धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है

संपादकीय
16 जुलाई  2016
हिन्दुस्तान में आज सुबह हो रही और यह खबर आने लगी कि किस तरह तुर्की में एक फौजी बगावत चल रही है और देश के बाहर सफर पर से राष्ट्रपति ने जनता को कहा कि वे सड़कों पर आकर इन बागियों का विरोध करें, और लोग निकलकर टैंकों के सामने खड़े हो गए। कुछ घंटों के भीतर अब ऐसा लग रहा है कि यह विद्रोह काबू में आ गया है, लेकिन इसके पीछे की साजिश में राष्ट्रपति ने एक इस्लामी धर्मगुरू फतहुल्लाह गुलेन की तरफ इशारा किया है जिनके कि लाखों अनुयायी हैं, डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में उनके स्कूल हैं, और अरबों डॉलर का उनका कारोबार है। पिछले दशकों से वे अमरीका में बस गए हैं, और ऐसा माना जाता है कि वे तुर्की की सरकार के खिलाफ बगावत भड़काते रहते हैं।
जिस वक्त आज सुबह तुर्की से यह खबर आ रही थी, उसी वक्त कल सुबह फ्रांस में एक इस्लामी आतंकी ने एक ट्रक लोगों के जश्न पर चढ़ा दी, और कोशिश करके अधिक से अधिक लोगों को कुचलकर मारा। इस हमले में 75 लोग मारे गए, और यह इस्लामी आतंक का एक नया तरीका सामने आया जिसमें बिना किसी हथियार या विस्फोटक के, रोज के इस्तेमाल की एक ट्रक से इतने लोगों को मार डाला गया। आज दुनिया के सबसे खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट ने 2014 में एक संदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि अगर आप बम नहीं फोड़ सकते, या गोली नहीं चला सकते, तो उन पर अपनी कार चढ़ा दो, ऐसा माना जा रहा है कि यह ताजा हमला इसी बात को मानकर ट्रक से किया गया। दूसरी तरफ हम हिन्दुस्तान में देख रहे हैं कि किस तरह कुछ मुस्लिम संगठन, और कुछ हिन्दू संगठन आतंक में लगे हुए हैं। और हिन्दू संगठनों पर तो यह कार्रवाई केन्द्र की मोदी सरकार के मातहत काम करने वाली देश की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी एनआईए कर रही है, और अदालत में इस बात को सुबूतों के साथ रख रही है।
पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक, और पड़ोस के म्यांमार तक धर्म के लिए लगातार हिंसा चल रही है, और इन धर्मों के मानने वाले बाकी लोग यह आड़ लेते हैं कि यह हिंसा धर्म के लिए नहीं है, धर्म के नाम पर है। कहने को यह भी कहा जाता है कि सभी धर्म शांति सिखाते हैं, और कोई भी धर्म हिंसा नहीं सिखाते हैं। लेकिन यह बात हकीकत से कोसों परे है। धर्म खून बिखेरने से परे भी कई तरह की हिंसा करता है। एक समय धर्म सती बनाता था, देवदासी बनाता था, और अपने ही धर्म के भीतर हिंसा की बहुत सारी तरकीबें हिन्दू धर्म से लेकर इस्लामिक स्टेट तक चारों तरफ अच्छी तरह दर्ज हैं। इसलिए धर्म को शांतिप्रिय करार देना महज एक नारा है जिसका कि सच से कोई लेना-देना नहीं है। धर्म की हकीकत यह है कि वह अपने आपको कानून से ऊपर, संविधान से ऊपर, लोकतंत्र और इंसानियत से ऊपर मानता है, और उसका बुनियादी मिजाज अराजकता का है, हैवानियत का है, और हिंसा का है। धर्म में अपने अलावा दूसरे धर्मों को कुचल देने की सोच कूट-कूटकर भरी रहती है, और हम हिन्द महासागर के देशों में चारों तरफ इसके नमूने देख रहे हैं। और जब किसी धर्म के लोगों को, उसके आतंकियों को मारने के लिए दूसरे धर्म के लोग नहीं मिलते, तब वे अपने ही धर्म के लोगों को मारना शुरू कर देते हैं, जैसा कि आज इस्लामी आतंकी कर रहे हैं, उनके मारे हुए लोगों में सौ में से निन्यानबे मुस्लिम ही हैं।
अभी तस्लीमा नसरीन ने एक बात कही थी कि जो बच्चे बचपन से ही धर्मग्रंथ जरूरत से अधिक पढऩे लगते हैं, उनके मां-बाप को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि आगे चलकर उनके आतंकी होने का खतरा रहता है। यह बात हमारे हिसाब से अधिकतर धर्मों पर लागू होती है, और दुनिया में समझदार लोगों को इस पर सोचने की जरूरत है कि किस तरह धर्म की भूमिका को आस्था तक सीमित रखा जाए, और निजी आस्था को दूसरों की आस्थाओं का खून बहाने जैसा हिंसक बनने से रोका जाए। आज तो चारों तरफ, धर्म के नाम पर नहीं, धर्म के लिए लहू बहाया जा रहा है। 

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