एक दिव्यांग बेरोजगार की आत्महत्या और राजनीति

विशेष संपादकीय
27 जुलाई  2016
छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री-निवास पर नौकरी के लिए अर्जी देकर निकले एक दिव्यांग (विकलांग) नौजवान ने बाहर सड़क पर पेट्रोल छिड़का और आग लगा ली। जैसा कि उस खबर के आने के वक्त से लग रहा था, आज सुबह उसकी मौत हो गई। इस दौरान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह उसे देखने अस्पताल गए, और उसके इलाज का सरकारी खर्च पर इंतजाम किया। इस खबर के साथ-साथ लोगों को यह भी याद आया कि पिछले मुख्यमंत्री, कांग्रेस के अजीत जोगी के कार्यकाल में भी इसी तरह एक बेरोजगार नौजवान ने नौकरी की मांग करने के बाद मुख्यमंत्री निवास के बाहर जहर खा लिया था, और अस्पताल में उसकी मौत हो गई थी। ऐसी मौतों को लेकर राजनीति एक आम बात है, और उस वक्त हो सकता है कि बीजेपी ने उसे मुद्दा बनाया हो, और आज तो राज्य में विपक्ष में कांग्रेस और जोगी की कांग्रेस दोनों है, और दोनों के लिए यह एक बड़ा मुद्दा है।
लेकिन आज सभी पार्टियों को और सरकार को यह समझने की जरूरत है कि हर किसी को सरकारी नौकरी देना न तो मुमकिन है, और न ही जायज भी है। लोगों के आत्महत्या कर लेने के दबाव में कोई नौकरी नहीं दी जा सकती, और ऐसे दबाव के बिना भी शायद हजार बेरोजगारों पर एक ही सरकारी नौकरी मौजूद भी होगी। इसलिए ऐसी मौतों पर राजनीति करते हुए लोगों को यह याद रखने की जरूरत है कि इसके लिए मौत के वक्त की सरकार पर तोहमत लगाना तो आसान है, लेकिन क्या ऐसी तोहमत लगाकर बाकी बेरोजगारों को राह से भटकाने का काम तो नहीं हो रहा ? आज बेरोजगारों को यह समझने की जरूरत है कि सरकारी नौकरियों का दायरा बुरी तरह से सिमट रहा है, और निजी क्षेत्र में रोजगार भी बढ़ रहे हैं, और स्वरोजगार के मौके भी बढ़ रहे हैं। भारत की बाजार की अर्थव्यवस्था, और तरह-तरह की सेवाओं की जरूरत पूरी तरह से करवट ले चुकी है, और आज नए-नए किस्म के रोजगार रोज सामने दिखते हैं। ऐसे में सरकारी नौकरी न मिलने से निराश होकर आत्महत्या कोई विकल्प नहीं है।
न सिर्फ राजनीति में सक्रिय लोगों को, बल्कि सार्वजनिक जीवन में जो लोग भी अहमियत के ओहदों पर हैं, उनको अपने आसपास के लोगों को यह बताना होगा कि सरकार से परे भी खाने-कमाने के कितने तरह के विकल्प आज मौजूद हैं। सरकारी योजनाएं कागजों पर जितनी अच्छी दिखती हैं, उनसे अगर हकीकत में एक चौथाई भी अच्छी होंगी, तो भी कौशल विकास से कई लोग गैरसरकारी काम के लायक हो सकते हैं। फिर बैंकों से नए स्वरोजगार के लिए कर्ज मिलने को आसान बनाया गया है, और उसमें भी कई लोगों की संभावनाएं बढ़ सकती हैं, शायद बढ़ी भी हैं। इसलिए न सिर्फ सत्तारूढ़ दल, बल्कि विपक्षी दलों और बाकी लोगों की भी यह जिम्मेदारी है कि सरकार की योजनाओं के तहत लोगों को शिक्षण-प्रशिक्षण दिलवाने की पहल भी करें, और उनको स्वरोजगार शुरू करवाने में भी। मौतों पर राजनीति न नई बात है, और न ही यह कभी खत्म होगी। लेकिन चाहे जोगी के वक्त की मौत हो, चाहे रमन सिंह के वक्त की, ऐसी मौतों के मौकों पर समाज के सभी जिम्मेदार तबकों को यह तय करना चाहिए कि सरकारी नौकरियों से परे वे लोगों को खाने-कमाने के लिए किस तरह से तैयार कर सकते हैं। अगर राजनीति में सक्रिय तबके ऐसी लाशों को सरकार की नाकामयाबी साबित करने में लगे रहेंगे, तो वे समाज के बाकी नौजवान बेरोजगारों के सामने एक ऐसा झांसा चाहे-अनचाहे पेश कर देंगे कि नौकरी देना सरकार की जिम्मेदारी है। अगर सरकार देश-प्रदेश के हर बेरोजगार को नौकरी दे दे, तो साल भर में एक हफ्ते की तनख्वाह भी किसी को नहीं मिल पाएगी। इसलिए ऐसी तकलीफदेह मौत के मौके पर सत्ता और विपक्ष सभी को केन्द्र और राज्य की योजनाओं का फायदा अधिक से अधिक लोगों को दिलवाने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। ये योजनाएं रमन सिंह या नरेन्द्र मोदी की निजी योजनाएं नहीं है, यह देश की जनता के टैक्स के पैसों और सरकारी खजाने से चलने वाली योजनाएं हैं, और इनके तहत लोगों का कौशल विकास करना, उन्हें स्वरोजगार शुरू करवाना एक बड़ी प्राथमिकता रहनी चाहिए। निजी जिंदगी में निराशा से ऐसी मौत बड़ी तकलीफदेह बात है, और इसे लेकर मौत के दिन की सरकार को जिम्मेदार ठहराने की गैरजिम्मेदारी किसी को नहीं करनी चाहिए। कोई भी राजनीतिक दल ऐसा दावा नहीं कर सकते कि वे सत्ता में आने पर हर किसी को नौकरी दे देंगे।

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