...अफसरों की बददिमागी शुरू होती है पदनाम से भी

संपादकीय
27 जुलाई  2016
इन दिनों तरह-तरह के कैमरों की मेहरबानी से हर तरह की तस्वीरें और वीडियो बात की बात में सोशल मीडिया और मीडिया पर तैरने लगते हैं। आज सुबह मध्यप्रदेश के एक अफसर का वीडियो एक समाचार चैनल पर था कि किस तरह छह महीने से राशन न पाने वाली गरीब महिलाएं उस अफसर के जूते पकड़-पकड़कर उसे प्रणाम करती जा रही हैं, और राशन देने की मेहरबानी मांग रही हैं। कल ही छत्तीसगढ़ के अखबारों में एक खबर थी कि एक आदिवासी महिला अपने शरारती बच्चे को एक आदिवासी आश्रम-छात्रावास में दाखिल करवाने गई, तो उसका आरोप है कि वहां बैठे अफसर ने उसे कहा कि कुत्ते-बिल्ली की तरह बच्चे पैदा ही क्यों करते हो। पिछले चार-छह दिनों से छत्तीसगढ़ के मीडिया में एक जिले की महिला कलेक्टर की तस्वीरें चल रही हैं जिनमें पहली तस्वीर में तो उन्हें वाहवाही मिल रही है कि वे बांध पर बहते पानी को पैदल पार करके किसी गांव तक पहुंच रही हैं, लेकिन इस वाहवाही की जिंदगी एक दिन से भी कम की रही क्योंकि अगले ही दिन उसी बांध की उनकी दूसरी तस्वीरें सामने आ गईं जिनमें उनका सुरक्षा गार्ड उनकी चप्पलें उठाए पीछे-पीछे चल रहा था। अब नक्सल इलाके में इस महिला कलेक्टर के ग्रामीण दौरे के समय गनमैन की अकेली जिम्मेदारी अपनी बंदूक के साथ चौकस रहते हुए अफसर की सुरक्षा होनी चाहिए थी, लेकिन उसका ध्यान अगर चप्पलों में रखा गया है, तो वह सुरक्षा क्या खाकर करेगा? और दूसरी बात यह कि आज जब भारत जाति व्यवस्था के जहर का शिकार है, तो अपने किसी मातहत से चप्पलें उठवाना भी कानून के भी खिलाफ है, और सामाजिक मर्यादा के भी। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ के एक और कलेक्टर ने पिछले दिनों एक अस्पताल का दौरा करते हुए मरीज के पलंग पर अपना जूता रखते हुए उससे बात की थी, और मीडिया में यह तस्वीर छाने के बाद उसे सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगनी पड़ी थी।
सरकारी नौकरी के साथ कई तरह की दिक्कतें हैं। एक तो यह कि सरकार में गड़बड़ी कुर्सियों के नाम से ही शुरू हो जाती है। जिले में सबसे अधिक ताकत की जो व्यवस्था कलेक्टर की कुर्सी के साथ जुड़ी हुई है, उसका वह नाम अंग्रेजों के वक्त से चले आ रहा है, और उसका काम जनता से टैक्स कलेक्ट करना हुआ करता था। अब अंग्रेजों के वक्त तो टैक्स इक_ा करना ही सबसे बड़ा काम था, लेकिन आज तो कलेक्टर शायद ही कुछ इक_ा करते हैं, और वे सरकारी बजट के सैकड़ों करोड़ रूपए अपने जिलों में खर्च ही करते हैं। फिर सरकार का नारा लोकतंत्र में जनता की सेवा का है, लेकिन इस कुर्सी का नाम कलेक्टर, जिलाधीश, या जिला दंडाधिकारी होने से इस पर बैठे हुए लोगों की सोच उसी मुताबिक ढलना स्वाभाविक है। छत्तीसगढ़ के ही एक बड़े अफसर ने एक वक्त यह सुझाव दिया था कि कलेक्टर या जिलाधीश के पद का नाम जिला जनसेवक रखना चाहिए ताकि पदनाम की वजह से उनके दिमाग में यह बात हमेशा साफ रहे कि उनका काम क्या है। आज सरकार और लोकतंत्र घोषित रूप से जनसेवा का काम बताते हैं, लेकिन नाम अंग्रेजों के वक्त का चले आ रहा है। जब देश का प्रधानमंत्री अपने आपको देश का पहला सेवक कह रहा है, तो फिर अफसरों के पदनाम से सामंती प्रतीक हटा देने चाहिए, और इसके साथ-साथ उनके काम के दायरे, उनके अधिकारों से भी सामंती व्यवस्था खत्म करनी चाहिए।
भारत में जब तक कोई अफसर कलेक्टर बनते हैं, या किसी की बराबरी की दूसरी कुर्सियों पर आते हैं, उनका सामाजिक शिक्षण सिर्फ एकेडमी में होता है। जिंदगी की असल हकीकत को उन्होंने बहुत कम देखा होता है, और उनके लिए नौकरशाह जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है जो कि हमारे हिसाब से एक अपमानजनक शब्द है और अफसरों के तबके को इसका विरोध भी करना चाहिए। न तो वे शाह हैं, और न ही नौकर हैं। वे महज एक सरकारी कर्मचारी हैं, जिनका काम जनता की सेवा करना होना चाहिए, और जहां-जहां अफसरों में यह परिपक्वता नहीं आती है, यह जिम्मेदारी नहीं आती है, वहां-वहां उनका अहंकार बदजुबानी और बदसलूकी के साथ जनता के बीच दिखता है। सरकार के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी यह याद रखना चाहिए कि सत्ता का कार्यकाल पूरा करने के बाद जब वे जनता के बीच चुनाव के लिए दुबारा जाते हैं, तो वे अफसरों के अच्छे या बुरे बर्ताव का भी नफा-नुकसान पाते हैं। इसलिए अपनी लोकतांत्रिक और संवैधानिक-सरकारी जिम्मेदारियों के तहत न सही, नेताओं को अपनी चुनावी-जिम्मेदारियों के तहत ही सही, अफसरों के व्यवहार पर काबू रखना चाहिए। और इसकी शुरुआत पदनाम बदलने से होना चाहिए, और जो सरकार ऐसे व्यवहार को अनदेखा करती है, वह सरकार अपने दुबारा लौटने की संभावनाओं को खोती ही है। चुनाव में जीत-हार छोटी बात हो सकती है, लेकिन कुछ लोगों के व्यवहार से पूरी की पूरी सरकार के लिए आम जनता के मन में अगर हिकारत और नफरत बैठ जाती है, तो यह लोकतंत्र पर से भरोसा उठने की बात रहती है। लोगों को याद होगा कि हिन्दी टीवी सीरियलों में एक सीरियल मुसब्बीलाल नाम के किरदार पर केन्द्रित, ऑफिस-ऑफिस नाम का भी था, जिसमें अभिनेता पंकज कपूर सरकारी दफ्तरों में धक्के खाते घूमता दिखता था, और हमारे आसपास के सरकारी दफ्तरों की हकीकत इससे कुछ बेहतर नहीं है।

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