ऐसे गोल्डन बाबाओं की हिफाजत पुलिस क्यों करे?

संपादकीय
29 जुलाई  2016
दो दिन पहले ही कई तस्वीरों के साथ एक खबर आई थी कि किस तरह गोल्डन बाबा नाम का साधू बना हुआ एक आदमी कांवर यात्रा कर रहा है, जो कि कई किलो सोने से लदा हुआ भी है। आज सुबह टीवी पर खबर थी कि इसके कई किलो सोने की हिफाजत के लिए राज्य की पुलिस का एक दस्ता इसके साथ चल रहा है, और जब इसने किसी सुरक्षित जगह पर ठहरने से मना कर दिया, तो पुलिस इसके लश्कर के साथ ही सो रही है।
इस गरीब देश में जहां पर कैदियों को जेल से अस्पताल या अदालत तक ले जाने के लिए पुलिस नसीब नहीं हो पाती, और वे बिना सुनवाई या बिना इलाज के जेलों में बंद पड़े रहते हैं, जहां पर गरीबों पर हुए जुर्म के मामलों की जांच बरसों तक नहीं हो पाती क्योंकि इन गरीबों की कोई ताकत नहीं होती है कि वे जांच को तेज करवा सकें, ऐसे देश में पुलिस की फिजूलखर्ची देखने लायक है। हमारे कहने का मतलब पुलिस का किया हुआ खर्च नहीं है, बल्कि जिस तरह से गैरजरूरी बातों पर पुलिस को खर्च किया जाता है, वह भयानक है। नेताओं और अफसरों के बंगलों पर अनगिनत पुलिस की तैनाती तो आम बात है ही, वहां पर तैनात सिपाहियों का मनोबल तोडऩे के लिए उनसे कपड़े भी धुलवाए जाते हैं, और कुत्ते घुमवाए जाते हैं। लेकिन आए दिन सड़कों पर तरह-तरह के अराजक जुलूस के लिए, गैरजरूरी और तंगदिल, तंगनजरिए के राजनीतिक आंदोलनों के लिए पुलिस को जिस तरह से झोंका जाता है, उससे लगता है कि अदालत को भारत के सार्वजनिक जीवन में अराजकता रोकने के लिए दखल देना चाहिए। जुलूस को लेकर, शहरों को बंद करवाने को लेकर, सड़कों पर हथियार लेकर चलने को लेकर कई किस्म के अदालती हुक्म बरसों से आकर लागू हैं, लेकिन उनका कोई इस्तेमाल कोई सरकार करना नहीं चाहती। नतीजा यह है कि पुलिस अपने बुनियादी काम को छोड़कर लोगों के शक्ति प्रदर्शन के इंतजाम में लगी रहती है, और इस पुलिस का तमाम खर्च इस देश की गरीब जनता की जेब से ही निकलता है।
हम छत्तीसगढ़ में ही लगातार होने वाले ऐसे राजनीतिक प्रदर्शन देखते हैं जिनमें पुलिस पुतलों की आग बुझाने के लिए बाल्टी और बोतलों में पानी लिए हुए तैनात रहती है, मानो किसी पुतले को नहीं, किसी जिंदा को जलाया जाने वाला है। इसी तरह बात-बात में कभी विधानसभा घेरने के लिए एक मुनादी होती है, तो शहर की तमाम सड़कों को खोदकर रास्तों को बंद कर दिया जाता है, और आम लोगों की जिंदगी को निलंबित कर दिया जाता है। ऐसे तमाम इंतजाम में इतनी बड़ी संख्या में पुलिस की तैनाती होती है कि बाकी सारे मामले धरे रह जाते हैं। नतीजा यह होता है कि मुजरिम पकड़ाते नहीं, अदालत में मामले जाते नहीं, जांच मजबूत हो नहीं पाती, और अपराधियों के छूट जाने का खतरा बढ़ते चले जाता है। ऐसे में जाहिर है कि जो पुलिस वर्दी में सामने दिखती है, उसके लिए लोगों के मन में हिकारत पैदा होती है।
आज धार्मिक पाखंडियों के लिए पुलिस की जितनी तैनाती होती है, उसे देखें तो लगता है कि जिसने संसार छोड़कर साधू बनना तय किया है, उसका कई किलो सोना पहनना कहां से जायज है? और अगर उसे अपने संन्यास के खिलाफ जाकर ऐसा करने का शौक है, तो उसकी हिफाजत के लिए पुलिस क्यों झोंकी जाए? जिसके पास ऐसे करोड़ों रुपये बर्बाद करने को हों, और जिसके सैकड़ों भक्त साथ चलते हों, वह चाहे तो खर्च करके अपने अंगरक्षक भाड़े पर ले, या फिर उस भगवान के भरोसे चले जिसका नाम लेकर वह ऐसा धंधा चला रहा है। बात-बात पर पुलिस को झोंकना पुलिस के हौसले को पस्त करना है, और उसे पेशेवर खूबियों से दूर करना भी है।

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