इंसानियत और मानवीयता जैसे शब्द मुखौटे ही अधिक हैं

संपादकीय
12 अगस्त  2016
दिल्ली में जो कुछ होता है, वह हिन्दुस्तान की जनता को कुछ अधिक दिखता है, या दिखाया जाता है, इसलिए कि वहां मीडिया के कैमरों की भरमार है, संसद में बहस करने वाले लोग उसी शहर की सड़कों से गुजरते हैं, और सुप्रीम कोर्ट को भी दिल्ली के प्रदूषण को लेकर अपने फेंफड़ों की अधिक फिक्र रहती है। ऐसी ही दिल्ली में अभी एक ऑटो रिक्शे वाला एक को घायल करके निकल गया, तो उससे एक बड़ी खबर बनी। दिल्ली से चलने वाले तमाम समाचार चैनलों ने कल से इसे खूब दिखाना शुरू किया है, और इसकी एक वजह भी है। न सिर्फ यह ऑटो वाला घायल को छोड़कर भाग निकला, बल्कि दिनदहाड़े दिल्ली की सड़क पर हुए इस हादसे के बाद उस जगह से इस घायल को देखते हुए पुलिस की गाड़ी भी निकली, और सीसीटीवी कैमरे पर रिकॉर्ड हुआ है कि वहां से आधे घंटे में 140 कारें निकलीं, 82 तिपहिया निकले, 181 मोटरसाइकिलें निकलीं, और 45 लोग पैदल वहां से गुजरे। लेकिन इनमें से किसी ने भी इस घायल की मदद नहीं की, बल्कि एक आदमी तो इस घायल का मोबाइल ही उठाकर ले गया, और वह कैमरे पर कैद हो गया है। अब सवाल यह है कि जिस दिल्ली में लोगों से पढ़े-लिखे होने की उम्मीद कुछ अधिक की जाती है, जहां पर पुलिस की बड़ी मौजूदगी है, जहां पर सड़कों पर कैमरों से खूब नजर रखी जाती है, वहां पर अगर लोग घायल को इस तरह मरने के लिए छोड़ देते हैं, तो फिर देश के बाकी इलाकों में अगर लोग सड़कों पर गाडिय़ां रोककर लूट करते हैं, बलात्कार करते हैं, तो वह बहुत अटपटी बात नहीं है।
दरअसल लोगों का मिजाज रहता ही ऐसा है। इंसान आमतौर पर बहुत ही खुदगर्ज होते हैं, और इनमें से कुछ लोग, या अधिक लोग बड़ी मेहनत करके, आसपास के अच्छे लोगों के अच्छे असर से भले इंसान बनते हैं। फिर भी अधिकतर लोग ऐसे रहते हैं कि कभी कोई मौका लगे, तो इंसानियत कही जाने वाली खूबी से तुरंत पीछा छुड़ाकर अपने निजी फायदे के लिए लूटपाट या उठाईगिरी करने लगें, या गंदगी फैलाने लगें। हिन्दुस्तानियों के बारे में, खासकर हिन्दुस्तानी आदमियों के बारे में यह बात आम है कि कोई साफ-सुथरी जगह दिखी, तो उनके मुंह में पीक बनने लगती है, और अगर उन्हें कोई थोड़ा भी सुनसान कोना दिखा, किसी पेड़ की ओट दिखी, तो उन्हें पेशाब लगने लगती है। ऐसा हिन्दुस्तान अपने बहुत से भारतीय मूल्यों और भारतीय संस्कृति को लेकर बड़ा घमंडी भी रहता है, लेकिन दूसरों के लिए कुछ करना यहां कम होता है। कोई एक ट्रक पलट जाती है, तो आसपास की पूरी बस्ती, सड़क से गुजरते लोग, सामान लूटकर ले जाने लगते हैं, कई बार तो किसी केमिकल का टैंकर पलटता है, तो सड़क पर बिखरे रसायन को तेल समझकर लोग समेट-समेटकर ले जाने लगते हैं, और उसमें हाथ-पैर भी जला बैठते हैं।
इसलिए इंसान के मिजाज को देखें तो यह लगता है कि इंसानियत या मानवीयता जैसे शब्द एक मुखौटे की तरह सिर्फ भली बातों को दिखाते हुए बनाए गए हैं, और उनका इंसान के पूरे मिजाज से कुछ लेना-देना नहीं रहता है। जिस तरह घर आए मेहमान को सिर्फ अच्छी-अच्छी चीजें दिखाई जाती हैं, अच्छा-अच्छा खिलाया जाता है, अच्छा-अच्छा सुनाया जाता है, कुछ उसी तरह का झांसा इंसानियत और मानवीयता जैसे शब्द भी पैदा करते हैं। इस मुखौटे के पीछे जो असली इंसान हैं, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो तब तक भले रहते हैं, जब तक उन्हें बुरा बनने से कोई खास फायदा न दिखता हो। और इसके पीछे एक यह मजबूरी भी हो सकती है कि हिन्दुस्तान जैसी जगह पर आम लोग अपनी निजी जिंदगी की दिक्कतों को लेकर इतना संघर्ष करते रहते हैं, कि दूसरे की मदद करने का उनका हौसला कुछ कम भी हो जाता है। इस देश में पुलिस और अस्पताल, कोर्ट और सरकार, इन सबका बर्ताव भी लोगों का हौसला तोडऩे वाला रहता है, और लोग यह सोचते हैं कि किसी कानूनी पचड़े में फंसे, तो पता नहीं कितने दिन की रोजी-रोटी बर्बाद हो जाएगी।
और भारतीय लोकतंत्र और समाज की यह हालत लोगों की जागरूकता के अलावा उनकी आर्थिक स्थिति से भी जुड़ी हुई है, सरकार के बेरहम ढांचे से भी जुड़ी हुई है, इसलिए इस नौबत पर समाज में खासी चर्चा की जरूरत है, और इस चर्चा के बिना भारत के एक बेहतर जगह नहीं बन सकता।

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