आज आजादी के जलसे से अधिक फिक्र की जरूरत

संपादकीय
14 अगस्त  2016
किसी भी मौके की सालगिरह बहुत सी अच्छी-बुरी यादों को लेकर आती है, और यह भी याद दिलाती है कि उस मौके से लेकर अब तक का सफर कैसा रहा है, कहां से कहां तक पहुंचे हैं। भारत की आजादी की सालगिरह कम मायने नहीं रखती है। एक से अधिक पीढिय़ों ने अपना घरबार छोड़कर, अपनी जिंदगी का मोह छोड़कर, कामकाज और अपनी जायदाद की फिक्र छोड़कर एक ऐसी अंग्रेज हुकूमत की जेल जाना पसंद किया था, जिसके अंत होने का कोई आसार नहीं था। और उस वक्त तो अंग्रेजी हुकूमत के बारे में यह कहा जाता था कि अंग्रेज-राज में कभी सूरज नहीं डूबता। और वह बात इस गोल दुनिया के नक्शे में सही भी थी कि जब तक अंग्रेजी-राज के किसी एक हिस्से में सूरज डूबता था, तो उसके पहले ही उसके दूसरे हिस्से में सूरज उग चुका रहता था। ऐसे सर्वशक्तिमान राज के खिलाफ जिन लोगों ने अपना सब कुछ कुर्बान करके आजादी की लड़ाई लड़ी थी, उनके बारे में महज इतिहास की किताबों में लिखा जाना काफी नहीं है, और यह सोचना भी आज जरूरी है कि वे कैसे लोग थे, और क्या आज उनकी परछाई जितनी शहादत को भी हिन्दुस्तानी तैयार हैं?
लेकिन सालगिरह के मौके पर जब आज के हालात देखें, तो यह भी लगता है कि यह आजादी है किसके लिए? आज अगर हिन्दुस्तान में कोई दलित है, कोई आदिवासी है, कोई अल्पसंख्यक है, कोई गरीब है, तो क्या उनके लिए आजादी वैसी ही अहमियत रखती है जैसी कि अहमियत किसी गैरदलित-आदिवासी, गैरअल्पसंख्यक, संपन्न और ताकतवर के लिए रखती है? जब इस फर्क को देखें तो लगता है कि आजादी इस देश के लोगों को चुन-चुनकर मिली है, और चुन-चुनकर लोगों को इससे दूर भी रखा गया है। आज जिस तरह महिलाओं को छांट-छांटकर बलात्कार से लेकर टोनही-आरोप की हत्या का शिकार होना पड़ता है, तो उससे समझ आता है कि आजादी मर्दोंं को तो मिल गई है, बच्चियों से लेकर औरतों तक को नहीं मिल पाई है। आज देश की अदालतों में जिस तरह एक गरीब और एक अमीर के बीच के किसी मुकदमे में सारा का सारा इंसाफ अमीर या राजनीतिक रूप से ताकत रखने वाले की तरफ झुका हुआ दिखता है, उससे समझ आता है कि सत्तर बरस के इस आजाद भारत में आजादी किसे मिली है, और किससे छिन गई है। बहुत से लोगों को देखें तो ऐसा लगता है कि अंग्रेजों के राज में जिस तरह किसी को भी आजादी नहीं थी, उसी तरह आज कई तबकों को आजादी नहीं है, और कुछ चुनिंदा तबकों को ही इन सत्तर बरसों में आजादी की ताकत मिल पाई है।
सालगिरह का मौका जलसे का तो रहता है, लेकिन इस मौके पर एक आत्मविश्लेषण और आत्ममंथन भी होना चाहिए। और यह इसलिए जरूरी है कि बस्तर जैसे कई आदिवासी इलाकों में जिस तरह गरीब और कमजोर आदिवासियों को खुद होकर, या उनके हक के लिए नक्सलियों को हथियार उठाने पड़ रहे हैं, तो वह भी देश की आजादी की भावना की नाकामयाबी का एक संकेत और सुबूत है। जिस तरह आज देश भर में दलितों को मारा जा रहा है, और एक सवर्ण-अल्पसंख्यक तबके की गौभक्ति का राज देश पर हिंसा के साथ लादा जा रहा है, उससे दलित तबकों के बीच लोकतंत्र की नाकामयाबी जाहिर है। ऐसा ही हाल कई जगहों पर अल्पसंख्यकों के साथ हो रहा है, और यह बात तय है कि ऐसी तमाम लोकतांत्रिक-असफलताओं के चलते हुए देश को एक विकसित और सफल राष्ट्र बताना अपने आपको झांसा देना है। देश में आसमान छूती इमारतों, और आसमान पर तने हुए पुल-पुलिया बना देने से देश विकसित नहीं हो जाता। एक देश और लोकतंत्र को विकसित होने के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों का विकास जरूरी होता है, और जब तक इस देश के कानून का इस्तेमाल तमाम लोगों को बराबरी का हक देने के लिए नहीं हो सकेगा, तब तक यह लोकतंत्र कामयाब नहीं कहा जा सकता। आज आजादी की सालगिरह के मौके पर इतिहास को याद करके, उस पर गौरव करके, भविष्य के लिए बड़ी-बड़ी बातें की जाएंगी, लेकिन आज वर्तमान में भारत में लोकतंत्र का जो हाल है, उससे जब यह लगता है कि बाबा नागार्जुन के शब्दों में, यह किसकी जनवरी है, और किसका अगस्त है, और फिर जब अदम गोंडवी के शब्दों में यह लगता है कि सौ में सत्तर आदमी इस मुल्क में जब बदहाल हैं, तो आजादी के मायनों को एक बार फिर समझने की जरूरत लगती है। इस मुद्दे पर अंतहीन लिखा जा सकता है, और इस देश की अंतहीन मिसालें गिनाई जा सकती हैं, लेकिन जैसा कि एक वक्त कहा जाता था कि चिट्ठी को तार समझना, वरना बीमार को पार समझना.., इसी तरह आज भारतीय लोकतंत्र को अपने इस हाल-बदहाल पर फिक्र करने की जरूरत है।

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