हरित क्रांति, श्वेत क्रांति की तरह अब गैस-क्रांति

संपादकीय
13 अगस्त  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गरीब महिलाओं को मुफ्त गैस कनेक्शन देने की जो योजना शुरू की है, वह अगर सचमुच कामयाब होती है तो उससे हिन्दुस्तानी महिला और बच्चों की जिंदगी न सिर्फ बदल जाएगी, बल्कि बढ़ भी जाएगी। छत्तीसगढ़ में अभी इस वक्त यह योजना शुरू हो रही है, और इस प्रदेश की महिलाओं की जिंदगी में यह शायद सबसे बड़े फायदे के फैसलों में एक होने जा रहा है।
दुनिया के एक बहुत बड़े वायु-प्रदूषण वैज्ञानिक का भारत का दशकों का शोधकार्य यह बताता है कि तमाम विकासशील और अविकसित देशों में सेहत को सबसे बड़ा खतरा किसी संक्रामक रोग से, किसी जंग से, या किसी हादसे से नहीं है, बल्कि घरेलू चूल्हों से उठने वाले प्रदूषण से महिला और उसके बच्चों को सबसे बुरा और सबसे अधिक नुकसान पहुंचता है। अमरीका के प्रतिष्ठित बर्कले विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कर्क स्मिथ दो-दो नोबल पुरस्कारों में भागीदार रहे हैं, और भारत में वे आधी सदी से काम करते आए हैं, उनका यह निष्कर्ष है कि परमाणु बिजलीघर की इतिहास की आज तक की सारी दुर्घटनाओं को मिला दिया जाए, तो भी एक महीने में घरेलू चूल्हे से होने वाली मौतों का आंकड़ा वे नहीं छू सकते। लकड़ी या कोयले के चूल्हे से उठने वाला धुआं महिला और उसके बच्चों को खोखला करके रख देता है। यह देखने के बाद हैरानी होती है कि किस तरह भारत में महिला यह झेलते हुए भी पुरूष के मुकाबले औसत उम्र में खासी आगे है और तीन-चार बरस अधिक जीती है। पता नहीं इस धुएं से बचने के बाद वह महिला पांच-दस बरस अधिक उम्र न पा जाए।
नरेन्द्र मोदी की इस बात के लिए तारीफ की जानी चाहिए कि उन्होंने रसोई गैस पर संपन्न तबके की रियायत को छोडऩे के लिए लोगों का हौसला बढ़ाया, और एक करोड़ लोग इस रियायत को छोड़ चुके हैं। यह संख्या भारत की आबादी के मुकाबले बहुत बड़ी नहीं है, लेकिन यह सिलसिला एक सही दिशा में बढ़ रहा है, और हो सकता है कि मोदी का कार्यकाल खत्म होने तक चार-छह करोड़ लोग रियायत छोड़ चुके हों, और चार-छह करोड़ गरीब महिलाएं रसोई गैस पा चुकी हों।
जो राज्य जनता की अधिक फिक्र करते हैं, उन्हें चाहिए कि प्रधानमंत्री की लाई गई इस उज्जवला योजना पर अमल के लिए अपने राज्य में तेज रफ्तार से काम करें और सबसे गरीब महिलाओं को, ग्रामीण महिलाओं को इसका फायदा पहुंचाएं। छत्तीसगढ़ में घरेलू लकड़ी-कोयले से चूल्हे को बदलने की बहुत जरूरत थी, और रमन सरकार ने राज्य की तरफ से और रियायत जोड़ते हुए जिस तरह दो सौ रूपए में गैस चूल्हा और सिलेंडर देने की शुरुआत आज से की है, उस घोषणा के मुताबिक अगर 25 लाख गरीब परिवारों को गैस चूल्हा मिल जाता है, तो इसका मतलब 25 लाख छत्तीसगढ़ महतारियों की जिंदगी में जमीन आसमान सा फर्क लाना होगा, और कम से कम 50 लाख बच्चों की जिंदगी पर से प्रदूषण के बादल छंटेंगे। यह काम शायद रियायती चावल के बाद छत्तीसगढ़ के गरीबों के लिए सबसे बड़ा काम होगा, और कल से इस पर एक बहस छिड़ी है कि इसका सत्तारूढ़ पार्टी को राजनीतिक फायदा होगा या नहीं। हमारा यह मानना है कि सत्ता पर रहने वाली पार्टी को अपने सरकारी फैसलों से अगले चुनावों में नफा भी होता है, और नुकसान भी होता है। लेकिन इस राजनीतिक गणित से परे भी सरकार को जनकल्याण की अपनी जिम्मेदारी पूरी करना चाहिए, और छत्तीसगढ़ में जिस तरह से बहुत ही रियायती चावल की वजह से गरीब दो वक्त पेट भर खा पा रहे हैं, वह कोई छोटा काम नहीं है, और गरीबों का पेट भरने के साथ-साथ अगर भाजपा की पेटी में वोट भी भरते हैं, तो भारत का संसदीय लोकतंत्र तो ऐसा ही बनाया गया है। छत्तीसगढ़ में बहुत तेजी से गैस कनेक्शन दिए जाने चाहिए, ताकि प्रदूषण से महिलाओं की सेहत पर पडऩे वाला नुकसान खत्म हो सके।
हमारा यह भी मानना है कि राज्य सरकारों को भी केन्द्र सरकार की इस योजना में मदद करने के लिए अपने-अपने इलाकों में रसोई गैस रियायत की बाजारू और कारखानों की चोरी को रोकना चाहिए, जो कि आज धड़ल्ले से जारी है। बाजार में लोग मशीनें लगाकर रियायती गैस को कारोबारी सिलेंडरों में भरते हैं और बड़े पैमाने पर रियायत की चोरी करते हैं। गरीबों के लिए तय की गई ऐसी रियायत की चोरी पर सजा कड़ी की जानी चाहिए, और राज्य सरकारों को अपनी जिम्मेदारी अधिक गंभीरता से निभानी चाहिए।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें