प्रदेश में फिजूलखर्ची और बर्बादी दोनों रोकनी चाहिए

संपादकीय
18 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में महल की तरह बनाए गए म्युनिसिपल के मुख्यालय के छत की तस्वीर आई है जहां पर स्कूली बच्चियों को सरकारी योजना के तहत बांटने के लिए बड़ी संख्या में साइकिलें खरीदी गईं, और किसी वजह से वे छत पर पड़ी रहीं, और अब बुरी तरह से जंग लगकर वे खराब हो रही हैं। यह प्रदेश अपनी खनिज कमाई के चलते बाकी कई प्रदेशों के मुकाबले कुछ बेहतर अर्थव्यवस्था वाला तो है, लेकिन इसे चलाने वाले लोगों को यह भी सोचना चाहिए कि इस तरह की बर्बादी करने के लिए पैसा प्रदेश के पास नहीं है। अभी विधानसभा में सरकार यह जवाब दे ही रही है कि सैकड़ों करोड़ रूपए की मजदूरी ग्रामीण मजदूरों को देना बकाया है, और केन्द्र सरकार से रकम मिलने के पहले वह चुकारा मुमकिन नहीं है। दूसरी तरफ इस तरह की बर्बादी कोई अकेली बात नहीं है। छात्राओं के लिए साइकिलों का यह हाल है, और प्रदेश में शायद ही कोई ऐसी स्कूल हो जहां पर एक या अधिक कमरे टूटे हुए फर्नीचर से भरे हुए न हों। फर्नीचर खरीदे जाते हैं, और कुछ महीनों के भीतर ही वे टूट-फूट जाते हैं। कमोबेश ऐसा ही हाल सरकार के कई दूसरे विभागों का है, जहां पर महंगे दाम पर खरीदी हो रही है, कहीं पर दवा खराब हो रही है, तो कहीं चिकित्सा केन्द्रों में जांच की मशीनों में पड़े-पड़े जंग लग रहा है। कृषि विभाग से जुड़े कुछ दफ्तरों में खेती की मशीनें जंग खा रही हैं, और बीज छांटने की मशीन हो, या कोई और मशीन हो, खरीदने तक सबकी दिलचस्पी रहती है, उसके बाद उसका इस्तेमाल न हो, तो भी किसी को फिक्र नहीं है।
राजधानी के नगर निगम को देखें, तो उसकी इमारत को लंबा-चौड़ा खर्च करके एक महल की शक्ल का बनाया गया है। सरकार में बैठे लोगों को ऐसी फिजूलखर्ची बड़ी सुहाती है, और बहुत से लोगों को यह भी लगता है कि उनकी गाडिय़ां बड़ी हों, उनके दफ्तर बड़े हों, उनके बंगले बड़े हों, उनके कर्मचारी अधिक हों, और किफायत तो मानो सरकार को छू नहीं गई है। नतीजा यह है कि इसी म्युनिसिपल को लेकर अखबारों में हर कुछ महीनों में यह लिस्ट छपती है कि यहां के कितने कर्मचारी राज्य के किस-किस नेता और अफसर के बंगलों पर तैनात हैं, और उनका पैसा जनता की जेब से जाता है।
एक तरफ तो सरकारी योजनाओं और सरकारी सामान की बर्बादी, और दूसरी तरफ सरकारी कामकाज में रईसी की फिजूलखर्ची। इन दोनों को मिलाकर राज्य सरकार का मिजाज ऐसा हो गया है कि किसी दिन अगर किफायत की जरूरत पड़ी, तो सत्ता को समझ ही नहीं आएगा कि किस खर्च को घटाया जाए। और आज भी ऐसा नहीं है कि प्रदेश के गरीबों की सारी जरूरतें पूरी हो रही हैं। आज भी शहर से लेकर गांव तक गरीब की जिंदगी मुश्किल है, और राजधानी के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में भी कमरों की कमी से, बिस्तरों की कमी से मरीजों के फर्श पर पड़े रहकर इलाज कराने की तस्वीरें अखबारों में छपती रहती हैं। ऐसे प्रदेश में जहां पर मजदूरों का सैकड़ों करोड़ का भुगतान बकाया है, सरकार में पैसों की इतनी बर्बादी रोकना सबसे बड़ी प्राथमिकता होनी चाहिए। इस राज्य की कमाई का अधिकांश श्रेय तो धरती को है जो कि यहां से कोयला, लोहा, और चूना-पत्थर जैसे खनिज देती है। उस कमाई से परे भी इस राज्य ने बहुत कम जोड़ा है, और खर्च ही खर्च सीखा है।
मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह वित्त मंत्री भी हैं, और उन्हें फिजूलखर्ची रोकने, और बर्बादी रोकने का एक अभियान चलाना चाहिए। यह बात ठीक है कि आज लोहे-कोयले की कमाई से यह प्रदेश खासी सहूलियत वाला है, लेकिन जनता की जरूरतें अभी पूरी होने से कोसों दूर है, और ऐसे में लोकतांत्रिक सरकार की जिम्मेदारी किफायत की होनी चाहिए।

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