जापान की भयानक हिंसा से सबक लेने की जरूरत

संपादकीय
26 जुलाई  2016
जापान में मानसिक रोगियों के एक केंद्र में वहीं के एक भूतपूर्व कर्मचारी ने देर रात घुसकर 19 रोगियों को चाकू से काट डाला, और खुद को पुलिस के हवाले करते हुए उसने कहा कि वह तमाम विकलांगों और मानसिक रोगियों को धरती से मिटा देना चाहता है। वह पिछले कुछ समय से अपने आसपास के लोगों को यह कहते आया है कि विचलित और विकलांग लोग मार डाले जाने चाहिए। उसने जापानी संसद को भी एक चिट्ठी लिखकर यह मांग की थी कि ऐसे तमाम लोगों को इच्छामृत्यु देनी चाहिए। इस चिट्ठी में उसने ऐसे दो केंद्रों पर हमला करके 470 लोगों को मार डालने की योजना भी बयां की थी।
दुनिया के सक्षम लोगों के एक तबके में कमजोर लोगों के लिए हिकारत हमेशा से चली आ रही है बात है। संपन्नों के मन में विपन्नों के लिए जो नफरत रहती है वह बिरला वाईट सीमेंट के इश्तहारों में भी दिखती है कि हम बिरला वाईट वालों से चूने से रंगी दीवार वालों का क्या मुकाबला। जो ताकतवर होते हैं उनमें कमजोर लोगों के लिए नफरत होती है। भारत जैसे देश में जाति-व्यवस्था के चलते जो ताकतवर ऊंची जाति मानी जाती है, उसके मन में नीची मानी जाने वाली जाति के लोगों के लिए नफरत रोजाना ही कहीं न कहीं पुलिस में दर्ज हो रही है। इसी तरह औरत और मर्द में से ताकतवर मर्द का बाहुबल औरत पर तरह-तरह से कहर ढाते ही रहता है। बहुत से लोगों का यह मानना रहता है कि विकलांग, विचलित, या विशेष जरूरतों वाले बच्चों को खत्म कर देना चाहिए, ताकि न उनकी जिंदगी मुश्किल हो, न ही आसपास के लोगों की। जापान में जिस नौजवान ने वहां के इतिहास की अपने किस्म की यह सबसे बड़ी हिंसा की है, उसकी सोच भी इसी तरह की हिंसक सोच थी, और ऐसी जिंदगियों को खत्म करना उसे एक किस्म की सेवा का काम लग रहा था। इतने कत्ल करने के बाद उसने अपने-आपको पुलिस के हवाले कर दिया मानो उसका मकसद पूरा हो गया हो।
इस भयानक जुर्म के बाद अब जापान में लोग इस बात पर भी सोच रहे हैं कि लोगों के मन विचलित और हिंसक होने से कैसे रोके जाएं। विकलांग लोगों के मुद्दों पर काम करने वाले एक विशेषज्ञ का कहना है कि आज की जरूरत मानसिक केंद्र में दाखिल मानसिक-रोगियों के बारे में सोचने की कम है, ऐसे हत्यारे की दिमागी हालत के बारे में सोचने की अधिक है। हालांकि जापान और भारत के हालात अलग हैं, लोगों की सोच अलग है, लेकिन फिर भी तमाम देशों के और तमाम लोगों के इस हिंसा से यह सबक लेने की जरूरत है कि अपने-अपने दायरे में वे ऐसे तनाव, ऐसी नफरत, और ऐसी हिंसा को कैसे टाल सकते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें