ट्रम्प की गिरती शोहरत से सबक की जरूरत

संपादकीय
11 अगस्त  2016
अमरीका में राष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए वहां की राजनीति में संकीर्णतावादी मानी जाने वाली रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प के पांवतले से शोहरत की जमीन खिसकती दिख रही है। अमरीका में हर दिन लोकप्रियता के पैमानों पर राष्ट्रपति पद के उम्मीदवारों को परखने का चलन है, और पिछले कुछ दिनों में ट्रम्प ने जिस जुबान में लोगों को नाराज किया है, उसे देखते हुए लगातार उनकी लोकप्रियता घट रही है, और मीडिया के एक हिस्से का यह भी मानना है कि रिपब्लिकन पार्टी इस बात पर भी विचार कर रही है कि अगर ट्रम्प की लोकप्रियता और अधिक गिरी और अगर वे खुद होकर चुनाव से बाहर हो गए, तो क्या होगा? अमरीकी राजनीतिक दलों के संविधान में ऐसी नौबत को लेकर इंतजाम तो है, लेकिन वह एक किस्म से डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीद्वार हिलेरी क्लिंटन को जीत तश्तरी पर रखकर पेश करने जैसा हो जाएगा।
लेकिन इस बात की चर्चा आज हम यहां पर एक दूसरी वजह से कर रहे हैं। ट्रम्प ने इस उम्मीदवारी को पाने की कोशिश पार्टी के भीतर के मुकाबले से की, और लगातार अमरीका के बहुत से अल्पसंख्यक और कमजोर तबकों पर हमले किए, महिलाओं के खिलाफ बयान दिए, मुस्लिम देशों पर हमले की धमकी दी, इस्लाम को आतंक कहा, दूसरे देशों से आकर काम करने वाले लोगों के खिलाफ बयान दिए, भारत और चीन जैसे देशों से रोजगार छीनकर वापिस अमरीका लाने की बात कही। लेकिन उनकी तमाम किस्म की बकवास में सबसे अधिक भयानक बातें रंगभेद की थीं, साम्प्रदायिकता की थीं, महिलाओं के खिलाफ थीं, और वे खुद एक खरबपति कारोबारी हैं, और अमरीकी कामगारों के खिलाफ उनकी सोच के लिए वे बदनाम भी हैं। उनके राष्ट्रपति बनने पर अमरीका के अश्वेतों, और अल्पसंख्यकों पर एक खतरा मंडराने लगेगा, ऐसा माहौल बना हुआ है। अब अपनी दौलत की पूरी ताकत को लेकर, और अमरीका की दो में से एक सबसे बड़ी पार्टी के उम्मीदवार रहते हुए भी डोनाल्ड ट्रम्प आज जिस कदर कमजोर दिख रहे हैं, उनके पांवतले से जमीन जिस तरह से खिसक रही है, उसे देखते हुए दुनिया के तमाम देशों को यह याद रखना चाहिए कि राजनीतिक दल चाहे कितना बड़ी ही क्यों न हों, उम्मीदवार चाहे कितना ही ताकतवर क्यों न हों, अगर चुनाव प्रचार या राजनीति नफरत पर टिकी रहती है, हिंसा की बातें होती हैं, गरीबों और अल्पसंख्यकों में दहशत फैलाई जाती है, तो पांवतले से जमीन इसी तरह खिसकती है।
आज भारत की राजनीति में भी जगह-जगह इस तरह की नौबत लाई जा रही है। और यह समझने की जरूरत है कि किसी भी देश की जनता नफरत को न खा सकती है, और न पी सकती है। नफरत के आधार पर बहुसंख्यक तबके की ताकत से भी अल्पसंख्यक तबके को मारा नहीं जा सकता, क्योंकि बहुसंख्यक तबके में भी बहुसंख्यक हिस्सा ऐसा होता है जो कि नफरत के खिलाफ होता है। यही वजह है कि आज कुछ मुस्लिम देशों में जहां आईएस जैसा इंसानी इतिहास का सबसे खतरनाक साम्प्रदायिक संगठन काम कर रहा है, वहां भी उसकी नफरत और उसकी हिंसा के खिलाफ जान गंवाते हुए भी लोग खड़े हो रहे हैं, जो कि उसी इस्लाम को मानने वाले हैं। इसलिए नफरत के आधार पर लोगों को थोड़े वक्त तो जोड़ा जा सकता है, लंबे समय के लिए नहीं, और अधिक लोगों को नहीं। भारत में आज जिस तरह नफरत की राजनीति चल रही है, जिस तरह दलित, आदिवासी, महिला, गरीब, और अल्पसंख्यकों के खिलाफ भड़काऊ और हिंसक बयान दिए जा रहे हैं, जगह-जगह दलितों के साथ बलात्कार हो रहे हैं, और उनको मारा जा रहा है, इन सबको देखते हुए अमरीका में ट्रम्प की गिरती हुई, गिर चुकी लोकप्रियता पर गौर करने जरूरत है, और अगर इससे कोई सबक न लें, तो दुनिया का इतिहास तो यही है कि इतिहास और वर्तमान से सबक न लेने वाले लोगों का भविष्य कमजोर ही होता है।

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