवाल कभी नहीं घेरते।
यह अच्छी बात है कि ऐसी बारीक बातचीत के फर्क को जानते और गिनाते हुए सानिया ने एक दिग्गज टीवी पत्रकार को घेर दिया, और माफी मंगवा ली। इसी वक्त देश के कई अलग-अलग हिस्सों में राजनीति और सामाजिक क्षेत्रों में काम करने वाली महिलाएं किसी नेता या अफसर को नालायकी पर सजा के तौर पर चूडिय़ां भेंट कर रही होंगी, और अपनी बातचीत की जुबान में औरत शब्द की जगह आदमी को काफी मान रही होंगी। बहुत सी महिलाएं इस फेर में होंगी कि परिवार की अपने से छोटी महिलाओं का भू्रण परीक्षण करवाकर अजन्मी कन्याओं की हत्या करवा दें, और बहुत सी आस्थावान महिलाएं पुत्र जन्म के लिए तरह-तरह के धार्मिक अनुष्ठान करने में लगी होंगी।
जिस सानिया मिर्जा की वजह से न सिर्फ उसके परिवार का सिर पूरी दुनिया में ऊंचा हुआ है, बल्कि हिंदुस्तान का नाम भी रौशन हुआ है, उस सानिया की जगह अगर कोई सोनू मिर्जा पैदा हुआ होता, और नालायक निकल गया होता तो वह किस काम का रहता? और देश भर में अनगिनत ऐसी लड़कियां हैं जो कि शादी के पहले या शादी के बाद भी अपने मां-बाप का ख्याल रखती हैं, और मां-बाप को वृद्धाश्रम में छोड़ देने वाले खानदान के चिराग बेटों के मुकाबले उनकी सेवा करती हैं। ऐसे में समाज को महिलाओं के लिए अपना नजरिया बदलना चाहिए, और इसकी शुरूआत खुद महिलाओं को भी करनी चाहिए कि वे अपनी बातचीत में, अपनी भाषा में, अपने उदाहरणों में, कहावतों और मुहावरों में, प्रतीकों में कहीं भी महिला-तबके की कमजोरी न मानें, न बताएं। और इसके लिए यह भी जरूरी रहेगा कि महिलाओं को गैरबराबरी की नौबत आने पर चुप रहने के बजाय विरोध करना होगा, और आसपास के लोगों को याद दिलाना होगा कि उनका दर्जा न सिर्फ बराबरी का है, बल्कि मर्दों को पैदा करने वाली औरतों का भी है।
न सिर्फ हिंदी में, या हिंदुस्तानी जुबानों में, बल्कि दुनिया की बहुत सी दूसरी भाषाओं में भी औरतों के लिए गैरबराबरी और हिकारत का नजरिया रहता है। हम इसी कॉलम में हर कुछ महीनों में इस मुद्दे पर लिखते हैं कि किस तरह हिंदी का नरभक्षी, उर्दू में आदमखोर और अंगे्रजी में मैनईटर हो जाता है, मानो कि किसी शेर या चीते को औरत खाने के लायक भी नहीं रहती है। जब हिरोशिमा में बड़े पैमाने पर लोग मारे जाते हैं, या भोपाल में गैस त्रासदी होती है तो उसे नरसंहार कहा जाता है, मानो कि कोई नारी इसमें मरी ही न हो। इस तरह भाषा का सामाजिक रूख गैरबराबरी का रहते आया है, और जहां-जहां ऐसे शब्द सामने आएं, उनका खुलकर विरोध किया जाना चाहिए।

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