सड़कों पर अराजकता कड़ाई से कुचली जाए

संपादकीय
25 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पिछले खासे वक्त से बददिमाग रईसों की बिगड़ैल औलादें सड़कों पर महंगी गाडिय़ां दौड़ाते या तो खुद जान दे रही थीं, या दूसरों की जान ले रही थीं। और इनके सामने इस राजधानी में बैठे हुए पुलिस के बड़े-बड़े अफसर मानो बेबस थे कि इनको छूना वर्दी उतरवाने जैसा होगा। नतीजा यह था कि सड़कों पर लोगों का पैदल चलना मुश्किल हो रहा था कि कब कोई गाड़ी आकर कुचलकर चली जाएगी। कोई चाहकर भी इस शहर में साइकिलों पर नहीं चल सकते क्योंकि अधिक ताकतवर इंजनों वाली कारों और मोटरसाइकिलों के मन में पैदल और पैडल के लिए हिकारत के सिवाय कुछ नहीं है।
अच्छी खासी बड़ी कार जितनी कीमत वाली मोटरसाइकिलें दौड़ाते हुए लोगों की बददिमागी स्वाभाविक है क्योंकि इंजन और दाम सिर चढ़कर बोलते हैं। और लोग तरह-तरह के प्रेशर हॉर्न लगवाकर, साइलेंसरों से छेडख़ानी करके, हेडलाईट में फेरबदल करके सड़कों पर दौड़ का मुकाबला करते हैं, और बड़ी संख्या में तैनात पुलिस महज चालान करके छोड़ देती है। पिछले हफ्ते-दस दिन से रायपुर की पुलिस ने ऐसी दर्जनों महंगी बाईक जब्त की हैं, और शायद पहली बार इनके मामलों को अदालत ले जाया जा रहा है, न कि चालान की पर्ची थमाकर छोड़ा जा रहा है। हमारा यह मानना है कि सड़कों पर बददिमागी दिखाने वालों पर सिर्फ ट्रैफिक के नियम लागू करना काफी नहीं है, सड़क के दूसरे लोगों की जिंदगी के लिए जो खतरा ऐसे लोग खड़ा करते हैं, उनके खिलाफ पुलिस को दूसरी दफाओं के तहत भी कार्रवाई करनी चाहिए, और कानून में इसका खासा इंतजाम भी है। यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि जब सार्वजनिक जगहों पर नियम तोडऩे वाले लोगों पर कार्रवाई नहीं होती है, तो उससे दूसरे बददिमाग लोगों में भी कानून तोडऩे का हौसला खड़ा होता है, और बढ़ता है। यह सिलसिला कुचलने की जरूरत है, और जहां तक पुलिस पर खर्च की बात है, तो ऐसे चालान से सरकार को खासी कमाई भी होती है, और उससे पुलिस पर अधिक खर्च करने की जरूरत भी है।
लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में ही जो काम नहीं हो पा रहे हैं, वे यहां के बाकी शहरों में होने की संभावना नहीं हो सकती। रफ्तार नापने वाले राडार किसी वक्त आए होंगे, लेकिन उनका इस्तेमाल न दिखाई पड़ता, न सुनाई पड़ता। दूसरी तरफ शराब पिये हुए लोगों के नशे की जांच के उपकरण खराब पड़े हुए हैं, और जिनके पास बीस-पच्चीस लाख रूपए तक की बाईक के लिए पैसे हैं, उन्हीं लोगों का तबका देर रात तक मॉल्स में चलने वाले महंगे शराबखाने से नशे में भी निकलता है, और बिलासपुर में चार दिन पहले ऐसे ही नशे के बाद हुआ कत्ल इस बात का एक ताजा सुबूत है। छत्तीसगढ़ में छोटे-छोटे नियम-कानूनों की बड़ी-बड़ी अनदेखी आम बात है। राजधानी सहित बाकी शहरों में चाट ठेले तो साढ़े दस बजे रात से लाठी खाने लगते हैं, लेकिन मॉल्स के महंगे शराबखाने बिलासपुर के इस कत्ल के पहले तक सुबह तक दावतों से कमाई करते रहते थे, और फिलहाल उनकी जांच-पड़ताल शुरू हुई है। सरकार को आम जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी कड़ाई से पूरी करनी चाहिए, और सड़क, सार्वजनिक जगह, ऐसी कड़ाई के लिए सबसे पहले देखनी चाहिए। इन दिनों राजधानी में जो कड़ाई शुरू हुई है, वह पिछले बरसों में हुई रहती, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती। हम यह भी नहीं मानते कि ऐसे छोटे-छोटे मामलों में कोई बड़े राजनीतिक दबाव आते होंगे। इसलिए पुलिस और प्रशासन में बैठे हुए लोगों को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए, और लोगों की जिंदगी बचानी चाहिए। कुछ लोगों के पास अगर जरूरत से अधिक पैसा है, तो उन्हें दूसरे लोगों को कुचलने का हक देना गैरजिम्मेदार अफसर ही कर सकते हैं।

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