निजी जिंदगी में झांकते सरकार और कारोबार

संपादकीय
4 जुलाई  2016
ब्रिटेन में अभी सरकार और बाजार मिलकर एक नया प्रयोग शुरू कर रहे हैं जिसमें शहरों के बाजारों से निकलने वाले लोगों के मोबाइल फोन को वाईफाई के स्कैनर से दर्ज किया जाएगा, और उससे यह विश्लेषण किया जाएगा कि कौन से ग्राहक किस वक्त, किस दुकान के सामने से गुजर रहे हैं। जीवन की निजता के हिमायती लोग इस बात को निजी जिंदगी में दखल भी मान रहे हैं, और उनका यह भी मानना है कि ऐसे इकट्ठा की गई जानकारी का कई तरह से बेजा इस्तेमाल हो सकता है। लोग वैसे भी सड़कों पर लगे हुए सीसी टीवी कैमरों, कारों की नंबर प्लेट का रिकॉर्ड रखने वाले स्कैनरों को, पार्किंग मीटरों को निजी जीवन में दखल मान ही रहे हैं, और उसके खिलाफ दुनिया के विकसित देशों में एक आवाज उठ रही है।
हॉलीवुड में कुछ ऐसी फिल्में बन चुकी हैं जिनमें यह दिखाया गया है कि सरकार और कारोबार मिलकर कानूनी और गैरकानूनी तरीके से किस तरह उपग्रह और संचार प्रणाली का इस्तेमाल करके किसी भी व्यक्ति का कहीं भी छुपना नामुमकिन कर सकते हैं। लोगों को याद होगा कि अमरीका कई बरस तलाश करने के बाद भी ओसामा-बिन-लादेन तक नहीं पहुंच पाया था क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि लादेन कोई फोन या कम्प्यूटर इस्तेमाल नहीं करता था। अगर वह फोन पर रहता तो शायद बरसों पहले मारा गया होता। लेकिन टेक्नालॉजी के इस्तेमाल को लेकर लोगों के दिमाग में यह बात अब तक बैठ नहीं रही है कि मासूम लगते इस्तेमाल को गिनाते हुए जो निजी जानकारी जुटाई जाती है, उसे मुजरिम और बाजार दोनों अपने लिए इस्तेमाल कर सकते हैं। आज जब भारत जैसे बड़े देश में सरकारी वेबसाइटों पर आए दिनों चीन में बैठे हैकर घुसपैठ करते रहते हैं, जब दुनिया के बड़े-बड़े बैंकों में कम्प्यूटरों के रास्ते घुसकर अरबों-खरबों की लूट हो जाती है, तब भारत के आधार कार्ड जैसे साधारण दस्तावेज पर दर्ज निजी जानकारी कई तरह से लोगों के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती है।
अभी दो दिन पहले रायपुर म्युनिसिपल में यह घोषणा की कि हर घर के बाहर एक बायोमेट्रिक नेमप्लेट लगाई जाएगी जिस पर परिवार के लोगों के बारे में जानकारी दर्ज होगी, और म्युनिसिपल के कोई भी कर्मचारी एक मामूली कम्प्यूटर एप्लीकेशन से उस जानकारी को पढ़ सकेंगे। अगर यह बात सही है, तो यह मुजरिमों के लिए बहुत मजे की बात हो सकती है। वे किसी घर के बाहर जाकर ऐसे एप्लीकेशन से यह जान सकते हैं कि घर में किस-किस उम्र के कितने लोग रहते हैं, और फिर उस हिसाब से जुर्म की साजिश तैयार कर सकते हैं। आज भी इंटरनेट पर सरकार की तरफ से हर वाहन की जानकारी मौजूद है, और किसी गाड़ी के नंबर को डालकर न सिर्फ उसके मालिक का नाम-पता पाया जा सकता है, बल्कि यह भी पता लग जाता है कि उस पर किस कंपनी का कर्ज है। अब इस जानकारी को लेकर कोई अगर उस कंपनी के कम्प्यूटरों में घुसपैठ कर ले, तो कर्जदार के खाते की और तमाम जानकारियां मिल सकती हैं। यह सब काम घरों में बैठे हुए छोटे-छोटे बच्चे भी कर रहे हैं, और हैकिंग को लेकर किताबें भी लिख रहे हैं।
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने आधार कार्ड को अनिवार्य करने के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई अभी जारी रखी है, और यह बात तय है कि सरकार के रिकॉर्ड में आने वाली बहुत सी बातों की हिफाजत आसान बात नहीं होगी, और निजी जानकारियों को पाकर लोग कई तरह से उसका नाजायज इस्तेमाल करेंगे। आज हर हफ्ते ऐसी खबरें आती हैं कि देश में सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली रेलवे की रिजर्वेशन वेबसाइट को तोडऩे के लिए बाजार में कुछ सौ रूपए में ही तरह-तरह के कम्प्यूटर एप्लीकेशन मिल जाते हैं, और रिजर्वेशन-एजेंट आम मुसाफिरों को पीछे छोड़कर ऑनलाईन अपना काम पहले कर लेते हैं, और जायज मुसाफिरों के लिए सीट नहीं बचती। इसलिए सरकार को अपनी जुटाई गई जानकारी को सम्हालकर रखने की अपनी क्षमता को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंकना चाहिए, क्योंकि आज जो सुरक्षित दिख रही है, कल वहां तक पहुंचने का तोड़ निकल आएगा, तो ऐसी जानकारी देने वाले लोग उसके शिकार होंगे। सरकार और कारोबार इन दोनों की नीयत लोगों की निजी जिंदगी में ताक-झांक की रहती है और यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

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