मोदी की पाकिस्तान-नीति रोलर-कोस्टर पर सवार...

संपादकीय
16 अगस्त  2016
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की आजादी की सालगिरह पर लालकिले से सालाना जलसे के भाषण में पाकिस्तान के बलूचिस्तान का जिक्र किया, और वहां से जो लोग मोदी की तारीफ कर रहे हैं, उनका शुक्रिया अदा किया। उन्होंने बलूचिस्तान के साथ-साथ पाकिस्तान के गिलगिट और पाक-अधिकृत कश्मीर के लोगों का बहुत आभार माना। उनकी इन बातों को सुनकर भारत और पाकिस्तान के रिश्तों को बारीकी से देखने-समझने वाले लोगों के बीच बड़ी हैरानी हुई है और कुछ लोगों का यह भी मानना है कि नरेन्द्र मोदी अपने इस कार्यकाल में पाकिस्तान के साथ अब रिश्ते सुधारने के मामले में कुछ भी नहीं कर सकते। जिस बलूचिस्तान से भारत का कोई सीधा रिश्ता नहीं है, और वहां के अलगाववादी नेताओं के साथ पाकिस्तान की सरकार के खींचतान के संबंध चल रहे हैं, जिस तरह बलूचिस्तान में एक हथियारबंद संघर्ष चल रहा है, पाकिस्तान के उस आंतरिक मामले में भारतीय प्रधानमंत्री का ऐसे मौके के भाषण में कुछ कहना भारत-पाक के बातचीत के रिश्तों को खत्म कर देने के खतरे के बिना नहीं है।
बलूचिस्तान की स्थानीय पार्टियां और वहां के कई नेता पाकिस्तान से अलग एक स्वायत्तता की लड़ाई लड़ रहे हैं, और अगर देखा जाए तो एक वक्त ऐसी ही कुछ मांग लेकर भारत-पाक सरहद पर बसे हुए पाकिस्तान में खालिस्तानी लोग ऐसा ही कर रहे थे। उस वक्त अगर पाकिस्तान की सरकार खालिस्तानियों की हिमायत की कोई बात करती तो उसे साफ-साफ भारत के घरेलू मामले में दखल करार दिया जाता। और आज पाकिस्तान ने ऐसा ही किया है। फिर जैसा कि कांगे्रस पार्टी के कुछ नेताओं ने ध्यान दिलाया है, भारतीय प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान के एक घरेलू मामले में दखल देकर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के हिस्से पर भारत के दावे को भी कमजोर कर दिया है, क्योंकि एक घरेलू मामले में दखल की वजह से दूसरा मामला भी घरेलू और दखल के दर्जे में आ जाएगा। लोगों का यह मानना है कि इससे भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर बातचीत में भारत का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है, और इन दोनों देशों के बीच तनाव में दिलचस्पी रखने वाली ताकतों को इससे जरूर खुशी होगी, लेकिन हमारा यह मानना है कि भारत से इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा, और यह नुकसान जरूर होगा कि वह पड़ोसी देशों के घरेलू मामलों में दखल देता है, जो कि भारत की अब तक की घोषित पड़ोसी-विदेशी नीति के ठीक खिलाफ है।
नरेन्द्र मोदी ने शपथ लेने के दिन जिस तरह पड़ोस के सारे शॉर्क देशों को न्यौता दिया था, और जिस तरह पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी दिल्ली आए थे, उससे लोगों को हैरानी भी हुई थी और उम्मीद भी बंधी थी। इसके बाद छिटपुट वारदातों के चलते हुए भी मोदी सरकार ने न सिर्फ बर्दाश्त दिखाया था, बल्कि नवाज शरीफ की सालगिरह पर मोदी अचानक पाकिस्तान पहुंच भी गए थे, और उसे भारत-पाक संबंधों में एक भूचाल जैसा मामला माना गया था। लेकिन यह सरकार अपने कार्यकाल के बीच ही जिस तरह से अपने रूख में यह अप्रत्याशित और अवांछित बदलाव ला रही है, वह रोलर-कोस्टर के सफर जैसा लग रहा है, जिसमें मशीनी-मोटर से चलने वाले आसमान तक पहुंचने वाले हवाई झूलों पर लोग कभी ऊपर ले जाए जाते हैं और कभी नीचे लाए जाते हैं। भारत और पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति, परस्पर रिश्ते, और दोनों देशों में हिंदू और मुस्लिम समुदायों के संबंध पर भी भारत-पाक रिश्तों की छाया तरह-तरह से पड़ती है। ऐसे में भारतीय प्रधानमंत्री का यह नया रूख और ऐसे हमलावर तेवर हक्का-बक्का करने वाले हैं, और हमारे हिसाब से इससे उन्होंने अपने बाकी कार्यकाल की पाक-संभावनाओं पर पानी भी फेर दिया है।

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