उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की पसंद, रणनीति और चुनावी संभावनाएं

संपादकीय
23 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश में चुनाव के पहले अपने पैर जमाने के लिए कांग्रेस ने दो ऐसे फैसले लिए हैं जो कि हमें समझदारी के दिखते हैं। एक तो राज बब्बर को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाना, और दूसरा यह कि आने वाले विधानसभा चुनाव को दिल्ली की भूतपूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की लीडरशिप में लडऩा। कांग्रेस के पास आज जितने तरह के विकल्प हैं, उनमें ये दोनों अच्छे फैसले दिखते हैं, और अब तक तो पार्टी के एक छोटे नारेबाज तबके की यह बात मानी जाती नहीं दिख रही है कि प्रियंका गांधी को इस चुनाव में पार्टी का चेहरा बनाकर उतारा जाए। एक कुनबापरस्त कांग्रेस ने मां और दोनों बच्चों के बीच ओहदों और ताकत का बंटवारा कैसा होता है, इससे देश या इस पार्टी की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ रहा। मीडिया को जगह बर्बाद करने के बजाय इसे सोनिया के कुनबे पर ही छोड़ देना चाहिए। लेकिन आज उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर कांग्रेस के रूख पर लिखने का हमारा मुद्दा कुछ और ही है।
कांग्रेस ने आज एक नारे के साथ उत्तरप्रदेश का चुनाव अभियान शुरू किया है- 27 साल, यूपी बेहाल। ये 27 साल यूपी की सत्ता से कांग्रेस के बाहर रहने वाले 27 साल हैं, और इस दौरान मायावती से लेकर समाजवादी पार्टी, और भाजपा तक की सत्ता के दौर रहे हैं, और कांग्रेस का आखिरी मुख्यमंत्री 1989  का कैलेंडर हटने के पहले ही उत्तरप्रदेश से जा चुका था। ऐसे में पिछले 27 बरसों की उत्तरप्रदेश की सरकारों को कोसने के साथ कांग्रेस अकेले अपने दम पर यह चुनाव लडऩे को तैयार दिख रही है, और चौथाई सदी में जब उसकी कोई सरकार यहां बन नहीं सकी, तो उसके पास आज वहां खोने के लिए अधिक कुछ बचा नहीं है, और उसकी जो भी रणनीति है, वह उसके लिए भली हो सकती है। लेकिन हमारा आज यहां लिखने का मुद्दा यह है कि पिछले पूरे 27 बरसों को कोसने से उत्तरप्रदेश की चुनावी बिसात अब साफ हो जाती है कि वहां चार पार्टियां मैदान में रहेंगी, और भारतीय जनता पार्टी के लिए शायद यही सबसे सहूलियत की नौबत होगी। मायावती, मुलायम, कांग्रेस, और भाजपा इन सबके अलग-अलग लडऩे से न सिर्फ उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के समीकरण दिख रहे हैं, बल्कि अगले आम चुनाव में भाजपा विरोधी किसी वजनदार गठबंधन के बनने की संभावना भी इससे कुछ कमजोर होते दिखती है। हालांकि उत्तरप्रदेश के चुनावों के नतीजे चाहे जो हों, इसके बाद भी देश के आम चुनाव में साथ रहने पर कोई रोक तो रहेगी नहीं, लेकिन इस चुनाव में अगर कांग्रेस का बसपा या सपा से कोई तालमेल बैठता, तो वह अगले किसी गठबंधन में काम भी आ सकता था।
ये चुनाव अब देश में इसी बात को आगे बढ़ा रहे हैं कि भारतीय राजनीति किस तरह भाजपा के मुकाबले बाकी सब की नौबत ला रही है। भारतीय चुनावों ने आधी सदी तक कांग्रेस के मुकाबले बाकी सब की नौबत सामने रखी थी, और अब यह तस्वीर कांग्रेस के हाशिए पर आने की वजह से बदलकर ऐसी हो गई है। लेकिन फिर भी भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस का खत्म होना कोई अच्छी बात नहीं होती, इसलिए आज अगर उत्तरप्रदेश में कांग्रेस ने अपने लिए बेहतर लीडरशिप को छांटा है, तो यह राज्य की राजनीति और देश की राजनीति इन दोनों में कांग्रेस और लोकतंत्र दोनों के लिए अच्छा हो सकता है। कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश और उसी का हिस्सा रहे उत्तराखंड, इन दोनों राज्यों को बर्बाद करने का ठेका जिस तरह से बहुगुणा-भाईबहनों को दिया था, वह कुनबापरस्ती को सिर पर बिठाने के साथ-साथ बेवकूफी का फैसला भी था। इन दोनों ने मिलकर दो राज्यों में कांग्रेस को तबाह कर दिया, और अब उनसे छुटकारे के बाद  इन दोनों में कांग्रेस नए सिरे से बेहतर लोगों को बढ़ावा दे सकती है। हालांकि शीला दीक्षित के बारे में यह बात कही जा सकती है कि वे खुद कुनबाई राजनीति की उपज हैं, और उन्होंने दिल्ली में अपने बेटे को सांसद बनाकर विरासत को आगे बढ़ाया है, लेकिन उत्तरप्रदेश की चुनावी संभावनाओं में वे चर्चा के तमाम चेहरों में सबसे बेहतर हैं, और कांग्रेस इससे बेहतर नतीजों की उम्मीद नहीं कर सकती।

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