इराक-हमले पर ब्रिटेन की जांच-रिपोर्ट सिखाती है हमलावर-ध्रुवीकरण के खतरे

संपादकीय
8 जुलाई  2016
ब्रिटेन में चिलकॉट कमेटी सात बरस से जांच कर रही थी और उसने अब यह नतीजा सामने रखा है इराक पर अमरीका द्वारा किए गए हमले में ब्रिटेन की भागीदारी अधूरे और अपुष्ट तथ्यों पर टिकी हुई थी, और युद्ध के पहले शांतिपूर्ण राजनीतिक विकल्पों पर विचार नहीं किया गया था। उस वक्त ब्रिटिश प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन से दुनिया को संभावित खतरों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया था और ऐसी आशंकाएं पूरी तरह बेबुनियाद थीं।
हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि हम लगातार इस हमले को अमरीकी गिरोह का हमला लिखते आ रहे थे, और अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और टोनी ब्लेयर को हम युद्ध अपराधी भी लिखते आ रहे थे, और यह वकालत कर रहे थे कि इन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए। बरसों से हमारे ऐसा लिखते आने के बाद, अब यह पहली इतनी महत्वपूर्ण जांच-रिपोर्ट सामने आई है, और इसके नतीजे देखकर, इसके निष्कर्षों के मुताबिक ब्रिटेन में बुश-ब्लेयर पर युद्ध अपराध के मुकदमे की मांग की जा रही है। इसके साथ ही यह मांग भी उठ रही है कि ब्रिटेन के जितने सैनिक और नागरिक इस युद्ध में मारे गए और शारीरिक और मानसिक जख्मों के साथ लौटे, उनके लिए मुआवजे की बात भी ब्रिटेन सहित पश्चिमी देशों में उठ रही है। यह बात कही जा रही है कि दुनिया के दो सबसे ताकतर ओहदों पर बैठे हुए लोगों की गलती और जिद का नुकसान इराक और अरब देशों सहित पूरी दुनिया को भुगतना पड़ा है, और दुनिया में आतंकी हिंसा उसके बाद से लगातार बढ़ते हुए आज अनगिनत देशों में फैल चुकी है। हम लगातार इस बात को भी लिखते आ रहे थे कि अमरीका और उसका गिरोह दुनिया के एक हिंसा और खतरे में झोंक रहे हैं, क्योंकि इन मुस्लिम या इस्लामी देशों में जब पश्चिमी हवाई और जमीनी हमलों में लाखों लोग मारे जा रहे हैं, तो उनका बदला लेने की बात कुछ या अधिक लोगों को तो सूझेगी ही, और आज वही हो रहा है। दुनिया में आतंक इराक पर हमले के पहले जितना था, उससे सैकड़ों गुना अधिक आज है, और जिन व्यापक जनसंहार के हथियारों, रासायनिक हथियारों, का आरोप लगाते हुए सद्दाम हुसैन के इराक पर हमला किया गया, सद्दाम को एक फर्जी अदालती कार्रवाई के बाद मार डाला गया, उसके खिलाफ भी हमने लगातार लिखा था।
दुनिया को यह बात सीखनी चाहिए कि बेकसूरों को मारकर दुनिया की कोई भी ताकत अपनी हिफाजत नहीं खरीद सकती। जिन लोगों ने अपने पूरे कुनबे को, अपनी पूरी बस्ती को, और अपनी पूरी पीढ़ी को गुंडागर्दी के एक हमले में खोया है, उसमेें से सारे के सारे लोग गांधीवादी अहिंसा के हिमायती नहीं हो सकते। और चाहे वह फिलीस्तीन हो, कश्मीर हो, मणिपुर हो, या छत्तीसगढ़ का बस्तर हो, बेकसूरों पर हिंसा के खिलाफ कभी न कभी, कहीं न कहीं से, कोई न कोई हथियार जरूर उठाते हैं। आज हालत यह है कि अमरीका अपनी सरहदों को सीलबंद कर लेने के बाद भी महफूज नहीं है, और वहां बसे हुए लोगों में से ही कई लोग वहां हिंसा की सोच रहे हैं, कर रहे हैं। यही हाल ब्रिटेन का हो रहा है, और यही हाल योरप के उन तमाम देशों का हो रहा है जो कि हमले में चाहे बुश-ब्लेयर के साथ न रहे हों, लेकिन जिन्होंने इस्लाम की खिल्ली उड़ाते हुए कार्टून बनाए, या किसी और तरह की धार्मिक छींटाकशी की। इराक पर हमले के बाद, अफगानिस्तान और पाकिस्तान पर हमले के बाद जिस तरह का माहौल दुनिया का बना, उसके चलते धार्मिक उन्माद के किनारे बैठे लोग भी उसके लपेटे में आ गए, और उन्होंने भी हथियार उठा लिए। नतीजा यह हुआ कि उस धमाके से उड़े टुकड़े हिन्दुस्तान में भी लोगों को मार रहे हैं, और पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक भी।
लेकिन इससे सिर्फ पश्चिमी देशों, और सिर्फ इस्लाम-समर्थकों या इस्लाम पर हमला करने वाले लोगों को ही सीखने की जरूरत नहीं है। हम अक्सर इस बात को यहां लिखते हैं कि जब कभी धार्मिक उन्माद या साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया जाएगा, तब-तब ऐसे बोए हुए बीज के पेड़ निकलकर दूर तक जाएंगे, और देर तक ऐसे जहर को फैलाएंगे। जिस किसी धर्म से जुड़ी हुई सोच, जिस किसी देश से जुड़ी हुई राजनीति यह सोचती है कि वह दुनिया के दूसरे धर्म को, या दूसरे इलाके को खत्म कर सकती है, वह गलती पर है। और भारत के लिए भी इस पूरी नौबत में बहुत से सबक हैं। इस देश को भी एक हमलावर-ध्रुवीकरण से बचना चाहिए, क्योंकि उसके नतीजे बेकाबू होंगे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें