फोटो खिंचाने न आएं

संपादकीय
22 जुलाई  2016
गुजरात के ऊना में गौरक्षा के नाम पर जिन दलितों को बुरी तरह से मारा गया, उनसे हमदर्दी जाहिर करने के लिए गुजरात की भाजपा मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल पहुंचीं, और फिर कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। एक खबर यह है कि वहां मौजूद दलित परिवारों ने इन लोगों से कहा कि मिलने आए हैं वह तो ठीक है, लेकिन लौटकर उनके नाम पर राजनीति न करें। दूसरी तरफ देश के सभी प्रदेशों में जहां-जहां किसी हादसे या हिंसा के शिकार लोग अस्पतालों में भर्ती रहते हैं, उनसे मिलने के लिए, और उनके साथ तस्वीरें खिंचाने के लिए नेताओं की कतार लग जाती है। हादसा जितना हिलाने वाला हो, कतार उतनी ही लंबी, और कतार में नेता उतने ही बड़े कद के। इसके अलावा प्राकृतिक विपदाओं के समय भी सरकार में बैठे नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे जल्द से जल्द बाढ़ या भूकंप या समुद्री तूफान, सुनामी के शिकार लोगों के बीच पहुंचें।
ऐसी उम्मीदों के बीच यह बात याद दिलाना जरूरी है कि अमरीका में कुछ बरस पहले जब सबसे बुरा तूफान आया, तो राष्ट्रपति बराक ओबामा कई दिन तक वहां नहीं गए, और उन्होंने बताया कि वे स्थानीय प्रशासन को बचाव-राहत में लगे रहने देना चाहते थे, राष्ट्रपति के पहुंचने से उनको उनके इंतजाम में लग जाना पड़ता है। यह बात अस्पतालों में घायलों को देखने जाने वालों पर भी लागू होती है, और बीमार या ऑपरेशन से उबर रहे लोगों को देखने जाने पर भी। यह बड़ी सामान्य समझबूझ की बात है कि अस्पताल में इलाज पा रहे लोगों का ऐसे नेताओं, या मीडिया के लोगों के आने-जाने से कोई फायदा तो हो नहीं सकता, उनका नुकसान जरूर हो सकता है, उनको संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है, और बढ़ता ही है। लेकिन नेताओं को जाकर जख्मी या मरीज के बगल खड़े रहकर तस्वीरें खिंचवाना अच्छा लगता है, फिर चाहे इससे मरीज के मरने का खतरा ही क्यों न बढ़ जाए। बड़े-बड़े नेताओं के पहुंचने पर अस्पतालों का इंतजाम तबाह हो जाता है, लंबी-चौड़ी भीड़ जुट जाती है, और अस्पताल का स्टॉफ मरीज को छोड़, नेताओं को देखने में लग जाता है।
हमारी यह सलाह है कि अस्पतालों में मरीज तक पहुंचना पूरी तरह से रोकना चाहिए, और डॉक्टर अगर किसी को इजाजत दे सकते हैं, तो वह मरीज के परिवार तक सीमित रहनी चाहिए। न तो मीडिया को, और न ही नेताओं को मरीज या जख्मी तक पहुंचने देना चाहिए, क्योंकि तस्वीरें खिंचवाने का ऐसा मौका उन बेबस जख्मियों का नुकसान छोड़ और कुछ नहीं करता। यह सिलसिला खत्म करने के लिए अगर नेताओं की तरफ से खुद पहल नहीं होती है, तो भी हमारा मानना है कि यह एक जनहित याचिका के लायक मुद्दा है, और अदालत ऐसी रोक लगा सकती है। हमारा यह भी मानना है कि जिस तरह गुजरात के घायल दलितों की तरफ से राजनीति न करने की बात उठी है, उस तरह की बात भी जनता के बीच से कई तबकों से उठनी चाहिए, और हमदर्द नेताओं से कहा जाना चाहिए कि अपनी सरकार या अपनी पार्टी की तरफ से जो मदद भेज सकें, वह भेज दें, और फोटो खिंचाने न आएं।

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