दुनिया एक डिजिटल खतरे के ढेर पर बैठी हुई है पर...

संपादकीय
31 अगस्त  2016
दुनिया में आज मोबाइल फोन पर संदेश, तस्वीरें, और वीडियो-संगीत भेजने के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल होने वाली एक सर्विस, वॉट्सऐप का मालिकाना हक दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया सर्विस फेसबुक के पास आने के बाद अब एक के फोन नंबर दूसरी सर्विस को भी चले जा रहे हैं, और ऐसे मेल से इन सोशल-मीडिया कारोबारियों के पास अपने ग्राहकों का डाटा-बेस एकदम से दुगुना हो जाएगा। इससे लोगों की निजी जिंदगी किस तरह फोन और फेसबुक पर मिलकर एक हो जाएगी यह  अंदाज लगा पाना अभी संभव नहीं है, लेकिन लोग सोशल मीडिया पर इस बात को लेकर फिक्र कर रहे हैं, और यह सुझा रहे हैं कि अपनी फोनबुक को फेसबुक के साथ शेयर करने से कैसे बचा जा सकता है।
लेकिन हकीकत यह है कि रोजमर्रा की जिंदगी में शायद ही कोई ऐसे इंटरनेट-उपभोक्ता रहते हैं जो कि फोन और इंटरनेट पर इस्तेमाल होने वाले किसी एप्लीकेशन, या किसी सोशल मीडिया की लिखी गई नियम और शर्तों को पढ़ते हों, और उसके बाद उससे सहमति जाहिर करते हों। नतीजा यह होता है कि बाजारू और कारोबारी सभी तरह के इंटरनेट-सेवा, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, और संदेश वाली सेवाएं, ये अपने ग्राहकों या सदस्यों की निजी जानकारी के इस्तेमाल का हक हासिल कर लेती हैं, और उससे फिलहाल तो अपना विज्ञापनों का कारोबार बढ़ाने की बात करती हैं, लेकिन आज ही वह दूसरी किन बातों के लिए इन बातों का इस्तेमाल करती होंगी, यह अंदाज लगाना नामुमकिन है। कुल मिलाकर यह है कि जिन लोगों को अपनी निजी जिंदगी की गोपनीयता बनाए रखने में उन्हें ओसामा-बिन-लादेन की तरह फोन और इंटरनेट से दूर ही रहना होगा, तभी उनके बदन पर तौलिया बने रह सकता है। आज जो लोग सोशल मीडिया पर पहुंचते हैं, वे कानूनी कारोबारियों, और गैरकानूनी हैकरों, सभी के हाथों अपनी गोपनीयता खो बैठते हैं।
सोशल मीडिया ने आज निजी जिंदगी को जिस तरह से नाजुक बना दिया है, और उसकी जानकारी को खतरनाक बना दिया है, उसके बाद अब दुनिया में सरकारों की खुफिया जासूसी एजेंसियों का काम खासा घट गया है। कई बरस से चलते-चलते एक लतीफा अब पिट गया है कि अमरीकी सरकार ने सीआईए का बजट एक चौथाई कर दिया है, कि अब फेसबुक के बाद जासूसी का काम तो घर बैठे हो सकता है, उस पर दुनिया भर में इतना खर्च क्यों मंजूर किया जाए। और लोग न केवल अपने सामाजिक संबंधों के लिए, बल्कि अपने कारोबार के लिए भी इंटरनेट पर पूरी तरह टिक चुके हैं, और उनकी आम या खास हर तरह की जानकारी आज इंटरनेट पर है। इससे दुनिया का कारोबार और निजी जिंदगी दोनों ही इतने नाजुक हो गए हैं कि अगला कोई विश्व युद्ध ऐसा भी हो सकता है कि जिन इंटरनेट खातों पर कोई एक खास शब्द दर्ज हो, उन सारे खातों की सारी जानकारी को एक साथ मिटा दिया जा सके। मिसाल के तौर पर अगर कोई चाहे तो किसी धर्म की कुछ बहुत ही सामान्य बातों वाले ई-मेल खाते, वैसे सोशल मीडिया खाते, इनको एक साथ मिटा दिया जाए। ऐसे में एक खास धर्म के, एक खास देश के, एक खास रंग या जाति के, एक खास राजनीतिक विचारधारा के, एक खास आय वर्ग के लोगों को उनकी पूरी डिजिटल जिंदगी से अलग किया जा सकता है, और वे एकदम से डिजिटल-दीवालिया हो जाएंगे, न उनका इतिहास बचेगा, न उनका वर्तमान बचेगा, और भविष्य बनाने में शायद पूरी जिंदगी लग जाएगी। हमारी यह भविष्य की एक आशंका है कि अगले युद्ध हथियारों से नहीं लड़े जाएंगे, और किसी देश का डिजिटल-ढांचा खत्म करके उस देश को पल भर में लकवे का शिकार बना दिया जाएगा, ताकि वहां की जिंदगी थम जाए, खत्म हो जाए, और अराजकता से वहां दंगे होने लगें।
आज दुनिया को यह सोचने की जरूरत है कि किस तरह ऐसे डिजिटल-खतरे से बचने की तैयारी की जा सकती है, क्योंकि अब धीरे-धीरे किसी भी देश की सार्वजनिक सेवाओं, और रोज की जरूरतों का इतना कम्प्यूटरीकरण हो चुका है कि एक भी साइबर-अटैक देश की धड़कन को रोक सकता है। ऐसी कल्पना पर हॉलीवुड में फिल्में तो बहुत सी बनी हैं, लेकिन सरकार और समाज ऐसी नौबत से निपटने के लिए शायद कुछ कर नहीं पा रहे हैं।

सरकार में फाइलों से परे के जुबानी आदेश-निर्देश भी रिकॉर्ड करना ठीक होगा?

संपादकीय
30 अगस्त  2016
मनमोहन सिंह सरकार में कोयला-सचिव रहे एच.सी. गुप्ता ने आज  सुप्रीम कोर्ट में एक सुनवाई में कहा कि उन्होंने तमाम बातें उस समय कोयला मंत्रालय देख रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सामने रख दी थीं। इससे ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह कटघरे के और करीब पहुंच गए हैं, और आगे जाने उन पर इतनी जिम्मेदारी तय होगी। लोगों को याद होगा कि अभी इसी पखवाड़े इस रिटायर्ड आईएएस अधिकारी ने अदालत में रोते हुए यह कहा था कि वे अब आगे इस मुकदमे में अपना कोई पक्ष रखना नहीं चाहते, और न ही जमानत जारी रखना चाहते हैं, उन्हें जेल भेज दिया जाए। उनका कहना था कि उनके पास अब वकीलों पर और खर्च करने के लिए ताकत बची नहीं है, और जिसने जमानत ली है उसे अपनी गारंटी वापिस चाहिए इसलिए उन्हें जेल भेज दिया जाए। अदालत ने उन्हें मुफ्त में सरकारी वकील देने का प्रस्ताव रखा, लेकिन देश के एक सबसे बड़े मंत्रालय के सचिव रह चुके, और देश की सबसे ताकतवर आईएएस सेवा से रिटायर हुए इस व्यक्ति की इस बेबसी पर लोग हक्का-बक्का रह गए।
जब कोई कटघरे में है, तो उसकी ईमानदारी और बेईमानी पर अधिक चर्चा ठीक नहीं है, लेकिन इस अफसर के बारे में आमतौर पर सरकारी महकमों में जनधारणा ठीक रहती थी, और उन्हें ईमानदार माना जाता था। दूसरी तरफ मनमोहन सिंह को भी लोग निजी ईमानदार मानते थे, और लोगों को यह भरोसा शायद न हो कि मनमोहन सिंह ने रिश्वत ली हो। लेकिन जब कोई जनता के पैसों पर तनख्वाह पाने वाली कुर्सियों पर बैठते हैं, तो निजी ईमानदारी की बात किसी काम की नहीं रहती। हर किसी को निजी ईमानदार रहना चाहिए, और इसमें तारीफ की कोई बात नहीं हो सकती। दूसरी तरफ सरकारी, संवैधानिक या सार्वजनिक पदों पर बैठे हुए लोगों पर यह अनिवार्य जिम्मेदारी आती है कि वे अपने मातहत लोगों के कामों पर भी नजर रखें, और गड़बड़ी सामने आने पर तो उस पर कार्रवाई उनकी कानूनी जिम्मेदारी भी रहती है। मनमोहन सिंह के बारे में हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि कोई मुखिया अपने-आपको तब ईमानदार होने का तमगा नहीं दे सकता, जब उसके मातहत खुलेआम जुर्म कर रहे हों, और वह सबको दिख भी रहे हों। मनमोहन सिंह की ऐसी कोई निजी ईमानदारी अगर रही भी होगी, तो भी उन्होंने संविधान की शपथ लेकर जो कुर्सी संभाली थी, उस शपथ के साथ और उस कुर्सी के साथ तो उन्होंने अनदेखी की बहुत बड़ी बेईमानी की भी थी।
अब जब उनके मंत्रालय-सचिव रहे अफसर यह कह रहे हैं कि उन्होंने सब कुछ मनमोहन सिंह को बता दिया था, तो यह सोचने की जरूरत है कि क्या सरकारी फाइलों से परे की लोगों की सरकारी बातचीत को भी दर्ज किया जाना चाहिए? मंत्री और अफसर के बीच, अफसर और मातहत के बीच बहुत सारी बातें जुबानी होती हैं, और क्या अगर ऐसी बातचीत को कोई एक या दोनों पक्ष अपने फोन पर ही रिकॉर्ड करके रखने लगे, फोन पर होती बातचीत को रिकॉर्ड करने लगे, तो क्या वह सरकारी सेवा नियमों के खिलाफ होगा? या फिर उससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता बढ़ेगी? और कोई हैरानी नहीं है कि आज सूचना के अधिकार और अदालती-सक्रियता के इस दौर में सरकार में काम करने वाले लोगों में से कुछ लोग यह तय कर लें कि फाइलों से परे भी वे जुबानी निर्देश और आदेश को भी रिकॉर्ड करके रखेंगे।

पल को जीने के बजाय पल को बांटने का मजा

29 अगस्त 2016 

कुछ महीने पहले एक अमरीकी पत्रिका न्यू यॉर्कर में एक लेख छपा जो फोटोग्रॉफी और फोटो एडिटिंग के भविष्य को लेकर था। उसका शीर्षक बड़ा दिलचस्प था- भविष्य में हम फोटो हर चीज की खींचेंगे, लेकिन देखेंगे कुछ भी नहीं। यह अप्रैल के पहले हफ्ते में आया हुआ लेख है, लेकिन मुझे अपने बरसों की याद बिल्कुल ताजा है कि किस तरह यह बात तबसे मेरे साथ होते आ रही है जबसे फोटोग्राफी शुरू की है।
आज तो फिर भी जेब के मोबाइल फोन पर भी ठीकठाक फोटो खींच देने वाले कैमरे रहते हैं, लेकिन जिस वक्त कैमरे ही फोटो खींचते थे, उस वक्त एक बार फोटोग्राफी सीख लेने के बाद मेरे लिए बिना कैमरे कहीं जाना, न जाने के बराबर ही हुआ करता था। और फिर जैसे-जैसे कैमरे अच्छे आते गए, मेरे पास आते गए, तरह-तरह के लैंस आते गए, वैसे-वैसे देखना कम होते गया, और फोटो खींचना ही बच गया। इसलिए इस ताजा लेख में जो बात कही गई है, वह एकदम खरी बात है, और हो सकता है कि यह बात आम लोगों पर आगे जाकर लागू हो, मेरे सरीखे आधे-पेशेवर फोटोग्राफर पर तो अब भी लागू होती है।
बहुत पुरानी बात है, शायद 1980 के आसपास की। एक बड़ा मामूली सा कैमरा तोहफे में मिला था क्योंकि उस वक्त मैंने बीस बरस की उम्र में फांसी का एक आंखों देखा हाल लिखा था, और अखबार के प्रधान संपादक ने योरप से अपना लाया हुआ कैमरा मुझे दिया था। उन्हें यह हैरानी थी कि बीस बरस की उम्र में मैं कैसे तो फांसी देख पाया, और कैसे लिख पाया। लेकिन फांसी तो आई-गई हो गई, कैमरा मेरे पास रह गया, और उस कैमरे ने न सिर्फ फोटोग्राफी का शौक पैदा किया, बल्कि डार्करूम का काम भी सिखा दिया, और एक वक्त ऐसा आया कि बीच में कुछ बरस अखबार के काम के साथ-साथ मैं हर तरह की फोटोग्राफी का काम करने लगा, जो कि अखबार की तनख्वाह से दर्जनों गुना अधिक पैसा दे जाता था। खैर वह एक अलग लंबी कहानी है, फिलहाल बात चीजों को देखने और फोटो लेने की है।
एक ऐसा फोटोग्राफर होने के नाते जिसे कि अपनी तस्वीरें छपी हुई देखने की सहूलियत हासिल थी, मेरे फोटो लेने का उत्साह कुछ अधिक रहता था। उस वक्त 1980 के आसपास उस कैमरे से तस्वीरें लेने का पहला मौका आया जब मदर टेरेसा छत्तीसगढ़ आईं थीं। रायगढ़ में दो दिन उनके कार्यक्रमों की तस्वीरें लेते हुए उन्हें देखने की याद बहुत कम है, बस कैमरे के व्यूफाइंडर से उन्हें देखने की याद है, और यह सिलसिला तब से लेकर अब तक जारी है, और अब तो तरह-तरह के लैंस की मदद से सैकड़ों मीटर दूर के चेहरे को छू लेने की दूरी जितना करीब देखने की सुविधा भी है, और एक बार में आसमान से लेकर अपने खुद के जूतों तक का सब कुछ देख लेने की सहूलियत भी किसी दूसरे लैंस से हासिल है।
मतलब यह कि आंखें जितना, जैसा, और एक साथ जितना देख सकती हैं, कैमरा उससे कहीं अधिक दिखाने को तैयार है। नतीजा यह है कि आंखों से किसी जगह या किसी को देखना तो बस उस पल देखने जैसा रहता है। कैमरे से किसी को देखना तो मानो जिंदगी भर जब चाहो तब उसे देखते रहने जैसा रहता है। नतीजा यह हुआ कि आने वाले बरसों में हैलीकॉप्टर से छत्तीसगढ़ को देखते हुए, भारत के उत्तर-पूर्व से लेकर कन्याकुमारी तक दर्जनों शहरों को देखते हुए, दक्षिण अफ्रीका से लेकर अमरीका और फिलीस्तीन तक दर्जनों देशों को देखते हुए तब तक कुछ देखना नहीं हुआ, जब तक कैमरा साथ न रहा हो। कैमरा साथ न रहने पर देखी हुई जगहों को भी देखने का सुख जाता रहा, क्योंकि उन्हें दर्ज न कर पाने का दुख हावी रहा। अगर कैमरा नहीं है, तो देखने का कोई सुख नहीं है, और देखने का कोई मतलब भी नहीं है, यह बेबसी मैं बरसों से देखते आ रहा हूं, झेलते आ रहा हूं, और शायद यही बेबसी जो हर जगह कैमरा लेकर जाने की याद भी दिलाती है।
कल तक जो फोटोग्राफी थी, वह आज कुछ बदल भी गई है, और आज तस्वीरों का एक बड़ा हिस्सा उस सेल्फी का भी रहता है जो कि लोग अपनी खुद की खींचते हैं, और दोस्तों के बीच या सोशल मीडिया मेें बांटते हैं। मतलब यह कि लोग अगर किसी जगह पर जाते हैं, या कुछ नए कपड़े-गहने पहनते हैं, या दोस्तों की किसी टोली में रहते हैं, तो उन सबको भी मोबाइल फोन के कैमरे से होते हुए देखने की आदत बढ़ती जा रही है, और अगर सेल्फी न रहें, तो लोगों को शायद यह याद रखना भी मुश्किल होने लगेगा कि वे कब, कहां, किनके साथ, और किस तरह थे। मतलब यह कि याददाश्त का एक जिम्मा धीरे-धीरे कैमरे के हवाले होते जा रहा है, चाहे वह फोटोग्राफी का कैमरा हो या कि मोबाइल फोन का कैमरा हो।
दरअसल चीजों को किसी कैमरे के मार्फत देखते हुए एक बोझ दिमाग पर से कम होने लगता है। जब कैमरा ही सब कुछ दर्ज कर रहा है, तो हमें उसे देखकर उसकी याद रखने का बोझ घट जाता है। अब तो लोग किसी स्मारक या पुरातत्व की किसी महत्वपूर्ण जगह की तस्वीरें खींचते हैं, और उसके साथ जानकारी वाले सरकारी बोर्ड की फोटो भी ले लेते हैं, और बिना यह पढ़े निकल आते हैं कि उस जगह का क्या ऐतिहासिक या पुरातात्विक महत्व है। और कई बार तो यह भी होता है कि जिंदगी में दुबारा कभी उस जानकारी को निकालकर पढऩा हो ही नहीं पाता। लेकिन मन के भीतर यह एक अतिआत्मविश्वास भरे रहता है कि जब जरूरत हो तब देखने के लिए वह तस्वीर तो कम्प्यूटर की हार्डडिस्क पर है ही।
अब सवाल यह है कि देखने का जिम्मा अगर फोटोग्राफी और कैमरे ने ले लिया है, तो उससे क्या नफा है, और क्या नुकसान है? मैं अपनी खुद की सोच और आदत की बात करूं, तो बिना कैमरे किसी जगह का मजा लेना मेरे लिए मुमकिन नहीं है। और साथ ही यह एक बात भी है कि जब किसी जगह को महज कैमरे की नजर से देखा जाता है, तो लैंस से परे भी जिन पलों में उस जगह को देखा जाता है, वह देखने सरीखा नहीं होता। मतलब यह कि वहां से तस्वीरें लेकर तो लौटना हो जाता है, लेकिन उस तरह की यादों को लेकर लौटना नहीं हो पाता जिस तरह की यादें बिना कैमरे की आदत वाले किसी सैलानी के लिए मुमकिन है।
पर टेक्नालॉजी लौटकर जाने के लिए नहीं आती, वह इंसान की जिंदगी में दखल बढ़ाती चलती है, और लोगों के मिजाज को अपने पर और अधिक टिकाते चलती है। नतीजा यह निकलता है कि कैमरे छोटे होते जाते हैं, हल्के होते जाते हैं, बेहतर होते जाते हैं, और संचार के साथ जुड़ जाने की वजह से आज कैमरे पल भर मेें तस्वीरों को भेज भी देते हैं, और सोशल मीडिया पर पोस्ट भी कर देते हैं। इसलिए कैमरे के साथ किसी जगह पर जाने का एक पेशेवर-फोटोग्राफर के लिए तो अलग तरह का लालच रहता है, आम लोगों के लिए अपने मोबाइल के कैमरे के साथ भी किसी जगह जाने का लालच यह रहता है कि वे अपने करीबी लोगों तक उन तस्वीरों को बांट पाएंगे। लेकिन उस पल को, उसके नजारे को दूसरों तक बांटते हुए वह पल काफी हद तक हो चुका रहता है, और फोटो खींचने और बांटने के साथ-साथ उस पल को उसी तरह जी पाना कभी भी मुमकिन नहीं हो पाता। लेकिन टेक्नालॉजी से उपजी संभावनाएं ऐसी हैं कि लोग पल को जीने के बजाय पल को बांटने का अधिक मजा पाते हैं!
और टेक्नालॉजी ने लोगों की सोच को लोगों के निजी और सामाजिक अंतरसंबंधों को, लोगों की प्रचार की चाह को इस तरह बदल दिया है कि अब यह बात बहुत लोगों के लिए अधिक, और अधिक, खरी होते दिख रही है कि लोग अब तस्वीरें हर चीज की खींचेंगे, देखेंगे कुछ नहीं! लोग गुजर चुके बहुत से पलों को शायद आगे जाकर उस वक्त पहली बार देख और भोग पाएंगे, जब आगे किसी वक्त बैठकर वे उन पुरानी तस्वीरों को देखेंगे। लेकिन तस्वीरें तो महज देखने की होंगी, गुजर चुके उस पल का एहसास शायद ही कभी लौट सकेगा, क्योंकि कैमरे ने वह संभावना खत्म कर दी है। 

कश्मीर का समाधान महज श्रीनगर के राजभवन में नहीं बाकी देश में भी जरूरी

संपादकीय
29 अगस्त  2016
कश्मीर को लेकर भारत में फिक्र बनी हुई है। पचास दिन के कफ्र्यू के बाद आज वहां कुछ ढील दी गई है, और दो दिन पहले ही वहां की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती आकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलकर गई थीं। अभी यह खबर भी आ रही है कि कश्मीर के मुद्दे को सुलझाने में लगे हुए केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अब एक सर्वदलीय प्रतिनिधि मंडल के साथ कश्मीर जाने वाले हैं, और वे पिछले कुछ हफ्तों में दो बार वहां होकर आ भी चुके हैं। उन्होंने महबूबा के साथ जब मीडिया से बात की थी, तो केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के बीच कोई मतभेद नहीं थे, और महबूबा ने ही श्रीनगर के मीडिया के तीखे सवालों को झेला था, और कश्मीर में चल रह उपद्रव पर तीखे सवाल खड़े भी किए थे। आज ही एक खबर यह भी है कि देश के कुछ गैरराजनीतिक प्रमुख लोगों को कश्मीर का समाधान ढूंढने के लिए एक अनौपचारिक टीम की तरह वहां भेजा जा सकता है, और इसके लिए देश के एक सबसे बड़े, और उदार सोच वाले संविधान विशेषज्ञ वकील सोली सोराबजी का नाम भी सामने आया है, और एक वरिष्ठ पत्रकार रहे हुए, भारत-पाक मामलों के बड़े पुराने जानकार, और दोनों देशों के बीच अच्छे रिश्तों के हिमायती कुलदीप नैयर का नाम भी लिया जा रहा है। लोगों को याद होगा कि मनमोहन सिंह के समय भी एक वरिष्ठ पत्रकार दिलीप पडग़ांवकर, और दिल्ली की एक प्राध्यापक राधाकुमार जैसे कुछ लोगों को एक औपचारिक कमेटी बनाकर कश्मीर भेजा गया था, और वे अपनी क्षमता जितनी कोशिश करके लौटे भी थे।
आज भारत की दिक्कत यह है कि इसकी अधिकतर समस्याओं का समाधान तो निकल सकता है, लेकिन कुछ राजनीतिक दलों के समर्थकों के ऐसे संगठन हैं, जिनका अपना अस्तित्व कई तरह के तनाव बने रहने पर टिका हुआ है। कुछ लोगों का अस्तित्व साम्प्रदायिक नफरत पर जिंदा है, कुछ लोगों का अस्तित्व महिलाओं के खिलाफ बयानबाजी से चलता है, और कुछ लोग इस देश में एक ऐसी सनातनी हिन्दू संस्कृति लाना चाहते हैं जिसमें दलितों-आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और मांसाहारियों का खानपान भी सनातनियों के काबू में रहे। आज अगर केन्द्र की मोदी सरकार और एनडीए की मुखिया भारतीय जनता पार्टी, जो कि कश्मीर में महबूबा मुफ्ती के साथ राज्य की सत्ता में भागीदार भी है, वे अगर यह सोचते हैं कि कश्मीर एक भौगोलिक समस्या है, तो वह सोचना निहायत गलत होगा। जब पूरे देश में मुस्लिमों के खिलाफ एक उन्माद फैलाया जाएगा, उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर रखने की वकालत की जाएगी, उनके खानपान पर रोक लगाई जाएगी, उनके कारोबार तबाह किए जाएंगे, सड़कों पर कश्मीरी मुस्लिम ट्रक ड्राइवरों को रोक-रोककर मारा जाएगा, तो कश्मीर कभी भी भावनात्मक रूप से बाकी भारत से नहीं जुड़ पाएगा। एक देश की विविधता न सिर्फ धर्मों में होती है, न सिर्फ भौगोलिक सीमाओं में होती है, बल्कि वह रीति-रिवाजों की विविधता भी होती है, और उसके सम्मान के बिना कोई दो इलाके, दो धर्म, दो जातियां, या दो संगठन साथ नहीं रह सकते। सहअस्तित्व और परस्पर सम्मान लोकतंत्र की अनिवार्य शर्तें रहती हैं, और इनको अनदेखा करके कश्मीर का कोई हल नहीं निकल सकता।
कश्मीर के मुद्दे को लेकर भाजपा का इतिहास चाहे जो रहा हो, आज केन्द्र सरकार चलाने की जिम्मेदारी जब उस पर आई है, और जब जम्मू-कश्मीर सरकार में वह भागीदार भी है, तो भाजपा के भीतर भी एक तबका जिम्मेदारी की बात भी करता है। केन्द्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इस रूख को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि उन्होंने कश्मीर जाकर यह कहा कि कश्मीर के बिना भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। और यह बात सभी को समझने की जरूरत है कि कश्मीर का मतलब महज डल झील, वहां के पहाड़, वहां की नदियां, और वहां की जमीनी खूबसूरती नहीं हैं। कश्मीर के साथ वहां के लोग जुड़े हुए हैं, उनकी हसरतें जुड़ी हुई हैं, उनका इतिहास जुड़ा हुआ है, और भारत के भीतर कश्मीर का जो खास दर्जा इतिहास में दर्ज हुआ था, वह भी जुड़ा हुआ है। इसलिए कश्मीर के मुद्दे पर देश के भड़काऊ लोगों का हौसला पस्त किए बिना कोई अगर यह सोचे कि महज श्रीनगर के राजभवन में बैठकर कश्मीर समस्या का हल निकल जाएगा, तो वह आखिर तक सपना ही बने रहेगा। कोई अगर यह सोचे कि फौज की तैनाती से कश्मीर का हल निकल जाएगा, तो ऐसी फौज वहां पौन सदी से चली आ रही है, और कोई हल नहीं निकला। कश्मीर को भारत में बनाए रखने के लिए वहां के लोगों की भावनाओं को समझना होगा, उनके जख्मों पर मरहम रखना होगा, और बाकी हिन्दुस्तान में भी धर्म के आधार पर नफरत को खत्म करना होगा। इस मुद्दे पर इन दो कॉलमों में तमाम पहलू नहीं लिखे जा सकते, लेकिन फिर भी कश्मीर का समाधान वहां से बाहर भी बाकी देश में भी ढूंढना होगा, और उसकी शुरुआत करने के लिए मुद्दे सामने हैं, पहचाने हुए हैं, और हमारा यह भी मानना है कि देश की बाकी पार्टियों को भी केन्द्र सरकार के साथ मिलकर अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने में हिचक नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यह एक ऐसा मौका भी रहेगा कि भाजपा अपनी कुछ रीति-नीति को सुधार भी पाएगी, जो कि देशहित में जरूरी भी है।

अनुयायी बनने के पहले अपनी अक्ल का भी इस्तेमाल करें

संपादकीय
28 अगस्त  2016
भारत में सुबह टीवी पर किसी भी हिन्दी समाचार चैनल को शुरू करें, तो खबरों से अधिक उस पर बाबा रामदेव हावी दिखते हैं। पहले वे योग बेचते थे, फिर वे सामाजिक आंदोलन बेचने लगे, फिर वे एक राजनीतिक दल भाजपा के सेल्समैन हो गए, और अब आयुर्वेदिक दवाईयों से लेकर तेल-साबुन, सौंदर्य प्रसाधन, आटा और मसाले, और भी न जाने क्या-क्या बेचते हुए वे देश के सबसे बड़े सेल्समैन बन गए हैं। वे कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मुकाबले नूडल्स भी बेचने लगे हैं, और अधिक दिन नहीं लगेंगे कि वे चॉकलेट से लेकर, शायद आयुर्वेदिक-कंडोम तक बेचने लगें। यह एक आजाद देश है, इसलिए किसी योगी को कारोबारी बनने से कोई नहीं रोक सकता, और न ही किसी कारोबारी को योगी बनने से रोका जा सकता। हर साल दो साल में ऐसी खबरें आती हैं कि गुजरात या राजस्थान में हीरों के कौन से अरबपति-खरबपति कारोबारी ने यह मायावी संसार छोड़ दिया और संन्यासी हो गए। इसलिए यह देश कई तरह की विविधताओं वाला है, और योग सिखाने वाला अपना एक हाथ उन लोगों के कंधे पर रखकर चलता है जो कि बलात्कार के लिए नूडल्स को जिम्मेदार ठहराते हैं, और दूसरा हाथ वह जड़ी-बूटियों पर रखता है।
बाबा रामदेव की ऐसी हरकतों से अधिक हैरानी नहीं होती, क्योंकि रामलीला मैदान से महिला के कपड़े पहनकर भागने से लेकर, कांग्रेस के खिलाफ अभियान छेडऩे तक, देश में काला धन वापिस लाने के लिए अपनी जान कुर्बान कर देने का अंदाज दिखा देने तक, और अब गिन-गिनकर अपने अलावा देश के बाकी सारे कारोबारियों की साख चौपट करने तक रामदेव ने एक परले दर्जे की मतलबपरस्ती साबित की है, और योग, आयुर्वेद, समाजसेवा, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रसेवा की नौटंकी से गुजरते हुए वे अब एक खालिस कारखानेदार और कारोबारी के रूप में स्थापित हो गए हैं। आमतौर पर कारोबारियों के संन्यास तक जाने के मामले दिखते हैं, यहां यह भगवा खरबपति बाकी तमाम लोगों को कोसते हुए, मॉडलिंग करते हुए, और अपने कारोबार को राष्ट्रप्रेम बताते हुए टीवी के पर्दों पर छाया रहता है।
इस पर लिखने की अधिक कुछ जरूरत नहीं थी, सिवाय इसके कि योग का नाम लेकर दुकान खड़ी करने वाला आदमी जब बाजार में एकाधिकार के लिए लडऩे लगता है, देश और प्रदेश की सरकारों से रियायतें पाकर बहुत बड़ा कारखानेदार बनने लगता है, तो कारोबार तो चल सकता है, योग की साख चौपट होती है। भारत में योग को बढ़ावा देने वाले बहुत से और लोग रहे हैं, जिन्होंने योग से कुछ भी नहीं कमाया, किसी दूसरे को गाली नहीं दी, कोई झूठे नारे नहीं उछाले, किसी पार्टी का प्रचार नहीं किया, लेकिन रामदेव ने एक अलग तरह की दुकान खड़ी की। और आज ही एक दूसरी खबर यह बताती है कि भाजपा के पसंदीदा, या भाजपा के एक प्रचारक श्री श्री रविशंकर ने एक तस्वीर जारी की है जिसमें वे कश्मीर में मारे गए एक आतंकी नौजवान के पिता के साथ खड़े हैं। इस कश्मीरी बुजुर्ग का कहना है कि वे अपने इलाज के लिए रविशंकर के आश्रम गए थे और रविशंकर ने उनसे उनके बच्चों के बारे में पूछा, और उनके साथ एक तस्वीर खिंचवानी चाही। दूसरी तरफ इसके पहले ही रविशंकर ने यह तस्वीर पोस्ट करके लिखा कि कश्मीरी आतंकी का यह पिता दो दिन उनके आश्रम में रहा और उन्होंने कश्मीर के बहुत सारे मामलों पर इससे विस्तार से चर्चा की। अब रविशंकर के यह कहने के बाद जो खंडन दूसरी तरफ से आया है, वह बताता है कि बड़ी-बड़ी शोहरत पा चुके भारतीय आध्यात्मिक गुरू या योगी भी किस तरह के उथले प्रचार के लिए मारे-मारे फिरते हैं, और किसी भी मौके को दुहने की फिराक में रहते हैं।
लोगों को इस बात में फर्क समझना चाहिए कि कौन योगी है, और कौन आध्यात्म को बढ़ाने वाला है। और लोगों को यह भी समझना चाहिए कि राजनीति पर धर्म का कब्जा साबित करने के लिए दो दिन पहले ही हरियाणा की विधानसभा में जैन मुनि तरूण सागर ने पत्नी पर पति के कब्जे की जैसी मिसाल दी है, उससे धर्म की सोच पता लगती है। इन सब बातों को देखते हुए लोगों को किसी का अनुयायी बनने के पहले अपनी अक्ल का इस्तेमाल भी करना चाहिए। 

इंसानियत से निराशा रोकने का एक आसान नुस्खा...

संपादकीय
27 अगस्त  2016
पिछले दो दिनों की खबरों को देखें तो इंसानियत पर एक अलग किस्म का भरोसा होने लगता है। लेकिन यह भरोसा किसी शब्दकोष में इंसानियत के जो मायने हैं उनसे अलग है, और इंसानियत हकीकत में क्या होती है, उसके मुताबिक है। ओडिशा की दो खबरें थीं, एक तो यह कि एक गरीब आदिवासी की बीवी सरकारी अस्पताल में गुजर गई और तमाम सरकारी योजनाओं के बावजूद उसे कोई गाड़ी नहीं मिली, तो वह 60 किमी दूर अपने गांव के सफर पर लाश को कंधे पर लेकर रवाना हो गया, और साथ में उसकी छोटी बेटी रोते-रोते चल रही थी। दस किमी के बाद कुछ लोगों को यह दिखा, तो अफसरों तक दौड़-भाग करके उसके लिए गाड़ी का इंतजाम किया। ओडिशा से ही दूसरी घटना एक दिन बाद आई, वह और भी भयानक है। एक कोई महिला गुजरी, और उसकी लाश घर तक ले जाने के लिए पैसे नहीं थे, तो दो लोगों ने मिलकर लाश की हड्डियां तोड़ीं, और उसकी गठरी बनाकर बांस पर टांगकर, ले गए।
मानो इन दोनों तस्वीरों से इँसानियत की परिभाषा ठीक से न बनी हो, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कल सुबह-सुबह सड़क पर दो गाडिय़ां टकराईं, और मुर्गियां ले जाते हुए एक गाड़ी के दोनों कर्मचारी बुरी तरह कुचली गाड़ी में फंसे रह गए। उन्हें निकालकर अस्पताल भेजने का जो मौका हो सकता था, उस मौके पर आसपास से जुटे हुए लोग मुर्गी लूटने में जुट गए, और कैमरों की परवाह किए बिना भी लूटकर ले जाते रहे। नतीजा यह हुआ कि दोनों कर्मचारी वहीं पर मारे गए। फिर उधर दिल्ली की एक खबर कल आई कि किस तरह एक महिला अपने शराबी पति से परेशान होकर उसे छोड़कर चली गई, और जाते हुए अपने बेटे को तो साथ ले गई, दो छोटी बेटियों को शराबी पिता के पास छोड़ गई, जिन्हें ताले में बंद करके पिता चले गया, और बाद में पुलिस ने उन्हें बुरी हालत में छुड़वाया। इधर मध्यप्रदेश की एक खबर है कि किस तरह एक बस में सफर करती महिला गुजरी, तो बस के कर्मचारियों ने उसकी लाश सहित पति और पांच दिन की बेटी को जंगल में उतार दिया। अभी यह लिखते हुए रायपुर की एक खबर है कि एक मंदिर के पीछे एक झोले में बंद एक नवजात शिशु मिला है जो कि जिंदा भी है। मिला तो वह भगवान के पिछवाड़े है, लेकिन बचाया उसे इंसानों ने है।
अब इंसानियत किसे कहा जाए? चारों तरफ से रोज जो खबरें आती हैं, वे बताती हैं कि इंसान की सोच के, उसके मिजाज के जिस हिस्से को हैवानियत कहा जाता है, वह पूरी तरह से इंसानी दिल-दिमाग का ही एक हिस्सा है, और उससे आजाद इंसान कम हैं। ऐसी हैवानियत दिखाने की बेबसी और मौका दोनों रहें, और उसके बाद भी लोग इंसान बने रहें, जिसे लोग इंसानियत कहते हैं, वह दिखाते रहें, ऐसा कम ही होता है। लोग भले बने रहते हैं, क्योंकि भलापन छोडऩे से उनको कोई फायदा नहीं दिखता है, और बुरा बनने की कोई बेबसी नहीं रहती है। आज इंसानियत शब्द को लेकर जितने तरह की शिकायतें लोगों को रहती हैं, वे इसलिए रहती हैं कि इंसान की सोच के महज अच्छे हिस्सों को इंसानियत मान लिया गया है, और बुरे हिस्से को नाजायज कही जाने वाली औलाद की तरह छोड़ दिया गया है।
यह याद रखने की जरूरत है कि हैवान जैसा दुनिया में कुछ भी नहीं है। जो भी है वह इंसान के भीतर ही है, और इंसान के भीतर हर किस्म की हिंसा है, हर किस्म का जुर्म करने की ताकत और हसरत है, इसलिए अपने ही एक हिस्से को रावण के पुतले की तरह बनाए गए हैवान और हैवानियत नाम के शब्दों पर थोपना नाजायज है। जब तक अपनी खामियों को कोई मानते नहीं, तब तक उससे आजाद होने का सिलसिला शुरू नहीं हो पाता। इसलिए इंसानों को सबसे पहले यह मानना पड़ेगा कि जितनी बातों को हैवानियत कहते हैं, वे हमारा ही एक हिस्सा है, आंखों की तरह, कानों की तरह, या हाथ-पैर की तरह, हैवानियत हमारी ही है, और इंसानियत उसे मिलाकर ही बन सकती है, महज अच्छी बातों से नहीं। जब ऐसा सोच लेंगे, तब तथाकथित इंसानियत से निराशा होना भी बंद हो जाएगा।

बेरोजगारों के हक में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

संपादकीय
26 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का फैसला आने में ग्यारह बरस तो लग गए, लेकिन इससे उन दर्जनों लोगों की जिंदगी ही बदल जाएगी जो कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग में 2003 में छांटे गए उम्मीदवारों की लिस्ट को गलत बताते हुए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे। इस फैसले के बाद जो उठापटक और फेरबदल होगी, वह कुछ खतरनाक भी होगी, क्योंकि बड़े प्रशासनिक पदों पर पहुंच चुके राज्य सेवा के अफसरों की नौकरी भी जा सकती है, और कुछ लोगों को नौकरियां मिल भी सकती हैं जो कि 2003 से अब तक बिना नौकरी के थे। हाईकोर्ट ने पूरी चयन सूची को खारिज करते हुए नई चयन सूची बनाने को कहा है, और इस फेरबदल से हो सकता है कि जो अफसर आज बड़े पद पर हैं, वे कल अपने ही किसी मातहत के नीचे काम करने को मजबूर हो जाएं, और जो लोग मातहत काम कर रहे थे, वे सीनियर हो जाएं।
लेकिन मध्यप्रदेश का व्यापमं घोटाला हो, या कि छत्तीसगढ़ की पीएससी का यह मामला हो, इन दोनों की तरह के मामले देश के दूसरे प्रदेशों में भी हुए हैं और बरसों की नौकरी के बाद लोगों को काम से निकाला भी गया है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्टके एक फैसले के बाद पंजाब के सौ जजों को दस बरस की नौकरी के बाद हटा दिया गया था। राज्य सरकार के लिए भी आज आए हुए बिलासपुर हाईकोर्ट के इस फैसले पर अमल से कई तरह की विसंगतियां खड़ी होंगी, और शायद राज्य सरकार को मंत्रिमंडल में इस फैसले को ले जाकर यह भी विचार करना होगा कि क्या 2003 से अब तक काम कर रहे लोगों की नौकरी जारी रखने के लिए मंत्रिमंडल कोई फैसला ले। लेकिन कुल मिलाकर बड़े कमजोर तबके की एक युवती वर्षा डोंगरे ने जिस लड़ाई को शुरू किया था, वह आज दस बरस बाद जाकर एक मुकाम तक पहुंची है, और इससे एक तरफ तो लोगों को देर से मिले हुए इंसाफ में भी कुछ भरोसा पैदा होगा, और शायद सरकार या पीएससी को भी इससे कुछ सीखने मिलेगा। लोगों को याद होगा कि छत्तीसगढ़ में कुछ महीने पहले एक और महिला अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट तक दस बरस की कानूनी लड़ाई लडऩे के बाद पुलिस में डीएसपी की नौकरी मिली, और सुप्रीम कोर्ट ने दस बरस पहले की वरिष्ठता के साथ वह नियुक्ति की। मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने वह नियुक्ति आदेश खुद इस महिला अधिकारी को सौंपा था।
दरअसल कॉलेजों में दाखिले या नौकरियों के मामले में जब कभी कोई बेइंसाफी होती है, तो उससे बहुत बड़े जरूरतमंद तबके के लोगों के हक छिनते हैं, और मध्यप्रदेश के व्यापमं घोटाले में तो यह सामने आया था कि बहुत बड़े पैमाने पर आपराधिक साजिश के तहत करोड़ों रूपए के लेन-देन, और राजनीतिक प्रभाव-दबाव की वजह से वैसे चयन किए गए थे, और उसमें मंत्री से लेकर अफसरों तक कई लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं, उस व्यापमं घोटाले से जुड़े हुए दर्जनों लोग रहस्यमय तरीके से मारे जा चुके हैं, और मध्यप्रदेश के राज्यपाल अपने बेटे सहित इस मामले में संदेह के घेरे में हैं, और वे अब तक गिरफ्तारी से इसलिए बचे हुए हैं कि पुलिस को राजभवन की दीवार फांदने का हक नहीं है। भारत के संविधान की आड़ लेकर जो राज्यपाल जेल जाने से बचा हुआ है, उसे तो शर्म से ही डूब मरना चाहिए था।
छत्तीसगढ़ के इस पीएससी घोटाले की साजिश में ऐसे बड़े लोगों का सीधा षडय़ंत्र तो अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन यह बात तो तय है कि बिना रिश्वत के, या बिना राजनीतिक दबाव के भला पीएससी के लोग चयन सूची में साजिश के तहत फेरबदल क्यों करते। इसलिए यह फैसला इस तरह की रिश्वत और ऐसे राजनीतिक असर दोनों के मुंह पर एक तमाचा भी है। हाईकोर्ट ने तो अभी अपने फैसले में दुबारा चयन सूची बनाने को कहा है, और हो सकता है कि उससे दस बरस देर से ही कुछ दर्जन लोगों को इंसाफ मिल जाए, लेकिन पीएससी में जिन लोगों ने ऐसी धांधली की थी, और ऐसी साजिश की थी उन लोगों को अगर सजा नहीं मिली, तो समाज के ऐसे ताकतवर दफ्तरों में काम करने वाले लोगों को कोई सबक नहीं मिल पाएगा। इसलिए हमारा यह कहना है कि इस साजिश में जो लोग शामिल थे, उनको सजा दिलवाने के लिए भी सरकार को अलग से जांच करनी चाहिए, अगर वह हाईकोर्ट के आदेश में स्पष्ट नहीं हुई हो।

धर्म के कुछ अच्छे इस्तेमाल की कोशिश की जानी चाहिए

संपादकीय
25 अगस्त  2016
धर्म को लेकर कोई अच्छी बात मुश्किल से ही कही दिखती है। ऐसे में एक तस्वीर अभी सामने आई जिसमें एक कृष्ण मंदिर में जन्माष्टमी के चढ़ावे के दूध को बाहर बैठे भीख मांगते परिवारों के बच्चों को दिया गया और जिसे वे खुशी-खुशी पीकर अपनी माताओं के चेहरों पर भी खुशी बिखेर रहे हैं। कल ही खबर थी कि किस मंदिर में ढाई सौ किलो, और किस मंदिर पांच सौ किलो दूध से अभिषेक किया जाएगा, और तब से हमें यह लग रहा था कि कुपोषण के शिकार इस देश-प्रदेश में पत्थर के ईश्वर पर खाने-पीने की ऐसी चीजें बर्बाद की जाती हैं, जिनसे कि एक दिन के लिए सही, बहुत से बच्चों का पेट भर सकता है, और उनके चेहरे की खुशी देखकर ईश्वर के भक्तों को यह प्रेरणा मिल सकती है कि वे रोज कुछ और बच्चों को खुश कर सकते हैं। एक प्रमुख शायर निदा फाजली ने लिखा था- घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लो, किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।
हम भी जानते हैं कि हमारी सोच चाहे जो हो, हम हिन्दुस्तान में न तो धर्म की ताकत को कम कर सकते, और न ही ईश्वर के मानने वाले लोगों पर कोई अधिक असर ही डाल सकते। अभी आए दिनों यह खबर आती है कि देश के किस प्रमुख मंदिर से कितने सौ किलो सोना गायब हो गया। इससे परे भी हम अपने आसपास के मठ-मंदिर देखते हैं कि किस तरह उसकी जमीनों पर लोग काबिज हो जाते हैं, उसे बेचने का धंधा करते हैं, धर्म और धार्मिक ट्रस्ट माफिया के अंदाज में चलाए जाते हैं, और ऊपर बैठा ईश्वर कुछ भी नहीं कर पाता। उसके नाम पर घी-तेल जलाया जाता है, मोटे बदन वाले लोग प्रसाद चढ़ाकर दूसरे मोटे बदन वाले लोगों को खिलाते हैं, शिवलिंग से लेकर दूसरी प्रतिमाओं तक को दूध से नहलाकर उस दूध को बहा देते हैं, हर बरस करोड़ों प्रतिमाओं को नदियों और तालाबों में विसर्जित किया जाता है, और उनके पानी को तबाह किया जाता है, धार्मिक त्यौहारों के मौके पर भयानक शोरगुल के खिलाफ अदालतें फैसले दे-देकर थक गई हैं, और धर्म तरह-तरह से हिंसा को, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हुए पनप रहा है।
ऐसे में धर्म को छोडऩे और ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देने की कोशिशें हिन्दुस्तान में तो कामयाब नहीं हो सकतीं। एक समझदार के नास्तिक बनने जितनी देर में लाख लोग आस्तिक बन जाते हैं, और उनमें से हजारों लोग धर्मान्ध हो जाते हैं। इसलिए आज जरूरत है धर्म की ताकत, उसकी क्षमता, और उसकी संपन्नता को समाज के कल्याण से जोडऩे की। धर्म में चंदा जुटाने की अपार क्षमता है, लोग जो किसी और बात के लिए जेब से धेला नहीं निकालते, वे भी किसी बाबा, महाराज, साधु और साध्वी के कहे हुए धर्म के लिए करोड़ों रूपए देने को तैयार हो जाते हैं। इसलिए धर्म के भीतर से ऐसे धार्मिक और आस्थावान, जनकल्याण की सोच रखने वाले लोगों को देखने और बढ़ावा देने की जरूरत है जो कि पहाड़ी नदी की तरह के धार्मिक-संपन्नता के इस सैलाब को पनबिजली की तरह इस्तेमाल कर सकें, और दुनिया के गरीबों का भला कर सकें। हम जानते हैं कि धर्म को न तो ऐसी किसी सोच के लिए बनाया गया था कि उससे गरीबों का भला हो, और न ही धर्म का आज का मिजाज ही किसी भले का है, लेकिन फिर भी जो औजार दुनिया में बनते हैं, वे चाहे बुरे इस्तेमाल के लिए ही बनाए गए हों, किसी दिन उनका कोई बेहतर और अच्छा इस्तेमाल भी तो सोचा जा सकता है, किया जा सकता है।
धर्म दुनिया के बहुत से बुरे लोगों को आत्मग्लानि, और छाती पर से पाप के बोझ से मुक्ति दिलाने का काम करता है। पश्चिमी दुनिया में बड़े-बड़े माफिया डॉन भी धर्म की शरण में जाते हैं, कई मुस्लिम देशों में आज इतिहास की सबसे भयानक हिंसा धर्म का नाम लेकर ही की जा रही है, और सतीप्रथा से लेकर देवदासी प्रथा जैसी हिंसा भी हमने धर्म के नाम पर ही देखी है। अब ऐसे हिंसक औजार का समाज के भले के लिए इस्तेमाल आसान तो नहीं होगा, लेकिन इस बारे में सोचना जरूर चाहिए।

अंग्रेजों का मैला ढोते हुए गर्व करते राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानी...

संपादकीय
24 अगस्त  2016
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता को कड़ी फटकार लगाई है कि वे आपराधिक-मानहानि के मुकदमे दायर करके लोकतांत्रिक-असहमति को नहीं कुचल सकतीं। अदालत ने जयललिता से कहा- आप मानहानि के मुकदमों के जरिए लोकतंत्र का गला नहीं दबा सकती हैं, यह सही नहीं है, सरकार को अपनी आलोचना करने वालों पर मानहानि के मुकदमे दायर करने के बजाय अच्छे कामकाज पर ध्यान देना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी मुकदमेबाजी के लिए राज्य सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
भारत में लोगों की धार्मिक भावनाओं, लोगों की राष्ट्रवाद की भावना, और लोगों की अपने सम्मान की धारणा को लेकर बड़े-बड़े मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। और तो और सैकड़ों और हजारों बरस पुरानी बातों को लेकर भी जब कोई इतिहास लिखते हैं, तो उनकी किताबें जलाने, और प्रतिबंधित करने के अलावा उनके खिलाफ भावनाएं आहत करने का मुकदमा भी भारत में आम हैं। फिर अभी पिछले कुछ बरसों से, और केन्द्र में मोदी सरकार के आने के पहले से भी, एक उग्र राष्ट्रवादी सोच ने तरह-तरह की अभिव्यक्ति को राष्ट्रविरोधी करार देते हुए कई तरह के मामले-मुकदमे शुरू कर दिए थे। कहीं कोई कार्टूनिस्ट गिरफ्तार किया गया, तो कहीं कोई नाटककार। नतीजा यह हुआ कि देश के पुलिस थानों में और जिलों की छोटी-छोटी अदालतों में राष्ट्रवाद को लेकर केस दर्ज होने लगे। अभी दो दिन पहले दक्षिण भारत की एक अभिनेत्री ने पाकिस्तान के बारे में कहा कि वहां के लोग भी भले हैं, और पाकिस्तान से संबंध अच्छे होने चाहिए, तो इस पर उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दायर करने लोग अदालत पहुंचे हैं। तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर, नरेन्द्र मोदी तक के खिलाफ भी यही मामला दर्ज होना चाहिए, क्योंकि इन दोनों ने पाकिस्तान के लोगों को समय-समय पर भला भी कहा है, और पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए कई तरह के नुकसान भी झेले हैं।
मोदी अगर गौरक्षक-माफिया के बारे में कुछ कहते हैं, तो हमलावर-हिन्दू लोगों के मुंह बंद रहते हैं, लेकिन अगर यही बात भाजपा और हिन्दू संगठनों से परे के कोई लोग कहें, तो उनको पाकिस्तान जाने की सलाह दे दी जाती है। और ऐसी बातें तकरीबन रोज ही कहीं न कहीं हो रही हैं, और मंच और माईक से देश-प्रदेश के मंत्री, सांसद-विधायक, शंकराचार्य और दूसरे धार्मिक नेता लोगों को देशद्रोही करार देते हैं, और देशनिकाला घोषित करते हैं। यह पूरा सिलसिला हिन्दुस्तान में लोकतंत्र के कमजोर होने का सुबूत है। लोकतंत्र महज चुनावों का नाम नहीं होता है कि हर पांच बरस में बिना मतदान की धांधली के चुनाव हो जाएं, तो वही कामयाब लोकतंत्र कहा जा सकता है। कामयाब लोकतंत्र तो इस बात में रहता है कि अलग-अलग विचारधारा और सोच के लोग, अलग-अलग आस्थाओं के लोग एक-दूसरे को कितना बर्दाश्त कर सकते हैं, और असहमति से लेकर विविधता तक का कितना सम्मान कर सकते हैं। अभी राष्ट्रद्रोह, और राजद्रोह जैसा फतवे बात-बात में जारी किए जाते हैं। कोई अगर कश्मीर के बारे में यह ऐतिहासिक तथ्य याद दिलाए कि वहां की जनता को अपना देश या अपना राज तय करने का हक है, तो उसे पल भर में राष्ट्रद्रोही करार दे दिया जाता है, और उसे घर घुसकर मारा भी जाता है, सार्वजनिक जगहों पर उन पर कालिख भी फेंकी जाती है। राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा का यह सैलाब इसलिए खतरनाक है कि एक तबके के देखादेखी दूसरे तबके में भी राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, जातिवाद, क्षेत्रवाद भड़कता है, और आंख के बदले आंख फोडऩे की यह सोच आग आगे बढ़ाती चलती है।
इस देश में राष्ट्रद्रोह और राजद्रोह के कानून अंग्रेजों के समय के बने हुए हैं, और अंग्रेज सरकार को अपने आपको हिन्दुस्तानी जनता से बचाने की जरूरतें बहुत अलग हुआ करती थीं। आज देश को आजाद हुए पौन सदी होने को है, और यह देश अंग्रेजों के अलोकतांत्रिक कानूनों को उसी तरह ढो रहा है जिस तरह इस देश का दलित सफाईकर्मी सिर पर मजबूरी में मैला ढो रहा है। वह तो मजबूरी में मैला ढो रहा है, लेकिन यह देश तो अपने पर घमंड करने वाले लोगों के सिर पर, उनकी पसंद से ऐसे गुलामी के कानून लादे हुए फख्र से घूम रहा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। बात शुरू हुई थी भ्रष्टाचार के मामलों में अदालती कटघरों में खड़ी हुई तमिलनाडू की तानाशाह सी मुख्यमंत्री जयललिता के दायर किए हुए मानहानि-मुकदमों से, और बढ़ते हुए यह आ गई राजद्रोह के मुकदमों तक। यह सिलसिला बताता है कि भारत का लोकतंत्र किस तरह कमजोर है, और बेजा इस्तेमाल के लिए खुला हुआ है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

भारत के नेता-मीडिया से लेकर डोनाल्ड ट्रम्प तक

संपादकीय
23 अगस्त  2016
सार्वजनिक जीवन के लोग किस-किस तरह की बकवास करते हैं इसकी मिसाल के बिना एक दिन भी नहीं गुजरता। पी वी सिंधु अपने प्रशिक्षक गोपीचंद के साथ रियो ओलंपिक से हिंदुस्तान के लिए एक इतिहास रचकर लौटी और उसके आते ही उसके प्रदेश तेलंगाना के उप मुख्यमंत्री ने परले दर्जे की बेवकूफी और घमंड का बयान दिया कि राज्य सरकार सिंधु के लिए नए प्रशिक्षक का इंतजाम करेगी। सत्ता पर बैठे हुए लोगों की बददिमागी और बेदिमागी की यह एक मिसाल है। न तो सिंधु ने नए प्रशिक्षक की जरूरत बताई है, और न ही खेल को समझने वाले किसी भी और इंसान ने ऐसा कहा है। लेकिन सरकार में बैठे उप मुख्यमंत्री अगर खेल के इतिहास में अपना कुछ जोड़ न सकें, तो उन्हें तसल्ली कैसे होगी? और यह बात ऐसे मौके पर एक बहुत बड़ा अपमान भी उस प्रशिक्षक का है जिसने आग में तपाकर सिंधु नाम के सोने को ऐसा खरा किया कि दोनों ने देश का नाम रौशन किया।
लेकिन गंदगी की बातें करने में नेताओं का कोई एकाधिकार तो है नहीं, इसलिए देश के एक बड़े अखबार ने अभी गोपीचंद की पत्नी के एक इंटरव्यू में एक ऐसी सुर्खी लगाई कि उससे मीडिया का तमाम इज्जतदार तबका पानी-पानी हो गया। गोपीचंद की पत्नी भी अपने वक्त की एक राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी रही हुई है, और उसने यह कहा कि जब वह खेलती थी तब उन्हें गोपीचंद जैसा प्रशिक्षक नसीब नहीं था। इस बात को इस बड़े अंगे्रजी अखबार ने यह शीर्षक बनाकर छापा- सिंधु के पास वह है, जो मेरे पास नहीं था, मेरा पति।
यह बात इस बेहूदे और सनसनीखेज अंदाज में छापी गई है कि मानो गोपीचंद की पत्नी सिंधु से कोई सौतिया डाह रखती है। जबकि इंटरव्यू में महज खेल की बातें हैं, और यह तो एक तथ्य है ही कि जब गोपीचंद की पत्नी लक्ष्मी खेलती थीं, तो उन्हें गोपीचंद जैसा प्रशिक्षक नहीं मिला हुआ था। इसलिए गंदगी फैलाकर, सनसनी फैलाकर जब दर्शक या पाठक जुटाने की बात आती है, तो देश के मीडिया का लीडर होने का दावा करने वाला टाईम्स ऑफ इंडिया भी अपनी वेबसाईट पर किसी भी प्रमुख महिला की तस्वीर के साथ यह चीखती हुई बात लगाता है कि उसका सीना दिख रहा है। इसलिए मीडिया हो या राजनीति, गंदगी और सनसनी फैलाकर लोगों को ध्यान खींचने से किसी को परहेज नहीं है, और इसका खासा तगड़ा मुकाबला दोनों में चलते रहता है।
अभी उत्तर-भारत में एक सड़क पर गाड़ी रोककर लोगों को उतारकर परिवार की लड़की-महिला के साथ हुए बलात्कार के बाद जिस अंदाज में उत्तर-भारत और दिल्ली के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उस परिवार के लोगों की शिनाख्त जाहिर करते हुए, उनका घर-चेहरा दिखाते हुए बार-बार बलात्कार का जिक्र करते हुए, उस बारे में और बताओ-और बताओ के अंदाज में पूछते हुए जैसी पत्रकारिता दिखाई है, उसकी मीडिया के गंभीर और ईमानदार तबके में खासी आलोचना हो रही है।
लेकिन हिंदुस्तान से लेकर अमरीका के डोनाल्ड ट्रम्प तक जिस तरह की गंदगी लोगों के दिल और दिमाग से निकलकर मीडिया के रास्ते तमाम लोगों तक पहुंचती है उससे जाहिर होता है कि इंसानों का असली मिजाज, अधिकतर या कुछ कम गिनती में इंसानों का असली मिजाज ऐसी गंदगी का ही रहता है, और उनमें से कुछ लोग इससे उबरकर बेहतर इंसान बन पाते हैं, बाकी गंदगी फैलाते हैं, और गंदगी का ही मजा लेते हैं।

सात बरस की बच्ची पर बलात्कार, और खुदकुशी

संपादकीय
22 अगस्त  2016
राजस्थान के जोधपुर से दिल दहलाने वाली खबर है कि जब देश आजादी की सालगिरह मना रहा था, तो एक छोटी बच्ची स्कूल में खुशी-खुशी कार्यक्रम में भाग लेकर घर लौटी, और जब उसके मजदूर मां-बाप काम से घर लौटे तो वह फांसी पर टंगी मिली। सात बरस की बच्ची के पोस्टमार्टम से अब जाहिर हुआ है कि उसके साथ बलात्कार हुआ था, और इस मामले में पड़ोस का ही एक 14 बरस का लड़का पकड़ाया है।
यह देश रहने के लिए एक भयानक जगह हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे न सिर्फ बलात्कार का शिकार हो रहे हैं, बल्कि वे फांसी को समझ रहे हैं, और फांसी लगाकर जान देने की भी उन्हें सूझ रही है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि जिनके घरों में बच्चियां या लड़कियां हैं, वे लगातार एक तनाव में जीते हैं कि पता नहीं कब उनकी बच्ची के साथ कुछ हो जाए। कुछ समाजशास्त्रियों का यह भी मानना है कि भारत के कुछ समाजों में बाल विवाह इसलिए भी होते हैं कि लड़की बालिग होने के पहले शादी होकर ससुराल चली जाए, तो किसी हादसे की शिकार न हो। जहां पर मां-बाप दोनों काम करने वाले रहते हैं, ऐसे गरीब परिवारों में घर पर बच्चों की देखभाल एक बड़ी खतरनाक जिम्मेदारी होती है, और ऐसे में बच्चे, न सिर्फ लड़कियां, बल्कि लड़के भी, यौन शोषण के खतरे में जीते हैं। और देश में माहौल ऐसा है कि देश की एक प्रमुख महिला देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता को लेकर यहां रहने से डरती है, तो उसे राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। बलात्कार की रिपोर्ट कोई महिला लिखाती है, तो ममता बैनर्जी जैसी महिला मुख्यमंत्री उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश बताती है।
लेकिन हिन्दुस्तान को अगर अपनी अगली पीढ़ी को मानसिक रूप से स्वस्थ बचाए रखना है, तो उसे यह देखना होगा कि उसके बच्चों की ऐसी दिमागी हालत न हो। आज देश की आबादी का एक हिस्सा सास-बहू जैसे सीरियलों को देख-देखकर सामाजिक और पारिवारिक तनाव की दिमागी हालत पा रहा है, और दूसरी तरफ 14 बरस के लड़के को बलात्कार सूझ रहा है, और सात बरस की बच्ची को खुदकुशी जैसा रास्ता दिख रहा है। हम अधिक दूर क्यों जाएं, छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनोंं में ऐसी आत्महत्या सामने आती है जिसमें छेडख़ानी या बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के बाद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, और निराश-हताश लड़की या महिला ने आत्महत्या कर ली। यह एक भयानक हालत है जिसमें शहरों के खासे बड़े पुलिस-ढांचे के रहते हुए, मीडिया और अदालत की मौजूदगी के बीच भी लोगों को ऐसा बेबस होना पड़ रहा है।
अब जब कभी इस तरह की कोई चर्चा हो, तो यह बात भी होने लगती है कि महिलाओं पर होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिए जब तक तेज रफ्तार फास्ट ट्रैक  अदालतें नहीं बनाई जाएंगी, तब तक महिलाओं पर जुर्म रूक नहीं सकते। लेकिन प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद देश के मुख्य न्यायाधीश का यह निराश बयान देखने लायक है कि देश में किस तरह जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और प्रधानमंत्री को उस पर मुंह खोलना भी जरूरी नहीं लगता। महिलाओं पर जुल्म को रोकना आसान बात नहीं है क्योंकि भारत में हजारों बरस महिलाओं को कुचलने की सभ्यता चली आ रही है। ऐसे में समाज में जो कुछ कोशिशें हो सकें, उससे परे भी कानून की तेज रफ्तार कार्रवाई जरूरी है, ताकि मुजरिमों को सबक मिल सके। आज तो नेताओं और अफसरों के बयान बलात्कार की शिकार महिला या लड़की के खिलाफ दूसरे बलात्कार जैसे हिंसक रहते हैं, और निराशा के ऐसे ही माहौल में आत्महत्याएं होती हैं।

बूढ़ी गाय से खून दुह लेना

22 अगस्त 2016 

अभी दो दिन पहले एक परिचित परिवार में जाना हुआ जहां एक गमी हो गई थी। मृत्यु कर्म करवाने के लिए एक पंडित सामानों की लंबी लिस्ट नोट करवा रहे थे, और इसमें जब दूध की बारी आई, तो खासी देर तक यह सलाह-मशविरा चलते रहा कि पैकेट वाले दूध का क्या भरोसा कि वह गाय का होगा, या भैंस का? वे गाय के दूध पर जोर देते रहे और उन्हें यह मलाल भी था कि उनके अपने घर में गाय है और अगर उन्हें याद रहता तो वे घर से ही दूध ले आते। इसके बाद की बात शायद एक मासूम अनजानेपन में उनके मुंह से निकल गई- अगली बार मैं घर से ही गाय का दूध ले आऊंगा।
अब गमी के मौके पर अगली बार को लेकर किसी किस्म का भरोसा-दिलासा बड़ा गड़बड़ भी लग रहा था, लेकिन गाय के दूध की फिक्र में किसी का ध्यान उनकी बात की तरफ गया नहीं।
पिछले एक-दो बरस से हिन्दुस्तान में गाय सबसे ही खतरनाक जानवर हो गई है। गाय को जानवर कहने पर भी बहुत से लोगों को दिक्कत हो सकती है, और कुछ लोगों ने तो पिछले दो बरस में यह मांग भी की कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए। आज शेर भारत का राष्ट्रीय पशु है, और सिंह भारत के राजचिन्ह पर विराजमान है, गाय की जगह दूध की डेयरियों में है, और धर्म-राजनीति में है, और गिनती में अगर देखें तो गाय की सबसे अधिक जगह उन घूरों पर है जहां पर लोग अपने घरों से लाकर बच्चों के पखाने से लेकर मांसाहार के बचे हुए हिस्से तक फेंकते हैं, और इन्हीं सबके बीच से फल और सब्जी के कुछ छिलके, कुछ सड़े हुए खाने को तलाश करती हुई गाय पॉलीथीन में लिपटे हुए इन सामानों के साथ-साथ पेट में प्लास्टिक का गोदाम भी बनाते चलती है। अपने शहर की सड़कों पर और सड़कों के किनारे जो अकेली तंदरूस्त गाय मुझे आज तक दिखी है, वह सरकारी जमीन पर सरकार द्वारा एक निजी कंपनी के पैसों से बनाए हुए कामधेनु-स्थल के चबूतरे पर चढ़ी हुई है, और यह तय है कि उस सड़क से निकलने वाली बाकी गायें चबूतरे पर स्थापित इस कामधेनु को जलती-भुनती ही देखती हुई जाती होंगी, एक घूरे से निकलकर दूसरे घूरे की ओर।
गाय के नाम पर हिन्दुस्तान में आज जितने तरह की नफरत फैलाई जा रही है, हिंसा की जा रही है, अगर गाय में सचमुच कोई समझ होती, तो वह घूरों पर खाने को कुछ ढूंढने के बजाय कीटनाशक कारखानों के आसपास जाकर वहां से निकला पानी पीकर मर चुकी होती। लेकिन गाय में समझ सीमित होती है, और उसे ठीक से यह एहसास नहीं होगा कि उसका इस्तेमाल नफरत शब्द के चार अक्षरों की तरह किया जा रहा है, और उसके नाम में जिस नफरत का एक भी अक्षर नहीं है, उसी नफरत को गाय के ढाई अक्षरों से गढ़ दिया जा रहा है।
यह तय है कि गाय में समझ नहीं होती है, या कि इंसानों के दर्जे की मक्कारी और कमीनेपन की समझ नहीं होती है, इसीलिए जब उसके बछड़े-बछिया को थोड़ा सा दूध पीने देने के बाद उन्हें मां के थन से हटा दिया जाता है, और फिर इंसान उसका दूध बाजार के लिए दुहने लगता है, तो गाय ठीक से समझ नहीं पाती। दुनिया में भला इंसान से परे कौन सा ऐसा इतना कमीना प्राणी होगा जो कि किसी दूसरे प्राणी के बच्चों के हिस्से का दूध छीनकर उसे खुद पीकर, उसे अपने भगवान को पिलाकर, उसे अपने मृतजनों की चिता पर चढ़ाकर, उससे देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को धोकर अपने स्वर्ग की गारंटी करता हो? किसी दूसरे प्राणी के बच्चों को भूखा रखकर उनकी मां का दूध छीन-झपट लेने वाला, निचोड़ लेने वाला कमीनापन महज इंसान में ही हो सकता है। और उसके बाद इस परले दर्जे की बेशर्मी भी इंसान में ही हो सकती है कि उस गाय को मरने के लिए घूरे पर छोड़कर, और उसे बचाने के नाम पर दूसरे इंसानों को कत्ल करने को जो आत्मगौरव और राष्ट्रगौरव मानता हो, ऐसा कमीना महज इंसान ही हो सकता है।
इस पूरे सिलसिले में मुझे एक बड़े पुराने परिचित की याद आ रही है, छत्तीसगढ़ के महासमुंद के पास एक गांव के ग्रामसेवक रहे लखन लाल मिश्र की। कई बरस हो गए हैं, और एक खतरा यह भी लग रहा है कि उनके नाम को याद करने में मुझसे कोई चूक भी हो रही हो, लेकिन इतना तो ठीक-ठीक याद है कि उनके नाम में किसी हिन्दू भगवान का नाम था, और उनका जातिनाम मिश्र था। उनकी कहानी बहुत लंबी है, और ग्रामसेवक के ओहदे से निलंबित होने के बाद जब बहाली का आदेश उन्हें अंग्रेजी में मिला, तो उसे लेने से मना करते हुए उन्होंने शायद 20-30 बरस तक वापिस नौकरी नहीं ली थी। लेकिन वह राष्ट्रभाषा के प्रेम का एक अलग मामला था, आज की इस चर्चा में उनकी एक दूसरी जिद की बात करना है।
ईमानदारी के लिए जिद पर पागल की तरह टिके रहने वाला यह ग्रामसेवक जब रिटायर हुआ, तो वह अपनी निजी आस्था के मुताबिक किसी जगह पर गायों की सेवा करने के लिए किसी डेयरी में नौकरी ढूंढ रहा था। मैं तो इसमें उनकी कोई मदद कर नहीं पाया, उन्होंने खुद ही राजधानी रायपुर (तब न छत्तीसगढ़ राज्य था, और न ही रायपुर राजधानी बना था) में एक बड़े कारोबारी परिवार में नौकरी पा ली, जहां परिवार अपनी आस्था के मुताबिक घर पर ही बहुत सी गायें रखता था, और घर का ही दूध पीता था।
लेकिन अधिक वक्त नहीं हुआ, उन्होंने वह काम छोड़ दिया, और फिर काम तलाशते हुए मेरे पास पहुंचे। उनका यह कहना था कि इस परिवार में विदेशी नस्ल की गायें हैं, जो कि उनकी मां नहीं हैं, इसलिए वे उनकी सेवा करना नहीं चाहते। और इस जिद के चलते-चलते भी उन्होंने ऐसे ही एक दूसरे परिवार में काम तलाश लिया जहां पर सिर्फ हिन्दुस्तानी नस्ल की गायें थीं।
लेकिन कुछ समय ही गुजरा था, और वे फिर काम छोड़कर आ गए। इस बार काम छोडऩे की वजह मैंने पूछी तो पता लगा कि इस सेठ के घर पर गायों की देखभाल तो होती थी, लेकिन जब दूध की बारी आती थी, तो मिश्रजी चाहते थे कि जब बच्चों का पेट पूरी तरह भर जाए, और वे खुद होकर मां से अलग हो जाएं, तभी उनका दूध दुहा जाए। वे गाय के दूध पर इंसानों का हक तभी मानते थे, जब गाय के अपने बच्चों का पेट पूरा भर चुका हो।
उनकी कई किस्म की जिद उनसे परिचय के लंबे बरसों में सामने आती रहीं, राष्ट्रभाषा के लिए जिद, गौप्रेम के लिए जिद, और उनकी जिद हिंसक भी नहीं थी। अपनी जिद पर टिके रहने के लिए वे दशकों तक निलंबित भी रहना बर्दाश्त कर चुके थे, और आखिर में हिन्दी में बहाली-आदेश मिलने पर उन्होंने सरकारी नौकरी पर काम शुरू किया था, इसी तरह गौमाता की उनकी अपनी परिभाषा थी, और उस पर अमल करने के लिए वे दूसरों पर हमला करने के बजाय खुद तकलीफ पाकर और नुकसान झेलकर रह जाते थे। गाय के दूध पर उसके बच्चों के पहले हक की उनकी अपनी जिद थी, और यह पूरी न होने पर उन्होंने पल भर में नौकरी छोड़ दी थी।
मैंने बरसों पहले अपने कॉलम में गाय को काटने के खिलाफ लिखा था। लेकिन इसके पीछे न तो मेरी भावना किसी धर्म से जुड़ी हुई है, और न ही किसी राष्ट्रप्रेम से। मेरी यह समझ दो बातों पर टिकी हुई है, एक तो यह कि मैं इंसान के इस्तेमाल के लिए किसी भी दूसरे प्राणी को मारने-काटने के खिलाफ हूं, इसलिए भी, गाय को भी, नहीं मारा जाना चाहिए। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान में बचपन से गाय का दूध पीकर बड़ा होने की वजह से मेरा यह मानना है कि मेरे सरीखे लोगों को गाय का अहसानमंद होना चाहिए, क्योंकि मां के दूध के बाद गाय का दूध ही मेरे जैसे लोगों के काम आया, और इस नाते गाय से मां का रिश्ता तो बनता है। यह कुछ उसी तरह का है जिस तरह की इस्लाम के भीतर खून के रिश्ते से भी ऊपर दूध के रिश्ते को माना जाता है, और मुस्लिमों में आसपास के खून के रिश्ते के भाई-बहनों में तो शादी हो सकती है, लेकिन एक ही महिला का दूध पीने वाले दो ऐसे बच्चों में भी शादी नहीं हो सकती, जो कि एक-दूसरे के रिश्तेदार भी न हों, संबंधी भी न हों।
एक तीसरी बात भी मुझे किसी प्राणी को मारने के खिलाफ यह लगती है कि धरती पर कुदरत ने जितने प्राणी बनाए हैं, उन सबको जिंदा रहने का बराबरी का हक है, और दूसरों को मारकर खुद जिंदा रहना उन्हीं के लिए ठीक है जिन्हें कि कुदरत से एक मांसाहारी बदन ही मिला है, और उस मांसाहार के बिना वे जी नहीं सकते। इंसानों के सामने यह पसंद मुमकिन है कि वे चाहें तो आज बिना मांसाहार के रह सकते हैं, और बहुत से लोगों का यह भी मानना है कि अपने लिए डेयरी और पशुपालन करने में इंसान धरती का जितना पानी इस्तेमाल करते हैं, जितना चारा व दाना इस्तेमाल करते हैं, वह मांसाहार से भरने वाले पेटों के मुकाबले कई गुना अधिक पेटों को खाली भी रखता है। मतलब यह कि अगर खाने के लिए जानवरों को न पाला जाए, तो उतनी खेती से अधिक इंसानों का पेट भर सकता है।
लेकिन इस एक वैज्ञानिक तथ्य और तर्क से परे भी मैं बाकी तमाम पशु-पक्षी, और जानवरों के साथ-साथ गाय को भी बचाने का हिमायती हूं। और मेरा यह भी मानना है कि जो लोग भी गाय का दूध पीते हैं, उन्हें खुद होकर एक ऐसा टैक्स देना चाहिए, जो कि गाय के बुढ़ापे के वक्त उसे जिंदा रखने के लिए काम आए। गाय से दूध मिलना बंद होने के बाद उसे बचाकर रखने को बहुत से लोग पर्यावरण के लिए खतरनाक मानेंगे, और उसे धरती पर बोझ भी साबित कर देंगे। लेकिन मेरा यह मानना है कि धरती पर बोझ तो इँसानों के अपने मां-बाप भी कहे जा सकते हैं, जब वे किसी उत्पादक काम के लायक न रह जाएं। लेकिन बुढ़ापे में मां-बाप फेंक तो नहीं दिया जाता। इसलिए मेरा मानना है कि जो इंसान जिस प्राणी की मदद से बड़े हुए, उस प्राणी के उपकार को याद रखना और उससे कर्जमुक्त होना इंसान के एक बेहतर इंसान बनने के लिए भी जरूरी है। और यह बात महज गाय पर लागू नहीं होती, जो लोग बकरी का दूध पीकर बड़े होते हैं, उन्हें भी उसका दो तरह से भुगतान करना चाहिए, जब तक दूध मिले तब तक अच्छा खाना-पीना तो हर कोई हर जानवर के लिए करते ही हैं, दूध मिलना बंद होने के बाद भी बाकी जिंदगी तक इस दूध का कर्ज चुकता किया जाना चाहिए।
बरसों पहले मैंने यह लिखा था कि अगर लोग हर एक लीटर दूध के पीछे एक रूपए और देने लगें, तो उससे गायों का, या भैंसों और बकरियों का, बुढ़ापा गुजर सकता है। मेरा यह भी मानना है कि जो लोग इस तरह की, कर्ज चुकाने की सोच रखेंगे, वे अपनी जिंदगी में दूसरे इंसानों के अहसानों का भी कर्ज चुकाने का सोच पाएंगे, और बेहतर इंसान बनेंगे।
लेकिन सारे प्राणियों को बचाने की मेरी आस्था मेरी निजी है। जो लोग इससे सहमत नहीं हैं, वे अपनी मर्जी से जानवरों को मार सकते हैं और खा सकते हैं, उससे मेरे मन में उनके लिए हिंसा पैदा नहीं होती। आज हिन्दुस्तान में गाय को बचाने के नाम पर बचाया तो किसी को नहीं जा रहा है, आज सड़कों पर हर गाय पॉलीथीन का चलता-फिरता गोदाम बन चुकी है, लेकिन उसे बचाने के नाम पर दूसरे लोगों को मारा जरूर जा रहा है, और इस काम को वही लोग अधिक जोर-शोर से कर रहे हैं, जो लोग खुद गाय को बचाने के लिए कुछ भी नहीं करते हैं। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं कि अगर वे खुद गाय को बचाने कुछ कर रहे हैं, तो उन्हें गाय को काटने वाले लोगों को मारने का हक है। देश का कानून जहां इसकी रोक लगा रहा है, वहां पर कानून ऊपर है। लेकिन गाय के नाम पर सारे कानून हाथ में लेकर गैरकानूनी दर्जे की हिंसा करना गाय बूढ़ी हो जाने के बाद भी उससे खून दुह लेने सरीखा है।

सच और जनधारणा के बीच बड़ा फासला हो सकता है...

संपादकीय
21 अगस्त  2016
भारत के सोशल मीडिया पर लगातार यह मजाक चलता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक पैर विदेशों में ही रहता है। फिर भारतीय संसद के भीतर भी यह बात लगातार उठती है कि मोदी अधिकतर विदेश ही रहते हैं। ऐसे में कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने ढाई साल के कार्यकाल में, पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले विदेश यात्राओं में पीछे ही हैं। उन्होंने कांग्रेस के कमलनाथ के दिए हुए एक बयान पर कहा कि उन्हें सच्चाई पता नहीं है, और ढाई बरस में मनमोहन सिंह के मुकाबले नरेन्द्र मोदी कम बार विदेश गए। उन्होंने यह भी कहा कि जब मनमोहन सिंह विदेश जाते थे तो उनके दौरे ठंडे रहते थे, और किसी को यह पता ही नहीं चलता था कि वे कब गए, कब आए।
अगर अमित शाह की दी हुई जानकारी सही है, तो यह एक मिसाल है कि जनधारणा सच से कितने परे भी रह सकती है। आंकड़ों और तथ्यों को परखे बिना पहली नजर में तो ऐसा ही लगता है कि नरेन्द्र मोदी उनके पहले के किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के मुकाबले अधिक बार और अधिक देश गए, और अधिक दिन देश के बाहर रहे। लेकिन अमित शाह ने जो बात सामने रखी है उससे लोगों को यह भी समझ आना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन मेें जनधारणा हमेशा सच पर टिकी नहीं होती, और वह किस हद तक खतरनाक हो सकती है। लोग अपने मन की बात को सच मान बैठते हैं, और मासूमियत से या बदनीयत से फैलाए गए झूठ को भी सच मान बैठते हैं। सोशल मीडिया पर हम रात-दिन यह देखते हैं कि किस तरह लोग पूरी गैरजिम्मेदारी से किसी भी झूठ को आगे बढ़ाते चलते हैं, और उन्हें यह फिक्र भी नहीं रहती कि जो लोग इस झूठ को पकड़ लेंगे, उनके बीच उनकी साख कैसे गिरेगी, कितनी गिरेगी। यह सिलसिला आज बड़ा आम हो गया है कि अपने मकसद को पूरा करने के लिए कोई झूठ इतना फैलाया जाए कि वह सच लगने लगे।
जिन लोगों के लिए बाजार या सार्वजनिक जीवन, राजनीति या समाज सेवा, किसी भी तरह के दायरे में लोगों के बीच अपनी छवि को बनाए रखना मायने रखता है, उन्हें बहुत सावधान होकर काम करना पड़ता है, या करना चाहिए। और इस सावधानी में महज यह शामिल नहीं है कि लोग कितने सावधान रहें, कई तरह के हमले हर मुमकिन सावधानी के बाद भी हो सकते हैं। इसलिए आज कल दुनिया में बड़ा खर्च करने की ताकत रखने वाले लोगों के लिए इमेज-मेकिंग, या इमेज-बिल्डिंग करने वाली एजेंसियां भी काम करती हैं जो कि आपकी सार्वजनिक छवि को लोगों के सामने निखारकर रखती हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसी एजेंसियां भी काम करती हैं जो कि आपके इतिहास के कालिख लगे हिस्सों को इंटरनेट पर से हटाने की कोशिश करती हैं, ताकि जब आपके बारे में कोई जानकारी तलाशे, तो उसे बुरी जानकारियां न दिखें।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाईवोल्टेज बिजली की तरह बड़ी चकाचौंध वाली राजनीति करते हैं, और वैसा ही सार्वजनिक जीवन जीते हैं। ऐसे में देश-विदेश में उनके आने-जाने और कार्यक्रमों की खबरें इतनी बनती हैं, और इतनी फैलती हैं कि उनके विदेश प्रवास हो सकता है कि असली कद के मुकाबले कई गुना अधिक बड़ी परछाईं की तरह अधिक दिखते हों। आज का वक्त नेताओं और कारोबारियों के लिए सार्वजनिक जीवन में बड़ी सक्रियता के बिना पूरा नहीं हो सकता। इसलिए परंपरागत मीडिया के अलावा लोगों को सोशल मीडिया पर भी अपने से जुड़े सच और झूठ का ख्याल करना चाहिए, इसके बिना बनी हुई जनधारणा के नुकसान पहुंचाने के खतरे बहुत रहते हैं, और फायदा पहुंचाने वाली तस्वीर दूसरे लोग कम ही बनाते हैं।

यह ताजा आत्मगौरव एक श्मशान-वैराग्य बनकर न रह जाए

संपादकीय
20 अगस्त  2016
बैडमिंटन में एक नया इतिहास रचकर भारत की पी.वी. सिंधु ने देश का सिर ऊंचा कर दिया है, और उन तमाम लोगों का मर्दाना घमंड चकनाचूर कर दिया है जो कि हिन्दुस्तानी लड़कियों और महिलाओं को घरेलू कामवाली बनाकर रखना चाहते हैं। ऐसा चाहने वालों में देश के कई दिग्गज हैं, जिन्होंने पिछले महीनों में लगातार सार्वजनिक बयान भी दिए हैं कि चूल्हा-चौका न करने वाली महिलाओं को उनके पति तलाक दे दें। दो दिन पहले हमने भारत की पहलवान साक्षी मलिक की जीत, और रियो ओलंपिक में भारत के पहले पदक के मौके पर इसी मुद्दे पर लिखा भी है कि किस तरह उस हरियाणा से एक लड़की निकलकर देश का सिर ऊंचा कर रही है जिस हरियाणा में हजार लड़कियों में से करीब सवा सौ को जन्म के पहले या बाद मारकर  प्रदेश में लड़़के-लड़कियों का अनुपात चौपट कर दिया गया है। हमने उन कुख्यात खाप पंचायतों के खिलाफ भी लिखा है कि किस तरह वे लड़कियों के जींस पहनने से लेकर उनके मोबाइल फोन तक के खिलाफ फतवे जारी करती हैं, और ऐसे लड़की विरोधी माहौल के बीच भी कुछ लड़कियां पूरे देश से आगे बढ़कर दिखा देती हैं।
अब जब भारत के अब तक के मिले हुए दोनों पदक लड़कियों ने हासिल किए हैं, और बैडमिंटन में पी.वी. सिंधु ने विश्व के दसवें नंबर की खिलाड़ी रहते हुए जिस अंदाज में हर किसी को शिकस्त देते हुए विश्व की पहले नंबर की खिलाड़ी को भी एक-एक सेट की बराबरी के बाद तीसरे सेट तक ले जाने का दम-खम दिखाया है, तो आज पूरा देश कुछ चौंककर, कुछ हड़बड़ाकर, और कुछ शर्मिंदगी में देश की लड़कियों की तरफ चाहे पल भर के लिए ही सही, तारीफ की नजरों से देख रहा है। इस देश के लिए यह मौका महिलाओं का सम्मान सीखने का एक मौका भी हो सकता है, और जिस देश में अधिकतर पार्टियों के बड़े-बड़े नेता महिलाओं के खिलाफ हिंसक और अश्लील बातें करते हैं, जहां पर अक्सर बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं, वहां पर महिला-गौरव का यह पल सामाजिक सोच में बदलाव फूंकने वाला हो सकता है। समाज के जिम्मेदार और इंसाफपसंद तबकों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए, और ओलंपिक के बाद से लगातार इस देश में महिला-गौरव को सामाजिक मान्यता दिलाने की कोशिश करनी चाहिए।
भारत के इस बहुत ही जरूरी सामाजिक लैंगिक-असमानता के मुद्दे पर चर्चा करने के बाद अब थोड़ी सी चर्चा खेल पर भी होनी चाहिए कि किस तरह देश का एक शहरी फैशनेबुल तबका रियो ओलंपिक में गए हुए भारतीय खिलाडिय़ों का मखौल उड़ाने में जुट गया था कि सौ से अधिक खिलाडिय़ों को मुकाबलों में उतारकर भारत में बेवकूफी की, और भारत के खिलाड़ी ओलंपिक में जाकर सेल्फी लेकर हारकर आ जाते हैं। हम इस अखबार में किसी तरह के राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं करते हैं, और हम लगातार राष्ट्रवाद के खिलाफ लिखते भी हैं। लेकिन खेलभावना के खिलाफ गैरखिलाड़ी शहरियों की ऐसी सोच को धिक्कारना इस देश की सरहदों से परे का काम भी है। खेल में जीत और हार को लेकर एक शर्मिंदगी उन्हीं लोगों को सूझ सकती है जिन्होंने कभी खेल के मैदान पर कोई मुकाबला नहीं किया है। जो लोग ओलंपिक तक पहुंचने की शर्त पूरी करते हैं, वे अपने देश में सबसे अव्वल दर्जे तक पहुंचने की मेहनत तो कर ही चुके रहते हैं। एक पुरानी कहावत है कि गिरते हैं घुड़सवार ही मैदान-ए-जंग में। जो लोग घोड़े पर चढ़ते नहीं हैं, वे ही लोग किसी को घोड़े से गिरते देखकर हॅंस सकते हैं। इसलिए हम भारत की बड़ी टीम के बिना मैडल लिए लौटने के शर्मिंदगी की बात नहीं मानते हैं, हम इसे और अधिक मेहनत के लिए सामने खड़ी हुई चुनौती मानते हैं।
तीसरी बात लगे हाथों यह कि इस देश में बहुत सा शहरी और संपन्न तबका तो ऐसा है जो कि आबादी को बोझ मानता है और भारत के विकास की राह में रोड़ा मानता है। हम न सिर्फ खेल के मामले में, बल्कि आज की अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मामले में भी भारत की अधिक आबादी को मानव-शक्ति से भरपूर संभावना मानते हैं, न कि बोझ। इसलिए देश के लोगों को न सिर्फ खेलों में, बल्कि कामकाज में, और दुनिया में आने वाले बरसों में बढऩे वाली इंसानी-सेवाओं की जरूरतों को देखते हुए इस देश की संभावनाओं पर मेहनत करने की जरूरत केन्द्र और राज्य की सरकारों को है। पी.वी. सिंधु ऐसे ही पूरे देश का दिल, और ओलंपिक का रजत पदक नहीं जीत पाई, उसके पीछे उसके गुरू गोपीचंद की, और उनकी बैडमिंटन-एकेडमी की बड़ी लंबी मेहनत रही है। कल से टीवी पर यह एक बहस चल रही है कि गोपीचंद की यह एकेडमी इतनी तारीफ की हकदार है, या नहीं? कुछ लोगों का यह मानना है कि इस एकेडमी को देश में सबसे अधिक साधन-सुविधाएं मिल रही हैं, और यह दूसरे प्रशिक्षकों से चुनिंदा खिलाडिय़ों को उठाकर ले आती है, और फिर उन्हीं पर मेहनत करती है। हमारा मानना है कि देश में अलग-अलग खेलों के लिए ऐसे प्रशिक्षण संस्थान बनाने की साधन-सुविधा न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों के पास है, बल्कि बहुत से बड़े कारोबार भी अपने दम पर किसी एक खेल को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग राज्यों में अपनी पसंद से ऐसा बीड़ा उठा सकते हैं। आज पी.वी.सिंधु के साथ-साथ गोपीचंद एकेडमी के योगदान पर भी चर्चा हो रही है, और यह बाकी प्रशिक्षकों, बाकी प्रदेशों, बाकी खेलों, और बाकी कारोबारों के लिए भी एक चुनौती है कि वे ऐसी दूसरी मिसाल खड़ी करके दिखाएं। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी ध्यान दिलाया है कि पी.वी. सिंधु की जीत की चर्चा करते हुए उसके प्रशिक्षक गोपीचंद को इतना अधिक श्रेय दिया जा रहा है कि ऐसा लग रहा है कि इस विजेता की मेहनत कम थी, उसके गुरू की मेहनत अधिक थी। लेकिन हमारा मानना है कि गुरू और शिष्या के बीच श्रेय के बंटवारे को लेकर कोई मतभेद शायद नहीं है, और ऐसी कोई भी जीत एक मिलीजुली कामयाबी ही होती है।
दो ओलंपिक के बीच में चार बरस का फासला होता है। और भारत में जितने प्रदेश हैं, ओलंपिक में करीब-करीब उतने ही खेल भी हैं, और इससे दो-चार गुना तो ऐसे कारोबार हैं ही जो कि एक-एक खेल का जिम्मा उठा सकते हैं। एक-एक प्रदेश एक-एक खेल का केन्द्र बनाया जाए, और कुछ कारोबार उन पर खर्च करें, तो न सिर्फ ओलंपिक या दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए बेहतर तैयारी हो सकती है, बल्कि देश के भीतर भी खेलों को बढ़ावा मिल सकता है। आज भारत के इस ताजा आत्मगौरव का मौका हो सकता है कि हमारी ऊपर लिखी तमाम बातों के लिए एक श्मशान-वैराग्य साबित हो, और अगले महीने से अगले चार बरस के लिए इसे बड़ी सहूलियत से भुला दिया जाए, लेकिन फिर भी हर बड़ी बात ऐसी आशंकाओं के बीच ही कभी न कभी शुरू हुई रहती हैं, और उसी उम्मीद के साथ हम आज की हिंदुस्तानी खुशी को स्थायी बनाने के लिए ये मुद्दे उठा रहे हैं। 

दुनिया में इन बच्चों का कोई भी रखवाला नहीं

संपादकीय
19 अगस्त  2016
सीरिया में चल रही फौजी लड़ाई के बीच पिसे हुए एक छोटे बच्चे की बमबारी की धूल और खून से सनी हुई तस्वीर दुनिया भर में तैर रही है, और यह याद दिला रही है कि किस तरह कुछ महीने पहले सीरिया छोड़कर जा रहे लोगों का एक बच्चा समंदर के किनारे रेत पर मरा मिला था। उस तस्वीर ने भी दुनिया को हिलाया था, और इस तस्वीर ने भी। सीरिया और यमन जैसे इस्लामी-आतंक, हथियारबंद-बगावत, और तरह-तरह के गृहयुद्ध से गुजरते हुए देशों में एक बात जो एक सरीखी सामने आ रही है, वह यह कि हर जगह बच्चों पर लड़ाई का जुल्म देखने मिल रहा है। वे बमबारी और धमाकों में मारे भी जा रहे हैं, उनके शरीर के अंग निकालकर मेडिकल-बाजार में बेचे भी जा रहे हैं, उनको गुलाम बनाकर सेक्स-बाजार में नीलाम भी किया जा रहा है, और उनके हाथों में बंदूकें थमाकर उन्हें मोर्चे पर भी उतारा जा रहा है।
इसी के साथ-साथ भारत के नक्सली इलाकों से निकली हुई एक नई या पुरानी तस्वीर सामने आई है जिसमें नक्सलवर्दी में एक बड़ा छोटा सा बच्चा दिखाई पड़ रहा है। इससे पहले भी कुछ ऐसे वीडियो नक्सलियों के बनाए हुए ही सामने आए थे, जिनमें किसी हमले के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों की लाशों के पास से हथियारों को उठाने के लिए वे बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज पूरी दुनिया में जगह-जगह बाल सैनिकों का चलन हो गया है, और जहां पर न अपने देश का कानून चलता है, और न ही संयुक्त राष्ट्र का कोई काबू रह गया है, वहां पर अफ्रीकी देशों से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड तक बच्चों के हाथों में हथियार थमाए जा रहे हैं। और तो और, मानवाधिकार का सबसे बड़ा रखवाला बनने वाला अमरीका अपनी एक ऐसी समाचार एजेंसी को बर्दाश्त करता है, काम की इजाजत देता है, जो कि सीरिया में एक किशोर फोटोग्राफर को लड़ाई की तस्वीरें लेने में लगाकर रखता है, और खुलकर उन तस्वीरों को उसके नाम के साथ दुनिया भर में बेचता है, और वह लड़का ऐसी खतरनाक-फोटोग्राफी करते हुए मारा भी जाता है। लेकिन इस पर इस विकसित पश्चिमी दुनिया में हाय-तौबा नहीं होती।
दरअसल सरकारों से परे के अंतरराष्ट्रीय संगठन अपनी ताकत खो बैठे हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालत तक किसी का कोई काबू किसी देश पर नहीं है, और हाल के दशकों में इसकी सबसे बुरी और सबसे बड़ी मिसाल अमरीका-ब्रिटेन की अगुवाई वाले गिरोह का इराक पर हमला था, जिसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में बार-बार मना किया था, और बुश-ब्लेयर जैसे युद्ध-अपराधियों ने किसी की नहीं सुनी थी। जो हिन्दुस्तान में सदियों से कही जा रही बात है, समरथ को नहिं दोस गुसाईं, जिसके हाथ में ताकत है, उसकी मर्जी और उसकी कही हुई बात दुनिया का कानून है। इसलिए अमरीका की गुंडागर्दी के सामने दुनिया के किसी सभ्य संगठन का कोई बस नहीं चलता, और अफगानिस्तान या इराक, पाकिस्तान के कबायली इलाके, तो नई बात हैं, दशकों पहले वियतनाम पर अमरीकी बमबारी और नापाम बमों से जलते हुए इलाकों के बीच चीखती हुई दौड़ती वह बिना कपड़ों की बच्ची आधी-चौथाई सदी से दुनिया में बच्चोंं पर जुल्म का एक प्रतीक-फोटो बनी हुई आज भी लोगों की याद में घूमती है।
दुनिया में बच्चों का नाम लेकर बातें तो कई तरह की जाती हैं, लेकिन सरकारों से लेकर कारोबारों तक किसी की भी दिलचस्पी सचमुच में बच्चों को बचाने की दिखती नहीं है, बच्चे चर्चा के लिए अच्छा मुद्दा तो हैं, लेकिन बचाने के लिए खर्चा करने का सामान नहीं हैं। एक वक्त जिस तरह रेडक्रॉस के अधिकारों को बहुत से देशों ने अपनी संसदों में कानून बनाकर मान्यता दी थी, उस तरह की मान्यता संयुक्त राष्ट्र के बाल-संगठन यूनिसेफ को कभी मिली भी नहीं थी, और अब तो कोई संभावना दिखती भी नहीं है। दुनिया में अपने आपको लोकतंत्र के सबसे बड़े रखवाले साबित करने पर आमादा विकसित और संपन्न देश अपने बच्चों के लिए एक अलग कानून रखते हैं, और बाकी दुनिया के बच्चों को बाल मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति, बाल सैनिक, और बमबारी झेलने वाले बच्चों की तरह मान कर चलते हैं। इसलिए आस्थावान लोग आज यह कह सकते हैं कि ऐसी दुनिया में बच्चों का ईश्वर ही रखवाला है। दूसरी तरफ हकीकत को बेहतर समझने वाले नास्तिक यह जानते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई ईश्वर नहीं है जो ऐसे बच्चों की फिक्र करे, इसलिए इन बच्चों का कोई भी रखवाला नहीं है।

राखी और साक्षी

संपादकीय
18 अगस्त  2016
इस वक्त जब हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोग राखी मना रहे हैं, तब निजी खुशी के इस त्यौहार के साथ-साथ एक और खुशी जुड़ गई है, ओलंपिक में भारत के लिए पहला पदक पाने वाली कुश्ती की खिलाड़ी साक्षी मलिक। उसने सवा करोड़ से अधिक आबादी को खुश होने का एक मौका दिया है, और आज ही शाम तक एक जिस दूसरे भारतीय खिलाड़ी से किसी पदक की उम्मीद की जा रही है, वह भी एक महिला ही है। लेकिन इस जीत पर आज लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि साक्षी मलिक उस हरियाणा की रहने वाली है जहां पर खाप पंचायतें लड़कियों और महिलाओं का हौसला तोडऩे के लिए सौ-सौ किस्म की तरकीबें करती हैं, और जहां पर हजार लड़कों के पीछे 877 लड़कियों का ही अनुपात है। इसी देश में केरल में हजार लड़कों पर हजार से अधिक लड़कियों का अनुपात भी है, और यह जाहिर है कि कन्या भू्रण हत्या से लेकर कुछ और किस्म की तरकीबों से हरियाणा में लड़कियों को कुचलकर खत्म किया जाता है। लेकिन आज ओलंपिक में किसी एक प्रदेश से सबसे अधिक लड़कियां पहुंची हुई हैं, तो वे शायद हरियाणा से ही हैं।
अब यह बात हरियाणा की छवि के लिए बड़ी ही रहस्यमय और विरोधाभासी है कि उसी राज्य में लड़कियां खेलकूद में इतनी आगे निकलती हैं, और समाज में इतनी कुचली जाती हैं। अगर वहां पर लड़कियों को बराबरी का दर्जा मिले, तो वे लड़कियां किस तरह और ऊंचे आसमान पर पहुंच सकती हैं। लेकिन यह हाल महज हरियाणा का नहीं है, आज जिस तरह देश भर में राखी मनाई जा रही है, उसे देखकर हम सोच रहे हैं कि भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं की हालत क्या साल में एक दिन राखी बंधवाकर उन्हें रक्षा का वचन देने से सुधर सकती है? और आज ही मथुरा में जिंदगी का आखिरी लंबा दौर गुजारती विधवा महिलाओं की तस्वीर लेकर आया है कि वे किस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर वाली राखियां लेकर बैठी हैं, और खबर यह कहती है कि वे हिंदू ब्राम्हण-पंडितों, या हिंदू धर्म गुरुओं को ये राखियां बांधेंगी। अब सवाल यह उठता है कि जिस हिंदू धर्म में पति के गुजर जाने के बाद एक महिला को इस तरह विधवा का दर्जा देकर नर्क सी जिंदगी दी है, उसी हिंदू धर्म के ठेकेदारों को रक्षाबंधन बांधकर  ये महिलाएं और ये समाज आखिर क्या हासिल कर सकते हैं? धर्म ने तो हमेशा से ही महिलाओं को गैरबराबरी का सबसे नीचे का दर्जा दिया है, फिर चाहे वह हिंदू धर्म में सती बनाना हो, मंदिरों से महिलाओं को रोकना हो, या फिर इस्लाम में महिलाओं को मस्जिद-दरगाहों से रोकना हो, या फिर ईसाई धर्म में महिला को पादरी और पोप न बनने देना हो। तकरीबन तमाम धर्मों में महिलाएं गैरबराबरी का सामना करती हैं, और हरियाणा जैसे राज्य में भी लड़कियां धर्म और जाति के थोपे हुए दकियानूसी पाखंडों का बोझ ढोती हैं, जहां किसी लड़की को ही उस पर होने वाले बलात्कार के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
राखी या रक्षाबंधन का यह मौका ओलंपिक के इन नतीजों के साथ मिलकर यह सोचने लायक भी है कि जब किसी लड़की या महिला को बराबरी का मौका मिलता है, तो वह कल्पना चावला या सुनीता विलियम्स की तरह अंतरिक्ष में भी पहुंच सकती हैं, इंदिरा की तरह बांग्लादेश बना सकती है, या सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश के लिए पहला ओलंपिक पदक पाकर देश को शर्मिंदगी से भी बचा सकती है। चिकित्सा विज्ञान भी यह बताता है कि एक महिला किसी पुरुष के मुकाबले अधिक मजबूत होती है, और जो देश महिलाओं की ऐसी ताकत का बराबरी से इस्तेमाल नहीं करते वे पीछे ही रहते हैं। हरियाणा की ही बात करें जहां पर कि लड़कियों का अनुपात इतना घट गया है कि लोगों को अपने लड़कों के लिए दुल्हनें मिलना मुश्किल हो रहा है, और दूसरे प्रदेशों से दुल्हनें खरीदकर लाने की खबरें आती हैं, वहां की लड़कियां देश-विदेश के मुकाबलों से अपने प्रदेश के लिए सम्मान लेकर आती ही रहती हैं। लगे हाथों एक दूसरे पहलू पर भी बात करने की जरूरत है, कि रियो में भारत के लिए पहला ओलंपिक पदक पाने वाली साक्षी मलिक एक बस कंडक्टर की बेटी है, तो यह जाहिर ही है कि वह गरीबी में बड़ी हुई होगी, और फिर भी उसने सामाजिक गैरबराबरी को अपनी कुश्ती के दांव से चारों खाने चित्त कर दिया है। अगर सामाजिक असमानता की ऐसी रूकावटें न रहें, तो इतनी बड़ी आबादी वाले देश अपने लोगों के बल पर एक पर दूसरे को खड़ा करते हुए भी चांद और मंगल तक पहुंच सकता है।

उप्र में बाप-बेटे की कुश्ती समाजवाद है या नूराकुश्ती?

संपादकीय
17 अगस्त  2016
चुनाव के मुहाने पर खड़े हुए उत्तरप्रदेश को लेकर सारे राजनीतिक दल इन दिनों कुछ अधिक चौकन्ना हैं, और इसी वजह से देश में दलितों का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इतनी अहमियत का माना, कि अपनी चुप्पी तोड़कर बड़ी भारी बात दलितों की हिमायत में कही। लेकिन दो दिन पहले आजादी की सालगिरह के मौके पर उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के मालिकनुमा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी के मंत्रियों और अपने मुख्यमंत्री-बेटे से अपनी नाराजगी मंच और माईक से जिस अंदाज में जाहिर की है, उसके मतलब निकालना थोड़ा मुश्किल है।
एक ऐसे प्रदेश की ऐसी पार्टी कि ऐसी सरकार जो कि पूरी की पूरी घर पर खाने की मेज से चलाई जा सकती है, उसमें बाप-बेटे माईक और इंटरव्यू के रास्ते एक-दूसरे से बात करें, और चाचा किसी पार्टी का सपा में विलय करे, भतीजा उसे खारिज करे, यह सब एकता कपूर के किसी घरेलू ड्रामा वाले सीरियल की तरह का है। मुलायम सिंह यादव हर कुछ महीने में अपने बेटे की सरकार के लोगों के खिलाफ, मंत्रियों के खिलाफ इतना कुछ कहते हैं जो कि उत्तरप्रदेश में सांप-नेवले जैसे सत्ता-विपक्ष में विपक्ष भी नहीं कहता है। अब इसके क्या मतलब निकाले जाएं? क्या बेटा पूरी तरह बेकाबू है, और बेटे की सरकार उस बेटे से बेकाबू है? और क्या समाजवाद का नाम लेकर राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव अपने पुत्रमोह के आगे बेकाबू हैं? उत्तरप्रदेश के इस हाफ सेंचुरी वाले कुनबे में सब कुछ बेकाबू लग रहा है। इस कुनबे के 48 से अधिक लोग केंद्र और राज्य की राजनीति में हैं, और मुलायम के समधी लालू का कुनबा देश का दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है, ऐसे में अगर अपना घर काबू में नहीं है, तो घर से चलता लोकतंत्र आखिर जा किधर रहा है?
जिस उत्तरप्रदेश ने देश को लगातार इतने प्रधानमंत्री दिए, शायद पिछले सत्तर बरस में से पैंतालीस से अधिक बरस उत्तरप्रदेश के ही प्रधानमंत्री रहे, और जो मुलायम सिंह यादव खुद प्रधानमंत्री पद के घोषित-अघोषित  प्रत्याशी माने जाते रहे हैं, और जिनकी महत्वाकांक्षा, और संभावना भी जगजाहिर है, वैसे मुलायम को अगर अपने ही बेटे और अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्रियों में से दो-चार को छोड़कर तमाम मंत्री भ्रष्ट और भूमाफिया दिख रहे हैं, तो फिर उत्तरप्रदेश में विपक्ष की जरूरत क्या है? सुना है कि एक वक्त मुलायम कुश्ती के भी शौकीन थे, और अखाड़े में भी हाथ आजमाते थे, ऐसे में वे घर पर ही बेटे से दो-दो हाथ करके यह फैसला क्यों नहीं कर लेते कि उत्तरप्रदेश की सरकार बाप की पार्टी के हिसाब से चलेगी, या कि बेटे के मंत्रियों की मर्जी से?
उत्तरप्रदेश की राजनीति में यह विशाल विरोधाभास देश में समाजवाद के भविष्य की संभावनाओं के लिए भी खतरनाक है, और उत्तरप्रदेश के विकास के लिए भी। चुनाव के कुछ महीने पहले जबकि पार्टी की सरकार टीवी और अखबारों में करोड़ों-अरबों के इश्तहार देकर अपने कामकाज की वाहवाही कर रही है, तब अगर पार्टी का मुखिया पार्टी की सरकार की बदहाली को मंच और माईक से कह रहा है, तो यहां के चुनावी नतीजों का आसार साफ दिखता है। हमें इस कुनबे की जरा भी फिक्र नहीं है, लेकिन जिस समाजवाद के नाम पर यह कुनबा राजनीति करता है, समाजवाद के उस नाम के डूबने की तकलीफ हमें जरूर है। फिलहाल बाप-बेटे के बीच यह एक दिलचस्प मुकाबला है, और इसका नतीजा उत्तरप्रदेश में वोटों की गिनती के साथ ही निकल पाएगा।

मोदी की पाकिस्तान-नीति रोलर-कोस्टर पर सवार...

संपादकीय
16 अगस्त  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की आजादी की सालगिरह पर लालकिले से सालाना जलसे के भाषण में पाकिस्तान के बलूचिस्तान का जिक्र किया, और वहां से जो लोग मोदी की तारीफ कर रहे हैं, उनका शुक्रिया अदा किया। उन्होंने बलूचिस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान के गिलगिट और पाक-अधिकृत कश्मीर के लोगों का बहुत आभार माना। उनकी इन बातों को सुनकर भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को बारीकी से देखने-समझने वाले लोगों के बीच बड़ी हैरानी हुई है और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नरेन्द्र मोदी अपने इस कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ अब रिश्ते सुधारने के मामले में कुछ भी नहीं कर सकते। जिस बलूचिस्तान से भारत का कोई सीधा रिश्ता नहीं है, और वहां के अलगाववादी नेताओं के साथ पाकिस्तान की सरकार के खींचतान के संबंध चल रहे हैं, जिस तरह बलूचिस्तान में एक हथियारबंद संघर्ष चल रहा है, पाकिस्तान के उस आंतरिक मामले में भारतीय प्रधानमंत्री का ऐसे मौके के भाषण में कुछ कहना भारत-पाक के बातचीत के रिश्तों को खत्म कर देने के खतरे के बिना नहीं है।
बलूचिस्तान की स्थानीय पार्टियां और वहां के कई नेता पाकिस्तान से अलग एक स्वायत्तता की लड़ाई लड़ रहे हैं, और अगर देखा जाए तो एक वक्त ऐसी ही कुछ मांग लेकर भारत-पाक सरहद पर बसे हुए पाकिस्तान में खालिस्तानी लोग ऐसा ही कर रहे थे। उस वक्त अगर पाकिस्तान की सरकार खालिस्तानियों की हिमायत की कोई बात करती तो उसे साफ-साफ भारत के घरेलू मामले में दखल करार दिया जाता। और आज पाकिस्तान ने ऐसा ही किया है। फिर जैसा कि कांगे्रस पार्टी के कुछ नेताओं ने ध्यान दिलाया है, भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के एक घरेलू मामले में दखल देकर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से पर भारत के दावे को भी कमजोर कर दिया है, क्योंकि एक घरेलू मामले में दखल की वजह से दूसरा मामला भी घरेलू और दखल के दर्जे में आ जाएगा। लोगों का यह मानना है कि इससे भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर बातचीत में भारत का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, और इन दोनों देशों के बीच तनाव में दिलचस्पी रखने वाली ताकतों को इससे जरूर खुशी होगी, लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत से इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा, और यह नुकसान जरूर होगा कि वह पड़ोसी देशों के घरेलू मामलों में दखल देता है, जो कि भारत की अब तक की घोषित पड़ोसी-विदेशी नीति के ठीक खिलाफ है।
नरेन्द्र मोदी ने शपथ लेने के दिन जिस तरह पड़ोस के सारे शॉर्क देशों को न्यौता दिया था, और जिस तरह पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी दिल्ली आए थे, उससे लोगों को हैरानी भी हुई थी और उम्मीद भी बंधी थी। इसके बाद छिटपुट वारदातों के चलते हुए भी मोदी सरकार ने न सिर्फ बर्दाश्त दिखाया था, बल्कि नवाज शरीफ की सालगिरह पर मोदी अचानक पाकिस्तान पहुंच भी गए थे, और उसे भारत-पाक संबंधों में एक भूचाल जैसा मामला माना गया था। लेकिन यह सरकार अपने कार्यकाल के बीच ही जिस तरह से अपने रूख में यह अप्रत्याशित और अवांछित बदलाव ला रही है, वह रोलर-कोस्टर के सफर जैसा लग रहा है, जिसमें मशीनी-मोटर से चलने वाले आसमान तक पहुंचने वाले हवाई झूलों पर लोग कभी ऊपर ले जाए जाते हैं और कभी नीचे लाए जाते हैं। भारत और पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति, परस्पर रिश्ते, और दोनों देशों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के संबंध पर भी भारत-पाक रिश्तों की छाया तरह-तरह से पड़ती है। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री का यह नया रूख और ऐसे हमलावर तेवर हक्का-बक्का करने वाले हैं, और हमारे हिसाब से इससे उन्होंने अपने बाकी कार्यकाल की पाक-संभावनाओं पर पानी भी फेर दिया है।

आज आजादी के जलसे से अधिक फिक्र की जरूरत

संपादकीय
14 अगस्त  2016
किसी भी मौके की सालगिरह बहुत सी अच्छी-बुरी यादों को लेकर आती है, और यह भी याद दिलाती है कि उस मौके से लेकर अब तक का सफर कैसा रहा है, कहां से कहां तक पहुंचे हैं। भारत की आजादी की सालगिरह कम मायने नहीं रखती है। एक से अधिक पीढिय़ों ने अपना घरबार छोड़कर, अपनी जिंदगी का मोह छोड़कर, कामकाज और अपनी जायदाद की फिक्र छोड़कर एक ऐसी अंग्रेज हुकूमत की जेल जाना पसंद किया था, जिसके अंत होने का कोई आसार नहीं था। और उस वक्त तो अंग्रेजी हुकूमत के बारे में यह कहा जाता था कि अंग्रेज-राज में कभी सूरज नहीं डूबता। और वह बात इस गोल दुनिया के नक्शे में सही भी थी कि जब तक अंग्रेजी-राज के किसी एक हिस्से में सूरज डूबता था, तो उसके पहले ही उसके दूसरे हिस्से में सूरज उग चुका रहता था। ऐसे सर्वशक्तिमान राज के खिलाफ जिन लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान करके आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनके बारे में महज इतिहास की किताबों में लिखा जाना काफी नहीं है, और यह सोचना भी आज जरूरी है कि वे कैसे लोग थे, और क्या आज उनकी परछाई जितनी शहादत को भी हिन्दुस्तानी तैयार हैं?
लेकिन सालगिरह के मौके पर जब आज के हालात देखें, तो यह भी लगता है कि यह आजादी है किसके लिए? आज अगर हिन्दुस्तान में कोई दलित है, कोई आदिवासी है, कोई अल्पसंख्यक है, कोई गरीब है, तो क्या उनके लिए आजादी वैसी ही अहमियत रखती है जैसी कि अहमियत किसी गैरदलित-आदिवासी, गैरअल्पसंख्यक, संपन्न और ताकतवर के लिए रखती है? जब इस फर्क को देखें तो लगता है कि आजादी इस देश के लोगों को चुन-चुनकर मिली है, और चुन-चुनकर लोगों को इससे दूर भी रखा गया है। आज जिस तरह महिलाओं को छांट-छांटकर बलात्कार से लेकर टोनही-आरोप की हत्या का शिकार होना पड़ता है, तो उससे समझ आता है कि आजादी मर्दोंं को तो मिल गई है, बच्चियों से लेकर औरतों तक को नहीं मिल पाई है। आज देश की अदालतों में जिस तरह एक गरीब और एक अमीर के बीच के किसी मुकदमे में सारा का सारा इंसाफ अमीर या राजनीतिक रूप से ताकत रखने वाले की तरफ झुका हुआ दिखता है, उससे समझ आता है कि सत्तर बरस के इस आजाद भारत में आजादी किसे मिली है, और किससे छिन गई है। बहुत से लोगों को देखें तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजों के राज में जिस तरह किसी को भी आजादी नहीं थी, उसी तरह आज कई तबकों को आजादी नहीं है, और कुछ चुनिंदा तबकों को ही इन सत्तर बरसों में आजादी की ताकत मिल पाई है।
सालगिरह का मौका जलसे का तो रहता है, लेकिन इस मौके पर एक आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन भी होना चाहिए। और यह इसलिए जरूरी है कि बस्तर जैसे कई आदिवासी इलाकों में जिस तरह गरीब और कमजोर आदिवासियों को खुद होकर, या उनके हक के लिए नक्सलियों को हथियार उठाने पड़ रहे हैं, तो वह भी देश की आजादी की भावना की नाकामयाबी का एक संकेत और सुबूत है। जिस तरह आज देश भर में दलितों को मारा जा रहा है, और एक सवर्ण-अल्पसंख्यक तबके की गौभक्ति का राज देश पर हिंसा के साथ लादा जा रहा है, उससे दलित तबकों के बीच लोकतंत्र की नाकामयाबी जाहिर है। ऐसा ही हाल कई जगहों पर अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है, और यह बात तय है कि ऐसी तमाम लोकतांत्रिक-असफलताओं के चलते हुए देश को एक विकसित और सफल राष्ट्र बताना अपने आपको झांसा देना है। देश में आसमान छूती इमारतों, और आसमान पर तने हुए पुल-पुलिया बना देने से देश विकसित नहीं हो जाता। एक देश और लोकतंत्र को विकसित होने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास जरूरी होता है, और जब तक इस देश के कानून का इस्तेमाल तमाम लोगों को बराबरी का हक देने के लिए नहीं हो सकेगा, तब तक यह लोकतंत्र कामयाब नहीं कहा जा सकता। आज आजादी की सालगिरह के मौके पर इतिहास को याद करके, उस पर गौरव करके, भविष्य के लिए बड़ी-बड़ी बातें की जाएंगी, लेकिन आज वर्तमान में भारत में लोकतंत्र का जो हाल है, उससे जब यह लगता है कि बाबा नागार्जुन के शब्दों में, यह किसकी जनवरी है, और किसका अगस्त है, और फिर जब अदम गोंडवी के शब्दों में यह लगता है कि सौ में सत्तर आदमी इस मुल्क में जब बदहाल हैं, तो आजादी के मायनों को एक बार फिर समझने की जरूरत लगती है। इस मुद्दे पर अंतहीन लिखा जा सकता है, और इस देश की अंतहीन मिसालें गिनाई जा सकती हैं, लेकिन जैसा कि एक वक्त कहा जाता था कि चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना.., इसी तरह आज भारतीय लोकतंत्र को अपने इस हाल-बदहाल पर फिक्र करने की जरूरत है।

हरित क्रांति, श्वेत क्रांति की तरह अब गैस-क्रांति

संपादकीय
13 अगस्त  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की जो योजना शुरू की है, वह अगर सचमुच कामयाब होती है तो उससे हिन्दुस्तानी महिला और बच्चों की जिंदगी न सिर्फ बदल जाएगी, बल्कि बढ़ भी जाएगी। छत्तीसगढ़ में अभी इस वक्त यह योजना शुरू हो रही है, और इस प्रदेश की महिलाओं की जिंदगी में यह शायद सबसे बड़े फायदे के फैसलों में एक होने जा रहा है।
दुनिया के एक बहुत बड़े वायु-प्रदूषण वैज्ञानिक का भारत का दशकों का शोधकार्य यह बताता है कि तमाम विकासशील और अविकसित देशों में सेहत को सबसे बड़ा खतरा किसी संक्रामक रोग से, किसी जंग से, या किसी हादसे से नहीं है, बल्कि घरेलू चूल्हों से उठने वाले प्रदूषण से महिला और उसके बच्चों को सबसे बुरा और सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। अमरीका के प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कर्क स्मिथ दो-दो नोबल पुरस्कारों में भागीदार रहे हैं, और भारत में वे आधी सदी से काम करते आए हैं, उनका यह निष्कर्ष है कि परमाणु बिजलीघर की इतिहास की आज तक की सारी दुर्घटनाओं को मिला दिया जाए, तो भी एक महीने में घरेलू चूल्हे से होने वाली मौतों का आंकड़ा वे नहीं छू सकते। लकड़ी या कोयले के चूल्हे से उठने वाला धुआं महिला और उसके बच्चों को खोखला करके रख देता है। यह देखने के बाद हैरानी होती है कि किस तरह भारत में महिला यह झेलते हुए भी पुरूष के मुकाबले औसत उम्र में खासी आगे है और तीन-चार बरस अधिक जीती है। पता नहीं इस धुएं से बचने के बाद वह महिला पांच-दस बरस अधिक उम्र न पा जाए।
नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने रसोई गैस पर संपन्न तबके की रियायत को छोडऩे के लिए लोगों का हौसला बढ़ाया, और एक करोड़ लोग इस रियायत को छोड़ चुके हैं। यह संख्या भारत की आबादी के मुकाबले बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यह सिलसिला एक सही दिशा में बढ़ रहा है, और हो सकता है कि मोदी का कार्यकाल खत्म होने तक चार-छह करोड़ लोग रियायत छोड़ चुके हों, और चार-छह करोड़ गरीब महिलाएं रसोई गैस पा चुकी हों।
जो राज्य जनता की अधिक फिक्र करते हैं, उन्हें चाहिए कि प्रधानमंत्री की लाई गई इस उज्जवला योजना पर अमल के लिए अपने राज्य में तेज रफ्तार से काम करें और सबसे गरीब महिलाओं को, ग्रामीण महिलाओं को इसका फायदा पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में घरेलू लकड़ी-कोयले से चूल्हे को बदलने की बहुत जरूरत थी, और रमन सरकार ने राज्य की तरफ से और रियायत जोड़ते हुए जिस तरह दो सौ रूपए में गैस चूल्हा और सिलेंडर देने की शुरुआत आज से की है, उस घोषणा के मुताबिक अगर 25 लाख गरीब परिवारों को गैस चूल्हा मिल जाता है, तो इसका मतलब 25 लाख छत्तीसगढ़ महतारियों की जिंदगी में जमीन आसमान सा फर्क लाना होगा, और कम से कम 50 लाख बच्चों की जिंदगी पर से प्रदूषण के बादल छंटेंगे। यह काम शायद रियायती चावल के बाद छत्तीसगढ़ के गरीबों के लिए सबसे बड़ा काम होगा, और कल से इस पर एक बहस छिड़ी है कि इसका सत्तारूढ़ पार्टी को राजनीतिक फायदा होगा या नहीं। हमारा यह मानना है कि सत्ता पर रहने वाली पार्टी को अपने सरकारी फैसलों से अगले चुनावों में नफा भी होता है, और नुकसान भी होता है। लेकिन इस राजनीतिक गणित से परे भी सरकार को जनकल्याण की अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए, और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से बहुत ही रियायती चावल की वजह से गरीब दो वक्त पेट भर खा पा रहे हैं, वह कोई छोटा काम नहीं है, और गरीबों का पेट भरने के साथ-साथ अगर भाजपा की पेटी में वोट भी भरते हैं, तो भारत का संसदीय लोकतंत्र तो ऐसा ही बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में बहुत तेजी से गैस कनेक्शन दिए जाने चाहिए, ताकि प्रदूषण से महिलाओं की सेहत पर पडऩे वाला नुकसान खत्म हो सके।
हमारा यह भी मानना है कि राज्य सरकारों को भी केन्द्र सरकार की इस योजना में मदद करने के लिए अपने-अपने इलाकों में रसोई गैस रियायत की बाजारू और कारखानों की चोरी को रोकना चाहिए, जो कि आज धड़ल्ले से जारी है। बाजार में लोग मशीनें लगाकर रियायती गैस को कारोबारी सिलेंडरों में भरते हैं और बड़े पैमाने पर रियायत की चोरी करते हैं। गरीबों के लिए तय की गई ऐसी रियायत की चोरी पर सजा कड़ी की जानी चाहिए, और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए।

इंसानियत और मानवीयता जैसे शब्द मुखौटे ही अधिक हैं

संपादकीय
12 अगस्त  2016
दिल्ली में जो कुछ होता है, वह हिन्दुस्तान की जनता को कुछ अधिक दिखता है, या दिखाया जाता है, इसलिए कि वहां मीडिया के कैमरों की भरमार है, संसद में बहस करने वाले लोग उसी शहर की सड़कों से गुजरते हैं, और सुप्रीम कोर्ट को भी दिल्ली के प्रदूषण को लेकर अपने फेंफड़ों की अधिक फिक्र रहती है। ऐसी ही दिल्ली में अभी एक ऑटो रिक्शे वाला एक को घायल करके निकल गया, तो उससे एक बड़ी खबर बनी। दिल्ली से चलने वाले तमाम समाचार चैनलों ने कल से इसे खूब दिखाना शुरू किया है, और इसकी एक वजह भी है। न सिर्फ यह ऑटो वाला घायल को छोड़कर भाग निकला, बल्कि दिनदहाड़े दिल्ली की सड़क पर हुए इस हादसे के बाद उस जगह से इस घायल को देखते हुए पुलिस की गाड़ी भी निकली, और सीसीटीवी कैमरे पर रिकॉर्ड हुआ है कि वहां से आधे घंटे में 140 कारें निकलीं, 82 तिपहिया निकले, 181 मोटरसाइकिलें निकलीं, और 45 लोग पैदल वहां से गुजरे। लेकिन इनमें से किसी ने भी इस घायल की मदद नहीं की, बल्कि एक आदमी तो इस घायल का मोबाइल ही उठाकर ले गया, और वह कैमरे पर कैद हो गया है। अब सवाल यह है कि जिस दिल्ली में लोगों से पढ़े-लिखे होने की उम्मीद कुछ अधिक की जाती है, जहां पर पुलिस की बड़ी मौजूदगी है, जहां पर सड़कों पर कैमरों से खूब नजर रखी जाती है, वहां पर अगर लोग घायल को इस तरह मरने के लिए छोड़ देते हैं, तो फिर देश के बाकी इलाकों में अगर लोग सड़कों पर गाडिय़ां रोककर लूट करते हैं, बलात्कार करते हैं, तो वह बहुत अटपटी बात नहीं है।
दरअसल लोगों का मिजाज रहता ही ऐसा है। इंसान आमतौर पर बहुत ही खुदगर्ज होते हैं, और इनमें से कुछ लोग, या अधिक लोग बड़ी मेहनत करके, आसपास के अच्छे लोगों के अच्छे असर से भले इंसान बनते हैं। फिर भी अधिकतर लोग ऐसे रहते हैं कि कभी कोई मौका लगे, तो इंसानियत कही जाने वाली खूबी से तुरंत पीछा छुड़ाकर अपने निजी फायदे के लिए लूटपाट या उठाईगिरी करने लगें, या गंदगी फैलाने लगें। हिन्दुस्तानियों के बारे में, खासकर हिन्दुस्तानी आदमियों के बारे में यह बात आम है कि कोई साफ-सुथरी जगह दिखी, तो उनके मुंह में पीक बनने लगती है, और अगर उन्हें कोई थोड़ा भी सुनसान कोना दिखा, किसी पेड़ की ओट दिखी, तो उन्हें पेशाब लगने लगती है। ऐसा हिन्दुस्तान अपने बहुत से भारतीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति को लेकर बड़ा घमंडी भी रहता है, लेकिन दूसरों के लिए कुछ करना यहां कम होता है। कोई एक ट्रक पलट जाती है, तो आसपास की पूरी बस्ती, सड़क से गुजरते लोग, सामान लूटकर ले जाने लगते हैं, कई बार तो किसी केमिकल का टैंकर पलटता है, तो सड़क पर बिखरे रसायन को तेल समझकर लोग समेट-समेटकर ले जाने लगते हैं, और उसमें हाथ-पैर भी जला बैठते हैं।
इसलिए इंसान के मिजाज को देखें तो यह लगता है कि इंसानियत या मानवीयता जैसे शब्द एक मुखौटे की तरह सिर्फ भली बातों को दिखाते हुए बनाए गए हैं, और उनका इंसान के पूरे मिजाज से कुछ लेना-देना नहीं रहता है। जिस तरह घर आए मेहमान को सिर्फ अच्छी-अच्छी चीजें दिखाई जाती हैं, अच्छा-अच्छा खिलाया जाता है, अच्छा-अच्छा सुनाया जाता है, कुछ उसी तरह का झांसा इंसानियत और मानवीयता जैसे शब्द भी पैदा करते हैं। इस मुखौटे के पीछे जो असली इंसान हैं, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो तब तक भले रहते हैं, जब तक उन्हें बुरा बनने से कोई खास फायदा न दिखता हो। और इसके पीछे एक यह मजबूरी भी हो सकती है कि हिन्दुस्तान जैसी जगह पर आम लोग अपनी निजी जिंदगी की दिक्कतों को लेकर इतना संघर्ष करते रहते हैं, कि दूसरे की मदद करने का उनका हौसला कुछ कम भी हो जाता है। इस देश में पुलिस और अस्पताल, कोर्ट और सरकार, इन सबका बर्ताव भी लोगों का हौसला तोडऩे वाला रहता है, और लोग यह सोचते हैं कि किसी कानूनी पचड़े में फंसे, तो पता नहीं कितने दिन की रोजी-रोटी बर्बाद हो जाएगी।
और भारतीय लोकतंत्र और समाज की यह हालत लोगों की जागरूकता के अलावा उनकी आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है, सरकार के बेरहम ढांचे से भी जुड़ी हुई है, इसलिए इस नौबत पर समाज में खासी चर्चा की जरूरत है, और इस चर्चा के बिना भारत के एक बेहतर जगह नहीं बन सकता।

ट्रम्प की गिरती शोहरत से सबक की जरूरत

संपादकीय
11 अगस्त  2016
अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए वहां की राजनीति में संकीर्णतावादी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के पांवतले से शोहरत की जमीन खिसकती दिख रही है। अमरीका में हर दिन लोकप्रियता के पैमानों पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को परखने का चलन है, और पिछले कुछ दिनों में ट्रम्प ने जिस जुबान में लोगों को नाराज किया है, उसे देखते हुए लगातार उनकी लोकप्रियता घट रही है, और मीडिया के एक हिस्से का यह भी मानना है कि रिपब्लिकन पार्टी इस बात पर भी विचार कर रही है कि अगर ट्रम्प की लोकप्रियता और अधिक गिरी और अगर वे खुद होकर चुनाव से बाहर हो गए, तो क्या होगा? अमरीकी राजनीतिक दलों के संविधान में ऐसी नौबत को लेकर इंतजाम तो है, लेकिन वह एक किस्म से डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीद्वार हिलेरी क्लिंटन को जीत तश्तरी पर रखकर पेश करने जैसा हो जाएगा।
लेकिन इस बात की चर्चा आज हम यहां पर एक दूसरी वजह से कर रहे हैं। ट्रम्प ने इस उम्मीदवारी को पाने की कोशिश पार्टी के भीतर के मुकाबले से की, और लगातार अमरीका के बहुत से अल्पसंख्यक और कमजोर तबकों पर हमले किए, महिलाओं के खिलाफ बयान दिए, मुस्लिम देशों पर हमले की धमकी दी, इस्लाम को आतंक कहा, दूसरे देशों से आकर काम करने वाले लोगों के खिलाफ बयान दिए, भारत और चीन जैसे देशों से रोजगार छीनकर वापिस अमरीका लाने की बात कही। लेकिन उनकी तमाम किस्म की बकवास में सबसे अधिक भयानक बातें रंगभेद की थीं, साम्प्रदायिकता की थीं, महिलाओं के खिलाफ थीं, और वे खुद एक खरबपति कारोबारी हैं, और अमरीकी कामगारों के खिलाफ उनकी सोच के लिए वे बदनाम भी हैं। उनके राष्ट्रपति बनने पर अमरीका के अश्वेतों, और अल्पसंख्यकों पर एक खतरा मंडराने लगेगा, ऐसा माहौल बना हुआ है। अब अपनी दौलत की पूरी ताकत को लेकर, और अमरीका की दो में से एक सबसे बड़ी पार्टी के उम्मीदवार रहते हुए भी डोनाल्ड ट्रम्प आज जिस कदर कमजोर दिख रहे हैं, उनके पांवतले से जमीन जिस तरह से खिसक रही है, उसे देखते हुए दुनिया के तमाम देशों को यह याद रखना चाहिए कि राजनीतिक दल चाहे कितना बड़ी ही क्यों न हों, उम्मीदवार चाहे कितना ही ताकतवर क्यों न हों, अगर चुनाव प्रचार या राजनीति नफरत पर टिकी रहती है, हिंसा की बातें होती हैं, गरीबों और अल्पसंख्यकों में दहशत फैलाई जाती है, तो पांवतले से जमीन इसी तरह खिसकती है।
आज भारत की राजनीति में भी जगह-जगह इस तरह की नौबत लाई जा रही है। और यह समझने की जरूरत है कि किसी भी देश की जनता नफरत को न खा सकती है, और न पी सकती है। नफरत के आधार पर बहुसंख्यक तबके की ताकत से भी अल्पसंख्यक तबके को मारा नहीं जा सकता, क्योंकि बहुसंख्यक तबके में भी बहुसंख्यक हिस्सा ऐसा होता है जो कि नफरत के खिलाफ होता है। यही वजह है कि आज कुछ मुस्लिम देशों में जहां आईएस जैसा इंसानी इतिहास का सबसे खतरनाक साम्प्रदायिक संगठन काम कर रहा है, वहां भी उसकी नफरत और उसकी हिंसा के खिलाफ जान गंवाते हुए भी लोग खड़े हो रहे हैं, जो कि उसी इस्लाम को मानने वाले हैं। इसलिए नफरत के आधार पर लोगों को थोड़े वक्त तो जोड़ा जा सकता है, लंबे समय के लिए नहीं, और अधिक लोगों को नहीं। भारत में आज जिस तरह नफरत की राजनीति चल रही है, जिस तरह दलित, आदिवासी, महिला, गरीब, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ और हिंसक बयान दिए जा रहे हैं, जगह-जगह दलितों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, और उनको मारा जा रहा है, इन सबको देखते हुए अमरीका में ट्रम्प की गिरती हुई, गिर चुकी लोकप्रियता पर गौर करने जरूरत है, और अगर इससे कोई सबक न लें, तो दुनिया का इतिहास तो यही है कि इतिहास और वर्तमान से सबक न लेने वाले लोगों का भविष्य कमजोर ही होता है।

वर्दी वालों को अपने बारे में जनधारणा सुधारनी चाहिए..

संपादकीय
10 अगस्त  2016
सोशल मीडिया पर पुलिस के जुल्म की तस्वीरें, और उसके वीडियो देख-देखकर दिल दहल जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ कई ऐसी तस्वीरें और ऐसे वीडियो इसी सोशल मीडिया पर दिखते हैं जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों के पुलिसवाले बीमार, जख्मी, या भूखे-गरीब की मदद करते हैं। यह बात जाहिर है कि जुल्म के मुकाबले रहम की तस्वीरें कम फैल पाती हैं, क्योंकि नकारात्मक बातों से सनसनी अधिक फैलती है। फिर भी सोशल मीडिया की ताकत को देखते हुए न सिर्फ पुलिस को, बल्कि सरकार के दूसरे तबकों को भी अपने अच्छे काम सामने रखने चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हकीकत चाहे जो हो, जनधारणा अपने आपमें बहुत वजन रखती है, और किसी व्यक्ति या विभाग, संगठन या सरकार का भविष्य कई मौकों पर जनधारणा से भी तय होता है। चूंकि पुलिस, फौज, या पैरामिलिट्री के लोग वर्दियों में रहते हैं, इसलिए उनके किए हुए गलत काम पूरी वर्दी की शान को चौपट कर देते हैं, और ऐसे में इस तस्वीर को सुधारने के लिए उनके अच्छे काम भी उनको खुद को जनता के सामने रखने चाहिए।
आज हिन्दुस्तान में आम लोगों की सोच का हाल मशहूर फिल्म शोले की तरह का है। जिसमें कहा जाता है कि गब्बर सिंह का नाम सुनाकर माताएं अपने बच्चों को सुलाती हैं, कि सो जा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा। हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में माताएं पुलिस का नाम लेकर बच्चों को सुलाती हैं कि सो जा नहीं तो पुलिस आ जाएगी, दूध पीले नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाएगी, नतीजा यह होता है कि बचपन से ही बच्चे पुलिस के डर और दहशत के साथ बड़े होते हैं, और भारत में यह आम बोलचाल है कि खाकी से भगवान बचाए। पुलिस की वर्दी, या पुलिस थाने जाना, लोगों के लिए अच्छा अनुभव नहीं रहता है, इसलिए पुलिस को यह चाहिए कि वह अपने बारे में जनधारणा को बदलने के लिए पहले तो ठोस काम करे, और फिर उस सकारात्मक काम को लोगों के सामने रखने के लिए सोशल मीडिया की तरह के माध्यम का इस्तेमाल भी करे। पुलिस से अगर लोगों के रिश्ते दोस्ताना रहें, तो जनता का एक ऐसा सहयोग पुलिस को मिल सकता है जिसे कि पुलिस अपने अमले को बढ़ाकर भी हासिल नहीं कर सकती। ब्रिटेन जैसे देश में पुलिस को एक दोस्त की शक्ल में पेश करने के लिए सरकार सोची-समझी बहुत सी कोशिशें करती है
और यह बात महज पुलिस पर लागू नहीं होती है, छवि सुधारने, छवि निखारने, साख बनाने, बदनामी घटाने जैसे कई कामों के लिए आज दुनिया में बड़ी-बड़ी कंपनियां काम करती हैं, और वे नेताओं से लेकर कारोबारियों तक, और समाज सेवा के काम में लगे हुए जनसंगठनों तक के लिए काम करती हैं। आज दुनिया में कहीं भी समाज सेवा में लगे हुए संगठनों की अगर अपनी खुद की साख अच्छी न हो, तो उन्हें कहीं से दान भी नहीं मिलता, और उनका धंधा ही मंदा हो जाता है।
अगर साख अच्छी रहे, लोगों का भरोसा रहे, तो काम आसान हो जाता है, और दाम अच्छे मिल जाते हैं। कारोबार की दुनिया की कंपनियां ऐसी साख के लिए बड़ी कोशिशें करती हैं, और अरबों-खरबों खर्च करती हैं। अमरीकी कंपनियों के बारे में यह बात बड़ी आम है कि किसी भी बड़ी कंपनी के मुखिया के ओहदे पर किसी को छांटते हुए यह भी देखा जाता है कि उन्होंने अपने पहले के कामकाज के दौरान समाज सेवा के किसी प्रोजेक्ट पर काम किया है या नहीं। कंपनियों के सामाजिक सरोकार को आज उनकी कमाई के लिए एक जरूरी बात माना जाता है, और कई कंपनियां तो महंगे ईश्तहार से भी जितनी शोहरत नहीं पाती हैं, उतनी शोहरत वे मामूली खर्च से समाज सेवा करके पा लेती हैं।
भारत में पुलिस और सुरक्षाबलों को अपने बीच से बुराई को तो खत्म करना ही चाहिए, अपने बीच भलाई को बढ़ाकर, लोगों के बीच अपने नेक काम रखने भी चाहिए, और यह खर्च बड़ा सस्ता पड़ेगा।