गाय को लेकर शुरू हुई हिंसा अब लोकतंत्र के साथ हिंसा में तब्दील

संपादकीय
20 जुलाई  2016
गुजरात में गौभक्तों ने जिस तरह मरे हुए जानवरों की खाल निकालने वाले दलितों को बुरी तरह पीटा है, उसके जवाब में गुजरात में भी आंदोलन चल रहा है, और देश भर में दलितों के बीच खासा गुस्सा सामने आ रहा है। कल मुंबई में लाखों दलित अंबेडकर के एक स्मारक को गिराने के खिलाफ अनायास ही नहीं जुट गए, उनके बीच एक बड़ी बेचैनी चल रही है। यह समझने की जरूरत है कि गाय को बचाने के नाम पर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले लोगों को अगर मारा जाएगा, तो यह बात तो पिछले दो दिनों से उठ गई है कि क्या इस देश के दलित कुछ दिनों के लिए अपने परंपरागत पेशों को बंद करके देश को यह बता दें कि बिना दलितों के गैरदलितों का काम कैसा चलेगा।
आज देश भर में बिना किसी आरक्षण के नाली-गटर से लेकर पखाने साफ करने तक का काम सौ फीसदी दलितों के कंधों पर ही है, मरे हुए जानवरों की लाशों का निपटारा दलितों पर ही है, और रोज की जिंदगी के बहुत से दूसरे काम दलितों के बिना चल नहीं सकती, और ये काम ऐसे हैं जिनमें गैरदलितों को सौ फीसदी आरक्षण भी दे दिया जाए, तो भी उनमें से कोई ये काम करने नहीं आएंगे। ऐसे देश में आज एक सवर्ण और ब्राम्हणवादी सोच के हिंसक और हमलावर तेवर गाय काटने के खिलाफ चारों तरफ हिंसा कर रहे हैं, लेकिन उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि महाराष्ट्र में जो किसान खुद आत्महत्या कर रहे हैं, वे गैरजरूरी रह गए जानवरों के लिए खाना कहां से लाएं, उन्हें बेचने पर रोक है, तो फिर उनका आखिर क्या करें? और यह हिंसा बढ़ते-बढ़ते कई प्रदेशों में कानून की शक्ल ले चुकी है, और अब इसका फैलाव मरी गायों की खाल निकालने वाले दलितों तक हो चुका है।
एक आक्रामक सवर्ण सोच ने जिस तरह गोहत्या पर रोक लगाकर यह सोचा था कि इसका निशाना सिर्फ अल्पसंख्यक होंगे, उन्हें पता नहीं इस बात का अंदाज था या नहीं, है या नहीं, कि गाय खाने वाले लोगों में दलित और आदिवासी बड़ी संख्या में हैं। उनके अलावा हिन्दू समाज की दूसरी कई जातियों के लोग भी गाय या गोवंश के जानवरों का मांस खाते आए हैं, और बड़े जानवर का मांस गरीब तबकों के लिए अधिक प्रोटीन पाने का एकमात्र सस्ता विकल्प है। ऐसे में हिन्दू धर्म के एक तबके की सोच को जिस तरह कानून बनाकर, और उससे भी ऊपर, कानून अपने हाथ में लेकर बाकी लोगों पर थोपा जा रहा है, उससे देश बंट रहा है। और इस बंटवारे में कोई सरहद नहीं दिख रही है, लेकिन अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों, और गरीबों को यह लग रहा है कि उनके खानपान पर देश का एक बहुत छोटा सा तबका काबू कर रहा है, और यह बेचैनी छोटी नहीं है। देश के कई हिस्से ऐसे हैं जहां पर ये तबके मिलकर वोटरों का भी बहुत बड़ा हिस्सा हैं, और हो सकता है कि अगले चुनाव में देश-प्रदेश में ऐसे हिंसक तेवरों की वजह से भाजपा और उसके साथियों को खासा नुकसान झेलना पड़े।
लेकिन चुनाव में किसको नुकसान होता है, यह हमारी कोई बड़ी फिक्र नहीं है, हमारी फिक्र यह है कि चुनाव के पहले आज की तारीख में देश के ताने-बाने को किन बातों से नुकसान पहुंच रहा है। और देश के धार्मिक या जातीय ढांचे को पहुंचने वाला ऐसा नुकसान किसी एक चुनाव से सरकार बदलने से भी नहीं सुधर पाएगा, और विविधताओं वाले इस देश में गाय को लेकर इतिहास और हकीकत को झुठलाकर जिस तरह का धार्मिक उन्माद फैलाया जा रहा है, वह लोकतंत्र के लिए आत्मघाती है। मतदाताओं के बहुमत से देश और प्रदेश में सरकारें बन जाना एक बात है, लेकिन यह एक बिल्कुल ही अलग बात है कि इतिहास को इस हद तक, इस तरह न बदल दिया जाए कि भविष्य का वर्तमान भी तबाह हो जाए।
आज गोवंश के एक निहायत गैरजरूरी मुद्दे को देश का सबसे जरूरी मुद्दा बनाकर इस हद तक उन्माद फैलाया जा रहा है कि मानो मोदी की किसी और योजना की देश को जरूरत नहीं है, और गोबर और गोमूत्र से सारा देश चल जाएगा। यह सोच देश का इतना लंबा नुकसान कर रही है कि उतने लंबे वक्त के लिए किसी पार्टी को सरकार चलाने का हक भी नहीं मिलता है।

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