बस्तर में मुठभेड़-मौत की न्यायिक जांच तो ठीक है लेकिन जज बाहरी होना था

संपादकीय
19 जुलाई  2016
बस्तर में एक युवती की पुलिस मुठभेड़ में बताई गई मौत, और उसे नक्सली बताने के बाद उसके परिवार और आदिवासी समुदाय ने हाईकोर्ट तक दौड़ लगाई, और उसका दुबारा पोस्टमार्टम हुआ, और अब हाईकोर्ट ने बलात्कार और हत्या के आरोप वाले इस मामले की न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। इसके पहले भी हाईकोर्ट ने बस्तर में पदस्थ वहां के मेडिकल कॉलेज के डॉक्टरों से पोस्टमार्टम करवाया था, अब न्यायिक जांच भी बस्तर के ही एक जिला न्यायाधीश करेंगे।
यह एक अच्छी बात है कि अदालत बस्तर से आने वाले बेबस आदिवासियों के ऐसे मुद्दों पर सीधे दखल देकर मेडिकल जांच या न्यायिक जांच करवा रही है, लेकिन इसके साथ-साथ फिक्र की एक बात यह भी है कि इसके लिए बस्तर में तैनात लोग ही लगाए जा रहे हैं। जो लोग बस्तर के हालात से वाकिफ हैं, वे जानते हैं कि वहां पर इस कदर फौलादी पुलिस-राज चल रहा है कि बाकी विभाग और अदालतों में भी पुलिस का दखल है। अभी कुछ ही अरसा हुआ है कि बस्तर के एक जज ने शिकायत की थी कि किस तरह प्रशासनिक अधिकारी उन्हें फोन पर धमका रहे हैं, और इसके बाद शायद किसी और मामले में इस जज को ही बर्खास्त कर दिया गया। जिले के अफसर और इस जज के बीच बातचीत बताई जा रही एक टेलीफोन रिकॉर्डिंग भी सामने आई थी, और हमारे सरीखे लोगों को यह उम्मीद थी कि हाईकोर्ट इसका नोटिस लेकर इसकी जांच का हुक्म देगा क्योंकि यह न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कार्यपालिका की एक भयानक दखल का मामला दिख रहा था।
बस्तर में होने वाली किसी भी जांच को लेकर हम हाईकोर्ट से इस बात की उम्मीद कर रहे थे कि वहां पोस्टमार्टम दुबारा करवाना हो, या कि वहां कोई न्यायिक जांच करवानी हो, इसके लिए बाहर के अफसरों और जजों से ही काम लिया जाना चाहिए। बस्तर में जिसके चाहे उसके टेलीफोन टैप होते हैं, हर किसी के कॉल डिटेल्स निकलवाने का दावा पुलिस खुलेआम करती है, और सोशल मीडिया पर पुलिस की दी हुई धमकियां भी तैरती रहती हैं। ऐसे में बस्तर में तैनात लोग जाहिर है कि पुलिस के ऐसे राज के भीतर जी रहे हैं, और भ्रष्टाचार से परे भी उनकी निजी जिंदगी की कई ऐसी बातें हो सकती हैं जिन्हें रिकॉर्ड करके पुलिस उन पर एक दबाव बना सकती है, या बनाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट को बस्तर में तैनात जिला जज से जांच करवाने के बजाय बाहर के जज से जांच करवाना था।
बस्तर के हालात पर लिखने को बहुत कुछ है, लेकिन ये तमाम वे बातें हैं जिन पर हम बार-बार लिखते आए हैं, और इस राज्य में उन बातों का असर खत्म सा हो गया है। अभी बस्तर से दिल्ली जाकर पे्रस कांफे्रंस लेने वाले कुछ पत्रकारों के खिलाफ बस्तर के एक पुलिस अफसर ने एक वॉट्सएप गु्रप में जिस तरह की धमकी लिखकर पोस्ट की है वह हक्का-बक्का करने वाली है। उसने इन लोगों को चोर और नक्सलियों के पालतू कुत्ते लिखते हुए याद दिलाया है कि ये लोग डंडा भूल गए हैं, और न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी। ऐसी बात लिखने का मतलब राज्य सरकार चाहे न भी जानना चाहे, लेकिन कोई भी जागरूक न्यायपालिका इस पर नोटिस जारी करके इस अफसर से पूछ सकती है कि यह धमकी किसके लिए है, और किसे मिटाया जाएगा? बस्तर का यह सिलसिला खतरनाक है, और दुनिया का इतिहास इस बात का गवाह है कि जिस युग में भी, आदिवासियों के साथ जिस देश में भी ज्यादातियां हुई हैं वहां की सरकार के सभ्य और लोकतांत्रिक होने के बाद भी उन आदिवासियों से माफी मांगी गई है।

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