साइबर-सक्रियता तो छा गई लेकिन साइबर-जागरूकता...

संपादकीय
24 जुलाई  2016
एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब इंटरनेट या फोन, फेसबुक से कोई धोखा न खाते हों। फेसबुक पर दोस्ती करके अश्लील तस्वीरें जुटा लेना, ब्लैकमेल करना, और महंगे गिफ्ट भेजने का झांसा देकर उन्हें छुड़ाने के लिए बैंक खातों में पैसे जमा करवाना भी रोजाना कहीं न कहीं से पुलिस के पास पहुंच रहा है। बहुत सी अधेड़ महिलाएं भी अपने घरबार की फिक्र छोड़कर इंटरनेट की ऐसी दोस्ती के फेर में पड़ रही हैं कि वे लुट भी रही हैं, और ब्लैकमेलिंग का खतरा भी झेल रही हैं। दरअसल कम्प्यूटर, फोन, और इंटरनेट जैसी सहूलियतों से लोग सोशल मीडिया पर एक ऐसी जिंदगी जीने लगे हैं जिसके खतरे का उन्हें अंदाज नहीं है। मानो वे किसी अनजाने जंगल में पहुंच गए हैं, जहां पर खाने लायक फल कौन से हैं, और जहरीले कौन से हैं इसकी परख-पहचान नहीं है, लेकिन वहां लोग खूब दुस्साहस के साथ हर फल को चख रहे हैं, फेसबुक के खाते बना रहे हैं, वॉट्सऐप पर तस्वीरें और वीडियो भेज रहे हैं, और इनमें से जहां जहर साबित होगा, उसका असर दिखने तक उससे बाहर आने का वक्त निकल चुका होगा।
आज सरकार और समाज को, और सबसे अधिक, स्कूल-कॉलेज और परिवार को बच्चों-बड़ों सभी को कम्प्यूटर-फोन, नेट-सोशल मीडिया की संभावनाओं और उसके खतरों दोनों से वाकिफ कराना चाहिए। इस काम में कम्प्यूटर और फोन कंपनियां चाहे कोई मदद न करें, क्योंकि गैरजिम्मेदार ग्राहक अधिक मुनाफा देते हैं, और खतरे से डरे-सहमे ग्राहक इन तमाम सामानों और सेवाओं का कम इस्तेमाल करेंगे, लेकिन घर-समाज और सरकार को अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभानी चाहिए। इसके लिए किसी साइबर-अपराध के विशेषज्ञों की जरूरत नहीं है, मामूली समझबूझ रखने वाले लोग भी स्कूल-कॉलेज जाकर या संगठनों-संस्थाओं की बैठक में जाकर लोगों को सूचना तकनीक के खतरों के बारे में बता सकते हैं। आज अधिकतर लोगों को इनमें से किसी बात के बारे में बड़ी कम जानकारी रहती है। लोग जिस तरह कहावत और मुहावरे में बंदर के हाथ उस्तरे की बात कहते हैं, वैसा बंदर के साथ होते तो किसी ने देखा नहीं है, इंसानों के हाथ मोबाइल फोन आने के बाद ऐसा जरूर देखने में आ रहा है।
पुलिस और अखबारों में जितने मामले पहुंच रहे हैं, उनसे हजार गुना अधिक मामले निजी ब्लैकमेलिंग तक पहुंचकर दब जाते हैं, और इससे न जाने कितने लोगों की जिंदगी तबाह होती है। जब मामला हत्या या आत्महत्या तक पहुंच जाता है, या परिवार के और लोगों की नजर में आ जाता है, तो उनमें से कुछ मामलों में लोग पुलिस तक जाने का हौसला दिखाते हैं। हमारा ख्याल है कि राज्य सरकार को साइबर-जागरूकता नाम का एक ऐसा कार्यक्रम शुरू करना चाहिए जो कि कम्प्यूटर-मोबाइल इस्तेमाल करने की उम्र शुरू होते ही लागू किया जाए, और इस उम्र से ऊपर के तमाम लोगों को उपकरणों और संचार-प्रणाली के खतरों के बारे में जागरूक किया जाए। जिस तरह लापरवाह सेक्स से एड्स का खतरा रहता है, उसी तरह लापरवाह साइबर-सक्रियता से जुर्म का शिकार होने, या ब्लैकमेल होने का खतरा बढ़ता है।
सरकार को स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रम में साइबर-अपराधों से सावधान रहने पर कुछ पन्ने जरूर जोडऩे चाहिए, और पुलिस भी अपनी सामाजिक भूमिका की अच्छी छवि बनाने के लिए जगह-जगह जाकर ट्रैफिक-जागरूकता की तरह साइबर-जागरूकता पर भी लोगों को जानकारी दे सकती है।

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