धर्म के नाम पर जारी हिंसा लोकतंत्र में समाधान के रास्ते

संपादकीय
7 जुलाई  2016
आज जब पूरी मुस्लिम दुनिया, और दुनिया भर के मुस्लिम ईद की नमाज पढ़ रहे थे, सालाना खुशियां मना रहे थे, तब बांग्लादेश में एक बार फिर मजहब के नाम पर दहशत फैलाने वाले लोगों ने धमाका किया, और लाखों की भीड़ के बीच मौतें तो कम हुईं लेकिन यह बात जाहिर हुई कि आतंकियों की नजरों में उस धर्म के किसी त्यौहार का भी कोई मतलब नहीं है, जिस धर्म का नाम लेकर वे हिंसा कर रहे हैं, और लहू बिखेर रहे हैं। दूसरी तरफ भारत में मुस्लिम समाज के एक प्रवचनकर्ता जाकिर नाईक की बातों को भड़काऊ और हिंसक मानते हुए उनके खिलाफ प्रतिबंध की मांग की जा रही है, और ईद के इस मौके पर मुंबई में उन पर कार्रवाई के बैनर भी देखने मिले। दो दिन पहले ही यह रिपोर्ट आई थी कि मुस्लिमों के इस पवित्र महीने रमजान में दुनिया में जगह-जगह इस्लाम के नाम पर कितनी हिंसा हुई, और कितने लोग मारे गए। दूसरी एक रिपोर्ट पिछले साल-दो साल से हर कुछ हफ्तों में आती ही है कि किस तरह खाड़ी के देशों में इस्लामी आतंकी अपने कब्जे में रखी गई, गुलाम बनाई गईं लड़कियों की नीलामी इंटरनेट और वॉट्सऐप पर करते हैं। ये तस्वीरें भी सामने आईं कि इस्लामिक स्टेट के आतंकी किस तरह एक कमरे में बैठे हुए ठहाके लगा रहे हैं, और उन्हीं के पीछे उनके साथी किस तरह लड़कियों से बलात्कार कर रहे हैं।
दुनिया में धर्म के नाम पर हिंसा और आतंक का लंबा इतिहास है। भारत के बगल के म्यांमार में बौद्ध बहुसंख्यकों ने जिस अंदाज में वहां के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को मारना जारी रखा है, उसे खत्म करवाने में वहां की नोबल शांति पुरस्कार प्राप्त सत्तारूढ़ आंग-सान-सू-की की भी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती है। लेकिन धर्म का हिंसा से लेना-देना नया नहीं है। हिटलर के इतिहास को खोलकर देखें तो दिखता है कि किस तरह चर्च की मदद से हिटलर सत्ता में आ पाया था। और दूसरी तरफ वेटिकन का इतिहास देखें तो यह बात अच्छी तरह दर्ज है कि किस तरह पोप ने अपने पादरी-साथियों द्वारा बच्चों के यौन शोषण के मामलों को दबाने का काम किया, और ऐसे धार्मिक चोगों को जेल जाने से बचाकर रखा। भारत में कई धर्मों में तरह-तरह की हिंसा दिखाई पड़ती है, और हिन्दुओं में भी सतीप्रथा से लेकर कन्या भ्रूण हत्या, और देवदासी प्रथा जैसी कई तरह की हिंसा रही है, और अभी तो मोदी सरकार की जांच एजेंसी ही अदालत में ले जाकर एक हिन्दू संगठन के खिलाफ सुबूत पेश कर रही है कि किस तरह उसने एक न्यायप्रिय व्यक्ति नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या की थी, और आतंक की और घटनाओं की साजिश रची थी।
दरअसल धर्म की सोच को जब तक लोकतंत्र और न्याय की आधुनिक सोच के साथ नहीं ढाला जाएगा, तब तक धर्म का आतंक और हिंसा से रिश्ता टूट नहीं पाएगा। भारत में बहुत से मामलों में यह साम्प्रदायिक या कट्टर जिद सामने आती है कि धार्मिक मान्यता या आस्था, या धार्मिक रीति-रिवाज कानून से ऊपर हैं, संविधान से ऊपर हैं। और जब सरकारें ऐसी सोच को बढ़ावा देती हैं, तो फिर भावनाओं को भड़काकर अपनी ठेकेदारी चलाने वाले लोग इसे हिंसा तक ले ही जाते हैं, और फिर एक धर्म के भीतर चल रहे भड़कावे के जवाब में दूसरे धर्म के लोगों के बीच भी जवाबी भड़काना शुरू हो जाता है, आगे बढऩे लगता है। भारत जैसे लोकतंत्र में इस बात की बड़ी साफ जरूरत है कि तमाम किस्म की आस्थाओं को कानून के तहत ही रखा जाए, न कि छांट-छांटकर, समय और माहौल देखकर उन्हें कानून से ऊपर साबित करने की कोशिश की जाए। आज बहुत से मामलों में ऐसा दिखता है कि केन्द्र या राज्य सरकारें, राजनीतिक दल और बाकी संगठन धार्मिक भावनाओं को कानून से ऊपर बिठाने कीक कोशिश करते हैं, और देश की अदालतों को ऐसी कोशिशों के खिलाफ फैसले देने पड़ते हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और देश के लोगों के बीच एक वैज्ञानिक और न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक और तर्कसंगत सोच विकसित होने देनी चाहिए, वरना यह देश कई सदी पीछे पहुंच जाएगा।

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