उत्तरप्रदेश के हाईवे पर हुई लूट-रेप के पीछे की वजहें

संपादकीय
31 जुलाई  2016
उत्तरप्रदेश की सड़क पर बीती रात हुए एक जुर्म से देश भर में एक नए तरह का खतरा दिखाई पड़ता है, और सफर करने वाले लोगों का हौसला इस जुर्म से पस्त हो जाना तय है। एक परिवार कार से जा रहा था, उसे सड़क पर लोहा फेंककर रोका गया, और फिर दर्जन भर हथियारबंद लुटेरों ने परिवार के लोगों को बंधक बनाकर लूटा और महिलाओं से बलात्कार किया। उत्तरप्रदेश और बिहार जुर्म को लेकर कुछ अधिक बदनाम राज्य हैं, लेकिन लूट और बलात्कार तो देश के हर प्रदेश में होते हैं, कहीं कम, कहीं अधिक। और लोग परिवार सहित सड़क के रास्ते सफर भी पूरे देश में करते हैं, और कई जगहों पर तो लड़कियां भी दुपहियों पर अकेले लंबे सफर पर निकल जाती हैं। अगर किसी जगह दर्जन भर हथियारबंद इक_े होते ऐसा जुर्म कर सकते हैं, तो बाकी जगहों पर ऐसा न होने की कोई वजह तो है नहीं।
भारत में आंतरिक खतरा समझे जाने वाले आतंकी संगठनों से निपटने की तैयारी तो बहुत चलती है, लेकिन छोटे-छोटे गिरोह या अकेले मुजरिम जिस तरह के जुर्म करते हैं, उनसे निपटना केन्द्र सरकार के दायरे में नहीं आता। और प्रदेश की पुलिस को ही ऐसे मुजरिमों पर काबू करना पड़ता है। आज इस मामले पर लिखने की जरूरत इसलिए भी हो रही है कि सुबह से उत्तरप्रदेश के एक मंत्री की एक टेलीफोन-रिकॉर्डिंग टीवी पर चल रही है कि वे किस तरह जिला पंचायत के प्रमुख अधिकारी को फोन पर मां-बहन की गालियां देते हुए धमका रहे हैं। अब यह तो उस अफसर ने इस कॉल की रिकॉर्डिंग कर ली, तो आज उसके हाथ मंत्री के खिलाफ एक सुबूत है, वरना कोई अफसर किसी मंत्री का क्या बिगाड़ सकते हैं? ऐसे में उत्तरप्रदेश अपनी पुलिस पर राजनीतिक दबाव के लिए बदनाम राज्य है, और ऐसा हाल देश के और भी बहुत से प्रदेशों में हो सकता है। जाहिर है कि ऐसे दबावतले काम करने वाली पुलिस अच्छा काम नहीं कर सकती, और उसके इलाके में तरह-तरह के जुर्म होना, उनका बढऩा तय है। लोगों को याद होगा कि कुछ हफ्ते पहले ही हरियाणा के जाट आंदोलन के दौरान सड़कों पर हुई बड़ी भयानक हिंसा, और सामूहिक बलात्कार की जांच रिपोर्ट सामने आई थी, और उसमें देश के एक बड़े प्रमुख और साख वाले रिटायर्ड पुलिस अफसर प्रकाश सिंह ने खुलकर लिखा था कि किस तरह हिंसा को रोकने के बजाय पुलिस के अफसर घर बैठ गए थे, मौका छोड़कर भाग गए थे।
जहां-जहां पुलिस को राजनीतिक दबाव में चुनिंदा मुजरिमों को छोडऩा पड़ता है, और कई तरह के जुर्म से आंखें मूंदनी पड़ती हैं, वहां पर पुलिस अपनी पसंद के कुछ मुजरिमों को छोड़कर भी उनसे कमाई करने लगती है। जब गोमुख से ही गंदगी बहकर निकलती है, तो गंगा में नीचे साफ पानी नहीं आ सकता। जब प्रदेश की राजनीतिक ताकतें पुलिस को उगाही और कमाई, गुंडागर्दी और धाक का औजार बनाकर चलती हैं, तो वैसे प्रदेशों में, वैसे इलाकों में आम जुर्म पर काबू खत्म होने लगता है। भारत में पिछले कई दशकों से पुलिस सुधार को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर तैयार रिपोर्ट धूल खाते पड़ी हैं, लेकिन उन पर अमल का राजनीतिक साहस नेताओं में नहीं रहता। पुलिस अगर ईमानदारी से काम करने लगे, तो नेताओं के, सत्तारूढ़-साम्प्रदायिक लोगों के पसंदीदा गुंडों को कौन बचाएगा? इसलिए देश में राजनीतिक ताकतें पुलिस की रीढ़ की हड्डी निकालकर रखना पसंद करती हैं, और इसीलिए जगह-जगह मुजरिमों का बोलबाला रहता है, और आम लोग तरह-तरह के जुर्म के शिकार होते हैं।

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