राजा और प्रजा के बीच मीडिया का एकाधिकार खत्म, अब सीधा संवाद

संपादकीय
17 जुलाई  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हर कुछ हफ्तों में अपने मन की बात रेडियो पर कहना शुरू किया, तो भूला-बिसरा रेडियो फिर खबरों में आया। इसके बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हर महीने रेडियो पर प्रदेश की जनता से बातचीत शुरू की, तो ऐसे हर प्रसारण में कई खबरें भी निकलने लगीं, और लोगों का सवाल पूछना भी शुरू हुआ। इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज इंटरनेट पर लोगों के सवालों के जवाब दिए, और अपने मन की बातें भी कहीं। पिछले कुछ बरसों से भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से आम जनता नेताओं से, और सार्वजनिक जीवन के बाकी लोगों से सीधे सवाल पूछने लगी है, और बहुत से सवालों के या तो जवाब मिलने लगे हैं, या फिर यह उजागर होने लगा है कि इन सवालों के जवाब नहीं दिए जा रहे हैं। कुछ अरसा पहले तक ऐसे लोगों से सवाल पूछने का हक संसद या विधानसभा के भीतर वहां के सदस्यों का होता था, और इन सदनों के बाहर मीडिया का होता था। लेकिन अब ये एकाधिकार पूरी तरह धराशायी हो चुके हैं, और अब जनता को ऐसे ईश्वरों तक पहुंचने के लिए किसी पुजारी की जरूरत नहीं पड़ती है।
लोकतंत्र में जनता से सीधे बातचीत बहुत मायने रखती है, और लोगों के खुले सवालों का सामना करने के लिए थोड़ा सा हौसला भी लगता है। अब यह एक अलग बात है कि कौन से नेता कितने सवालों और कैसे सवालों का जवाब देने की हिम्मत रखते हैं, और कौन है जो महज अपने मन की बात कहकर बात खत्म कर देते हैं। लेकिन यह सिलसिला बहुत नया भी नहीं है। हिन्दुस्तान में आजादी के पहले के दिनों को देखें तो गांधी जिन अखबारों के संपादक थे, हरिजन, और यंग इंडिया नाम के इन अखबारों में वे कई बार या अक्सर लोगों के भेजे गए सवालों के जवाब देते थे, और किसी गांव का सरपंच भी फिलीस्तीन जैसे मुद्दे पर गांधी की सोच का जान पाता था। लोग पोस्टकार्ड पर सवाल पूछते थे, और गांधी अखबारों में उनके जवाब देते थे। आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के तमाम मुख्यमंत्रियों को शायद हर कुछ महीनों में, या हर महीने, चिट्ठी लिखना शुरू किया था जिसमें वे देश-प्रदेश के मुद्दों से लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्दों तक अपनी बात लिखते थे। लिखने का शौक इस तरह रहता था कि नेहरू जेल में रहते हुए बाहर अपनी बेटी इंदिरा के नाम जो चिट्ठियां लिखते थे, वे समकालीन विश्व मुद्दों पर एक गहरी समझ वाली शिक्षा भी रहती थी, और बाद में वे चिट्ठियां किताबों की शक्ल में भी सामने आईं।
वैसे आज की सार्वजनिक और सामाजिक हवा बड़ी जहरीली और दुर्भावना से भरी हुई भी है। लोग सचमुच के सवाल पूछने के बजाय, तरह-तरह की झूठी तस्वीरें गढ़कर अफवाह फैलाने को अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता की जिम्मेदारी समझते हैं, और इसके लिए वे कितने भी घटिया स्तर तक उतर आते हैं। ऐसी हवा के बीच यह एक अच्छी बात है कि देश-प्रदेश के नेता लोगों को सवालों के जवाब दें, या कम से कम अपनी बातें खुलकर कहें। यह एक अलग बात है कि इससे हमारी तरह के अखबार वालों का राजा-प्रजा के बीच का हरकारा बनने का एकाधिकार खत्म हो गया है, और आज तो देश का कोई मीडिया नेताओं और बाकी लोगों के सोशल मीडिया पन्नों पर जाकर वहां लिखी गई बातों से खबरें बनाए बिना रह नहीं पाता। आज सोशल मीडिया की वजह से लोगों को एक यह मौका भी मिला है कि जो सवाल पूछे नहीं जा सकते, या कि जो सवाल सुने नहीं जा रहे, तो भी लोग सोशल मीडिया पर उन सवालों को उछालकर एक असुविधा तो खड़ी कर ही सकते हैं। आगे-आगे देखें होता है क्या।

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