उप्र में बाप-बेटे की कुश्ती समाजवाद है या नूराकुश्ती?

संपादकीय
17 अगस्त  2016
चुनाव के मुहाने पर खड़े हुए उत्तरप्रदेश को लेकर सारे राजनीतिक दल इन दिनों कुछ अधिक चौकन्ना हैं, और इसी वजह से देश में दलितों का मुद्दा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी इतनी अहमियत का माना, कि अपनी चुप्पी तोड़कर बड़ी भारी बात दलितों की हिमायत में कही। लेकिन दो दिन पहले आजादी की सालगिरह के मौके पर उत्तरप्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के मालिकनुमा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने अपनी पार्टी के मंत्रियों और अपने मुख्यमंत्री-बेटे से अपनी नाराजगी मंच और माईक से जिस अंदाज में जाहिर की है, उसके मतलब निकालना थोड़ा मुश्किल है।
एक ऐसे प्रदेश की ऐसी पार्टी कि ऐसी सरकार जो कि पूरी की पूरी घर पर खाने की मेज से चलाई जा सकती है, उसमें बाप-बेटे माईक और इंटरव्यू के रास्ते एक-दूसरे से बात करें, और चाचा किसी पार्टी का सपा में विलय करे, भतीजा उसे खारिज करे, यह सब एकता कपूर के किसी घरेलू ड्रामा वाले सीरियल की तरह का है। मुलायम सिंह यादव हर कुछ महीने में अपने बेटे की सरकार के लोगों के खिलाफ, मंत्रियों के खिलाफ इतना कुछ कहते हैं जो कि उत्तरप्रदेश में सांप-नेवले जैसे सत्ता-विपक्ष में विपक्ष भी नहीं कहता है। अब इसके क्या मतलब निकाले जाएं? क्या बेटा पूरी तरह बेकाबू है, और बेटे की सरकार उस बेटे से बेकाबू है? और क्या समाजवाद का नाम लेकर राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव अपने पुत्रमोह के आगे बेकाबू हैं? उत्तरप्रदेश के इस हाफ सेंचुरी वाले कुनबे में सब कुछ बेकाबू लग रहा है। इस कुनबे के 48 से अधिक लोग केंद्र और राज्य की राजनीति में हैं, और मुलायम के समधी लालू का कुनबा देश का दूसरा सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा है, ऐसे में अगर अपना घर काबू में नहीं है, तो घर से चलता लोकतंत्र आखिर जा किधर रहा है?
जिस उत्तरप्रदेश ने देश को लगातार इतने प्रधानमंत्री दिए, शायद पिछले सत्तर बरस में से पैंतालीस से अधिक बरस उत्तरप्रदेश के ही प्रधानमंत्री रहे, और जो मुलायम सिंह यादव खुद प्रधानमंत्री पद के घोषित-अघोषित  प्रत्याशी माने जाते रहे हैं, और जिनकी महत्वाकांक्षा, और संभावना भी जगजाहिर है, वैसे मुलायम को अगर अपने ही बेटे और अपनी ही पार्टी की सरकार के मंत्रियों में से दो-चार को छोड़कर तमाम मंत्री भ्रष्ट और भूमाफिया दिख रहे हैं, तो फिर उत्तरप्रदेश में विपक्ष की जरूरत क्या है? सुना है कि एक वक्त मुलायम कुश्ती के भी शौकीन थे, और अखाड़े में भी हाथ आजमाते थे, ऐसे में वे घर पर ही बेटे से दो-दो हाथ करके यह फैसला क्यों नहीं कर लेते कि उत्तरप्रदेश की सरकार बाप की पार्टी के हिसाब से चलेगी, या कि बेटे के मंत्रियों की मर्जी से?
उत्तरप्रदेश की राजनीति में यह विशाल विरोधाभास देश में समाजवाद के भविष्य की संभावनाओं के लिए भी खतरनाक है, और उत्तरप्रदेश के विकास के लिए भी। चुनाव के कुछ महीने पहले जबकि पार्टी की सरकार टीवी और अखबारों में करोड़ों-अरबों के इश्तहार देकर अपने कामकाज की वाहवाही कर रही है, तब अगर पार्टी का मुखिया पार्टी की सरकार की बदहाली को मंच और माईक से कह रहा है, तो यहां के चुनावी नतीजों का आसार साफ दिखता है। हमें इस कुनबे की जरा भी फिक्र नहीं है, लेकिन जिस समाजवाद के नाम पर यह कुनबा राजनीति करता है, समाजवाद के उस नाम के डूबने की तकलीफ हमें जरूर है। फिलहाल बाप-बेटे के बीच यह एक दिलचस्प मुकाबला है, और इसका नतीजा उत्तरप्रदेश में वोटों की गिनती के साथ ही निकल पाएगा।

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