ढाका पर आतंकी हमले के खतरे मुंबई हमले से कम नहीं

संपादकीय
2 जुलाई  2016

पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश की राजधानी ढाका में कल आईसिस के आतंकियों ने मुंबई हमले की तर्ज पर हमला कर दिया और लोगों को बंधक बनाया। वहीं कल ही फिर एक हिंदू पुजारी की हत्या कर दी गई। ये कोई पहला मामला नहीं है जब गैर-मुस्लिम की हत्या हुई हो। बीते महीने ही एक पुजारी की हत्या तब कर दी गई जब वह मंदिर जा रहे थे। बांग्लादेश में पिछले कुछ वक्त से धर्मनिरपेक्ष या उदारवादी ब्लॉगरों की भी हत्याएं हो रही हैं और वहां के धार्मिक अल्पसंख्यकों की भी।  एक बौद्ध मठ में सत्तर बरस के एक बौद्ध भिक्षु की गला काटकर हत्या कर दी गई थी।  इन हमलों की जिम्मेदारी आईसिस ने ली है, हालांकि बांग्लादेश सरकार ऐसे किसी संगठन की देश में मौजूदगी से साफ इंकार करती रही है।
आज खाड़ी के और अफ्रीका के कुछ देशों में इस्लाम के नाम पर बड़े पैमाने पर हिंसा की प्रतिक्रिया योरप और अमरीका जैसे देशों में मुस्लिम आबादी और मुस्लिम शरणार्थियों के प्रति नफरत की शक्ल में सामने आ रही है। योरप के शांत देशों में भी नवनाजीवादी नस्लभेदी सड़कों पर हैं और फिर हिटलर के नामलेवा खबरों में हैं। इस तरह इस्लामी आतंकवाद ऐसे हिंसाग्रस्त देशों में तो मुस्लिमों को ही मार रहा है, वह बाकी देशों में भी मुस्लिमों को शक से लाद रहा है। साम्प्रदायिक ताकतें ऐसा ही  ध्रुवीकरण चाहती भी हैं, लेकिन सभ्य और समझदार लोकतंत्र वाले देश अपनी पूरी ताकत से ऐसी नौबत से जूझ रहे हैं और इसीलिए लंदन में एक मुस्लिम मेयर चुना जा रहा है, तमाम साम्प्रदायिक प्रोपेगंडा के बावजूद।
भारत में जो लोग मुस्लिमों के खिलाफ नफरत को हवा देते हैं, वे न देखे हुए लोग हैं। वे यह समझ नहीं सकते कि इसकी कैसी प्रतिक्रिया मुस्लिम या इस्लामी देशों में काम करने वाले हिंदुस्तानियों को झेलनी पड़ती है। खुद हिंदुस्तान के भीतर धर्मों के बीच का तनाव, क्षेत्रीयता के बीच का तनाव लोगों का बड़ा नुकसान करता है। कई बार उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंदीभाषी लोगों को चुन-चुनकर थोक में मारा जाता है। कभी यह बाकी हिंदुस्तान में उत्तर-पूर्वी लोगों के साथ हिंसा के जवाब में होता है, तो कभी उत्तर-पूर्व की हिंसा के जवाब में बाकी हिंदुस्तान में हिंसा होती है।
आमतौर पर ऐसी हिंसा वे लोग करते हैं, जो अपने इलाकों में हिफाजत से जीते रहते हैं। जिनके घरों के लोग दूसरे देश-प्रदेश में दूसरी जाति, धर्म, रंग के लोगों के साथ जी रहे हैं, वे अपने इलाकों में भी हिंसा से बचते हैं, दूर रहते हैं। नेहरू के वक्त से राष्ट्रीय स्तर के सार्वजनिक-उद्योगों और राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों ने देश को एकजुट रखने का बहुत बड़ा काम किया था। बांग्लादेश-पाकिस्तान, या म्यांमार जिस तरीके से अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के शिकार हैं, उसका नुकसान दूर तक और देर तक होगा। भारत के सबसे बड़े बौद्ध धर्म स्थल बोधगया में कुछ बरस पहले आतंकी धमाके हुए तो उन्हें म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड में मुस्लिमों द्वारा बौद्ध लोगों की हत्याओं का जवाब बताया गया और कई मुस्लिम गिरफ्तार भी हुए। श्रीलंका ने तो यह शक भी जाहिर किया था कि इसके पीछे श्रीलंकाई तमिलों का आतंकी संगठन लिट्टे भी हो सकता है जिसे कि श्रीलंका में बौद्ध-बहुल सरकार के हाथों हिंसा झेलनी पड़ती है।
सभी लोगों को हिंसा से बचना चाहिए क्योंकि हिंसा जमीन के भीतर के पानी सरीखी होती है, जो बहकर कितने दूर तक जाता है या ऊपर से पता नहीं चलता। भारत की सीमाओं से सटे एक इस्लामिक पड़ोसी मुल्क में इस तरह की घटनाएं भारत के लिए गंभीर खतरा हैं।

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