भूतों से बंगले खाली करवाने की जरूरत

संपादकीय
1 अगस्त  2016
उत्तरप्रदेश की एक जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने उस राज्य के आधा दर्जन भूतपूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी बंगले खाली करने का आदेश दिया है। दो महीने के भीतर मकान खाली करने का यह आदेश संभवत: बाकी देश पर भी लागू होगा जहां पर भूतपूर्व मुख्यमंत्री, या मंत्री, या बाकी नेताओं ने इसे एक आदत ही बना ली है कि एक बार किसी बंगले में घुसें, तो अधिक से अधिक वक्त तक वहां बने रहें। दिल्ली में तो मीरा कुमार से लेकर अजीत सिंह तक कई ऐसे नेता हैं जिन्होंने अपने पिताओं के नाम पर सरकारी बंगलों को स्मारक ही बना डाला है। कई राज्य ऐसा करने के लिए स्थानीय स्तर पर कुछ नियम बना लेते हैं, और कई बार सरकारें चुनावी-राजनीतिक कारणों से किसी जाति या क्षेत्र के नेता के कुनबे को ऐसे बंगला-स्मारक की खास छूट दे देती हैं।
हमारा मानना है कि जनता के पैसों पर बनने और चलने वाले सरकारी बंगलों को लेकर अदालत को एक कड़ा रूख सामने रखना चाहिए, और इस आदेश का एक विस्तार भी करना चाहिए, ताकि कार्यकाल खत्म होने के बाद एक-दो महीने के भीतर हर किसी को बंगला खाली करना पड़े। जहां कहीं भूतपूर्व लोगों को सरकारी बंगले देने का इंतजाम किया गया है, वह भी खत्म होना चाहिए, क्योंकि जनता भूतों का बोझ कब तक ढोए? लोग अपने परिवार के गुजरे हुए पुरखों का वजन तो ढो नहीं पाते, और गयाजी जाकर उनका पिंडदान करते हैं, ताकि आगे बरसी की जरूरत न हो। ऐसे में जिन राज्यों में आधे वक्त बिजली बंद रहती है क्योंकि सरकार के पास पैसे नहीं है, जहां आधी आबादी रियायती चावल की वजह से ही दो वक्त खाना खा पाती है, वहां पर इस तरह की सामंती और शाही दरियादिली जनता के पैसों से नहीं दिखाना चाहिए। और फिर ऐसी मिसालें किसी एक महात्मा गांधी पर खत्म नहीं हो पातीं, आज तो नेताओं के कुनबे के लोग अपनी हसरतों को पूरा करने के लिए अधिक से अधिक बंगलों और सहूलियतों पर कब्जा करना चाहते हैं।
भारत में शायद अकेले गांधी ही ऐसे रहे जिनके नाम पर उनके वारिसान ने कोई मकान नहीं लिया, और शायद नेहरू ऐसे अकेले नेता रहे जिन्होंने आनंद भवन की अपनी निजी जायदाद सरकार को दे दी। कुछ वामपंथी मुख्यमंत्री, और मंत्री ऐसे रहे जिन्होंने बहुत किफायत के साथ सरकारी-जिंदगी पूरी की। जिस वक्त सोमनाथ चटर्जी लोकसभा अध्यक्ष थे, उस वक्त भी कोलकाता में वे एक सरकारी क्लर्क के दर्जे के मकान में रहते थे। लेकिन अब चलन अपने जीते जी हजारों करोड़ से अपने स्मारक बनवाने का है, अपने गांव में हवाई अड्डा बनवाने का है, और अपने मां-बाप के नाम पर सरकारी बंगले को स्मारक के लिए आबंटित करवाने के लिए राजनीतिक ब्लैकमेलिंग करने का है। देश के ऐसे खराब राजनीतिक माहौल में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला बहुत अच्छा है, और इसे हर प्रदेश में लागू करवाने के लिए स्थानीय संगठनों को आगे आना चाहिए, और सरकार से लेकर अदालत तक को गिनाना चाहिए कि ऐसे दायरे में, कौन-कौन से बंगले आ रहे हैं। 

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