अब स्मृति शेष

संपादकीय
6 जुलाई  2016
केंद्र सरकार में कल हुए फेरबदल को लेकर इसी जगह हमने मंत्रियों के चेहरों और विभागों में फेरबदल को बेहतर कामकाज के लिए एक जरूरी रास्ता कहा था। कल शाम होते-होते यह खबर आ गई कि स्मृति ईरानी अब देश की शिक्षा (मानव संसाधन) मंत्री के बजाय, कपड़ा मंत्री रहेंगी। इस घोषणा के कई घंटे पहले हमने जो लिखा था, वह ऐसे ही फेरबदल को लेकर था कि जो लोग अपने काम को ठीक से नहीं कर पा रहे हैं, या तो उन्हें हटाकर दूसरों को मंत्रालय दिए जाएं, या फिर उनके विभाग बदलकर उन्हें कोई दूसरा काम दिया जाए। देश की शिक्षा में जितनी तबाही स्मृति ईरानी के इन दो बरसों में हुई, उसकी अगले ढाई-तीन बरस में प्रकाश जावड़ेकर कितनी भरपाई कर पाएंगे, यह आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन मोदी सरकार की पहली लिस्ट में जो सबसे विनाशकारी पसंद थी, वह अब देश के सामाजिक तानेबाने को छिन्न-भिन्न करने के बजाय कपड़ों के तानेबानों में उलझी रहेगी, यह देश की आने वाली पीढिय़ों के लिए बड़ी राहत की बात है।
इससे कुछ कम राहत की बात यह है कि विदेश मंत्रालय में अब तक राज्य मंत्री चले आ रहे भूतपूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल वी.के. सिंह के अलावा एम.जे. अकबर भी विदेश राज्य मंत्री रहेंगे। अकबर पहले लंबे समय तक अखबारनवीस रहे, फिर वे कांगे्रस पार्टी में जाकर पार्टी प्रवक्ता भी रहे, और चुनाव भी लड़ा। फिर उन्होंने अपने उगले हुए लाखों शब्दों को निगलते हुए अब मोदी का साथ चुना, और कल मंत्री बने। अखबारनवीसों की जिस नस्ल को जनरल वी.के. सिंह वेश्याओं के बराबर गिनते हुए प्रेस्टीट्यूट कहते हैं, उसी नस्ल में कोई चौथाई सदी काम करने वाला अब उन्हीं की बराबरी में आकर बैठा है, और ऐसा समझ पड़ता है कि विदेश मंत्रालय में इस बड़बोली तोप के मुकाबले एक सूखी हुई कलम को अधिक महत्व मिलेगा। वी.के. सिंह ने बेमौके के अपने बेतुके बयानों को लेकर जो रिकॉर्ड कायम किया था, वह बेमिसाल है, और विदेश मंत्रालय जैसे नाजुक काम में उन्होंने फौजी बूटों से काम लिया, और खासी तबाही की। लेकिन इस फेरबदल में जो एक-दो उम्मीदें की जा रही थीं, उनका न होना भी एक किस्म का संदेश है। मोदी मंत्रिमंडल के जो लोग घोर साम्प्रदायिक और हिंसक बयानों के लिए जाने जाते हैं, उनकी बिदाई की अटकलें चल रही थीं, उनमें से एक राम शंकर कठेरिया का हटना जरूर हुआ है, लेकिन उनके कुछ और तेजाबी भाई-बहन मंत्रिमंडल में बने हुए हैं।
जैसा कि हमने कल भी लिखा था, किसी भी पार्टी की सरकार में लोगों का फेरबदल कम से कम एक बार जरूर होना चाहिए, और ऐसा होने पर अगले चुनाव की टिकटों की लिस्ट में बदलने वाले चेहरों की गिनती कम हो सकती है। खराब काम करने वाले, बदनामी वाले, भ्रष्टाचार और विवाद में फंसे हुए लोग अगर पूरे पांच बरस जारी रहते हैं, तो हो सकता है कि वे तो अपनी भारी-भरकम कमाई की वजह से अगला चुनाव जीत भी जाएं, लेकिन वे बाकी तमाम सीटों पर थोड़ा-थोड़ा नुकसान करके पार्टी की संभावना को तबाह कर सकते हैं, करते हैं। मोदी सरकार में अब कोई बड़ा फेरबदल बाकी नहीं है। लेकिन देश के राज्यों में न सिर्फ भाजपा की सरकारों को, बल्कि सभी पार्टियों और गठबंधन की सरकारों को एक मध्यावधि-फेरबदल करना ही चाहिए, ऐसा करने पर मंत्रियों, विधायकों से लेकर सरकार और जनता का भी भला होगा। बिना फेरबदल पांच बरस बहुत लंबा वक्त होता है, और कोई यह कल्पना भी कर सकता है कि पांच बरस शिक्षा मंत्री रहते हुए स्मृति ईरानी देश का क्या हाल करके गई होतीं?

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