वर्दी वालों को अपने बारे में जनधारणा सुधारनी चाहिए..

संपादकीय
10 अगस्त  2016
सोशल मीडिया पर पुलिस के जुल्म की तस्वीरें, और उसके वीडियो देख-देखकर दिल दहल जाएगा। लेकिन दूसरी तरफ कई ऐसी तस्वीरें और ऐसे वीडियो इसी सोशल मीडिया पर दिखते हैं जिनमें भारत के अलग-अलग हिस्सों के पुलिसवाले बीमार, जख्मी, या भूखे-गरीब की मदद करते हैं। यह बात जाहिर है कि जुल्म के मुकाबले रहम की तस्वीरें कम फैल पाती हैं, क्योंकि नकारात्मक बातों से सनसनी अधिक फैलती है। फिर भी सोशल मीडिया की ताकत को देखते हुए न सिर्फ पुलिस को, बल्कि सरकार के दूसरे तबकों को भी अपने अच्छे काम सामने रखने चाहिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी है कि हकीकत चाहे जो हो, जनधारणा अपने आपमें बहुत वजन रखती है, और किसी व्यक्ति या विभाग, संगठन या सरकार का भविष्य कई मौकों पर जनधारणा से भी तय होता है। चूंकि पुलिस, फौज, या पैरामिलिट्री के लोग वर्दियों में रहते हैं, इसलिए उनके किए हुए गलत काम पूरी वर्दी की शान को चौपट कर देते हैं, और ऐसे में इस तस्वीर को सुधारने के लिए उनके अच्छे काम भी उनको खुद को जनता के सामने रखने चाहिए।
आज हिन्दुस्तान में आम लोगों की सोच का हाल मशहूर फिल्म शोले की तरह का है। जिसमें कहा जाता है कि गब्बर सिंह का नाम सुनाकर माताएं अपने बच्चों को सुलाती हैं, कि सो जा, नहीं तो गब्बर आ जाएगा। हिन्दुस्तान के बहुत बड़े हिस्से में माताएं पुलिस का नाम लेकर बच्चों को सुलाती हैं कि सो जा नहीं तो पुलिस आ जाएगी, दूध पीले नहीं तो पुलिस पकड़कर ले जाएगी, नतीजा यह होता है कि बचपन से ही बच्चे पुलिस के डर और दहशत के साथ बड़े होते हैं, और भारत में यह आम बोलचाल है कि खाकी से भगवान बचाए। पुलिस की वर्दी, या पुलिस थाने जाना, लोगों के लिए अच्छा अनुभव नहीं रहता है, इसलिए पुलिस को यह चाहिए कि वह अपने बारे में जनधारणा को बदलने के लिए पहले तो ठोस काम करे, और फिर उस सकारात्मक काम को लोगों के सामने रखने के लिए सोशल मीडिया की तरह के माध्यम का इस्तेमाल भी करे। पुलिस से अगर लोगों के रिश्ते दोस्ताना रहें, तो जनता का एक ऐसा सहयोग पुलिस को मिल सकता है जिसे कि पुलिस अपने अमले को बढ़ाकर भी हासिल नहीं कर सकती। ब्रिटेन जैसे देश में पुलिस को एक दोस्त की शक्ल में पेश करने के लिए सरकार सोची-समझी बहुत सी कोशिशें करती है
और यह बात महज पुलिस पर लागू नहीं होती है, छवि सुधारने, छवि निखारने, साख बनाने, बदनामी घटाने जैसे कई कामों के लिए आज दुनिया में बड़ी-बड़ी कंपनियां काम करती हैं, और वे नेताओं से लेकर कारोबारियों तक, और समाज सेवा के काम में लगे हुए जनसंगठनों तक के लिए काम करती हैं। आज दुनिया में कहीं भी समाज सेवा में लगे हुए संगठनों की अगर अपनी खुद की साख अच्छी न हो, तो उन्हें कहीं से दान भी नहीं मिलता, और उनका धंधा ही मंदा हो जाता है।
अगर साख अच्छी रहे, लोगों का भरोसा रहे, तो काम आसान हो जाता है, और दाम अच्छे मिल जाते हैं। कारोबार की दुनिया की कंपनियां ऐसी साख के लिए बड़ी कोशिशें करती हैं, और अरबों-खरबों खर्च करती हैं। अमरीकी कंपनियों के बारे में यह बात बड़ी आम है कि किसी भी बड़ी कंपनी के मुखिया के ओहदे पर किसी को छांटते हुए यह भी देखा जाता है कि उन्होंने अपने पहले के कामकाज के दौरान समाज सेवा के किसी प्रोजेक्ट पर काम किया है या नहीं। कंपनियों के सामाजिक सरोकार को आज उनकी कमाई के लिए एक जरूरी बात माना जाता है, और कई कंपनियां तो महंगे ईश्तहार से भी जितनी शोहरत नहीं पाती हैं, उतनी शोहरत वे मामूली खर्च से समाज सेवा करके पा लेती हैं।
भारत में पुलिस और सुरक्षाबलों को अपने बीच से बुराई को तो खत्म करना ही चाहिए, अपने बीच भलाई को बढ़ाकर, लोगों के बीच अपने नेक काम रखने भी चाहिए, और यह खर्च बड़ा सस्ता पड़ेगा।

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