फेरबदल और नए खून से सरकार को फायदा तय...

संपादकीय
5 जुलाई  2016
केंद्र की एनडीए सरकार के मंत्रियों में आज बड़ा फेरबदल हुआ है, और अभी तक उन्नीस नए मंत्रियों की शपथ हो चुकी है, पांच राज्य मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं, और हो सकता है कि अगले कुछ घंटों में कई मंत्रियों के विभाग बदल जाएं। दो ही दिन पहले मध्यप्रदेश में भी ऐसा ही कुछ हुआ है, और यह मानकर चलना चाहिए कि यह सरकार के भीतर अपने कार्यकाल की मध्यावधि में लिए गए फैसले हैं, जो कि एक असरदार बात हो सकती है। हम महज फेरबदल के लिए किसी फेरबदल की बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन जब किसी पार्टी या गठबंधन में बहुत से लोग मौका पाने से बचे हुए हों, उस वक्त मौजूदा लोगों को मूल्यांकन के बिना जारी रखना शायद सबसे अच्छा फैसला न होता हो।
ऐसा कभी भी नहीं हो सकता कि किसी सरकार में काम करने वाले सारे के सारे मंत्री अच्छा काम करने वाले हों, और उस पार्टी या गठबंधन में मंत्री बनने से रह गए बाकी लोगों में मंत्रियों से बेहतर कोई हो ही नहीं। लेकिन छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य को अगर हम देखें, तो दर्जन भर मंत्रियों की सीमा ऐसी है कि जिसमें क्षेत्र, जाति, गुट, और वरिष्ठता को देखते हुए फेरबदल की अधिक गुंजाइश शायद न निकलती हो, लेकिन फिर भी अगर सत्तारूढ़ संगठन और मुख्यमंत्री सरकार के कार्यकाल के बीच अगर ऐसा फेरबदल कर सकें, तो फेरबदल के पहले, और फेरबदल के बाद भी मंत्री अपना कामकाज बेहतर रखने की कोशिश करेंगे, और सार्वजनिक छवि का ख्याल भी रखेंगे। यह जरूरत सिर्फ छत्तीसगढ़ की नहीं है, किसी भी राज्य की है, और केंद्र सरकार की भी है। पूरे पांच बरस बिना फेरबदल चलने के नुकसान भी होते हैं, और ऐसी यथास्थिति मंत्रियों को लापरवाह भी बना देती है। इसलिए लोगों में फेरबदल, विभागों में फेरबदल, अधिकारियों में फेरबदल, काम की जगहों में फेरबदल एक निरंतर सिलसिला रहना चाहिए, ताकि लोग अपना सबसे अच्छा प्रदर्शन करके दिखा सकें।
अब केंद्र की मोदी सरकार और छत्तीसगढ़-मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की भाजपा की प्रदेश सरकारों का अगले चुनाव के हिसाब से कामकाज शुरू हो चुका है। पिछले चुनावों में यह देखने में आया है कि बैठे हुए सांसदों और विधायकों में से जहां-जहां अगले चुनाव में चेहरों को बदला गया है, वहां-वहां जीत का अनुपात बढ़ गया है। इससे भी लोगों को यह नसीहत लेनी चाहिए कि फेरबदल से आने वाला ताजा खून कामकाज को बेहतर बनाता है। छत्तीसगढ़ समेत बहुत से प्रदेशों में चुनावी रिकॉर्ड बताते हैं कि कई मंत्री अपनी तमाम ताकत के बावजूद चुनाव में निपट भी सकते हैं। ऐसी नौबत भी किसी पार्टी को न देखनी पड़े, इसके लिए भी सत्ता से जुड़ी कुर्सियों पर पांच साल के पट्टों के बजाय एक मध्यावधि-मूल्यांकन आधारित फेरबदल अधिक काम का हो सकता है। 

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