राखी और साक्षी

संपादकीय
18 अगस्त  2016
इस वक्त जब हिंदुस्तान के अधिकतर हिस्से में लोग राखी मना रहे हैं, तब निजी खुशी के इस त्यौहार के साथ-साथ एक और खुशी जुड़ गई है, ओलंपिक में भारत के लिए पहला पदक पाने वाली कुश्ती की खिलाड़ी साक्षी मलिक। उसने सवा करोड़ से अधिक आबादी को खुश होने का एक मौका दिया है, और आज ही शाम तक एक जिस दूसरे भारतीय खिलाड़ी से किसी पदक की उम्मीद की जा रही है, वह भी एक महिला ही है। लेकिन इस जीत पर आज लिखने की जरूरत इसलिए हो रही है कि साक्षी मलिक उस हरियाणा की रहने वाली है जहां पर खाप पंचायतें लड़कियों और महिलाओं का हौसला तोडऩे के लिए सौ-सौ किस्म की तरकीबें करती हैं, और जहां पर हजार लड़कों के पीछे 877 लड़कियों का ही अनुपात है। इसी देश में केरल में हजार लड़कों पर हजार से अधिक लड़कियों का अनुपात भी है, और यह जाहिर है कि कन्या भू्रण हत्या से लेकर कुछ और किस्म की तरकीबों से हरियाणा में लड़कियों को कुचलकर खत्म किया जाता है। लेकिन आज ओलंपिक में किसी एक प्रदेश से सबसे अधिक लड़कियां पहुंची हुई हैं, तो वे शायद हरियाणा से ही हैं।
अब यह बात हरियाणा की छवि के लिए बड़ी ही रहस्यमय और विरोधाभासी है कि उसी राज्य में लड़कियां खेलकूद में इतनी आगे निकलती हैं, और समाज में इतनी कुचली जाती हैं। अगर वहां पर लड़कियों को बराबरी का दर्जा मिले, तो वे लड़कियां किस तरह और ऊंचे आसमान पर पहुंच सकती हैं। लेकिन यह हाल महज हरियाणा का नहीं है, आज जिस तरह देश भर में राखी मनाई जा रही है, उसे देखकर हम सोच रहे हैं कि भारतीय समाज में लड़कियों और महिलाओं की हालत क्या साल में एक दिन राखी बंधवाकर उन्हें रक्षा का वचन देने से सुधर सकती है? और आज ही मथुरा में जिंदगी का आखिरी लंबा दौर गुजारती विधवा महिलाओं की तस्वीर लेकर आया है कि वे किस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर वाली राखियां लेकर बैठी हैं, और खबर यह कहती है कि वे हिंदू ब्राम्हण-पंडितों, या हिंदू धर्म गुरुओं को ये राखियां बांधेंगी। अब सवाल यह उठता है कि जिस हिंदू धर्म में पति के गुजर जाने के बाद एक महिला को इस तरह विधवा का दर्जा देकर नर्क सी जिंदगी दी है, उसी हिंदू धर्म के ठेकेदारों को रक्षाबंधन बांधकर  ये महिलाएं और ये समाज आखिर क्या हासिल कर सकते हैं? धर्म ने तो हमेशा से ही महिलाओं को गैरबराबरी का सबसे नीचे का दर्जा दिया है, फिर चाहे वह हिंदू धर्म में सती बनाना हो, मंदिरों से महिलाओं को रोकना हो, या फिर इस्लाम में महिलाओं को मस्जिद-दरगाहों से रोकना हो, या फिर ईसाई धर्म में महिला को पादरी और पोप न बनने देना हो। तकरीबन तमाम धर्मों में महिलाएं गैरबराबरी का सामना करती हैं, और हरियाणा जैसे राज्य में भी लड़कियां धर्म और जाति के थोपे हुए दकियानूसी पाखंडों का बोझ ढोती हैं, जहां किसी लड़की को ही उस पर होने वाले बलात्कार के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
राखी या रक्षाबंधन का यह मौका ओलंपिक के इन नतीजों के साथ मिलकर यह सोचने लायक भी है कि जब किसी लड़की या महिला को बराबरी का मौका मिलता है, तो वह कल्पना चावला या सुनीता विलियम्स की तरह अंतरिक्ष में भी पहुंच सकती हैं, इंदिरा की तरह बांग्लादेश बना सकती है, या सवा करोड़ से अधिक आबादी के देश के लिए पहला ओलंपिक पदक पाकर देश को शर्मिंदगी से भी बचा सकती है। चिकित्सा विज्ञान भी यह बताता है कि एक महिला किसी पुरुष के मुकाबले अधिक मजबूत होती है, और जो देश महिलाओं की ऐसी ताकत का बराबरी से इस्तेमाल नहीं करते वे पीछे ही रहते हैं। हरियाणा की ही बात करें जहां पर कि लड़कियों का अनुपात इतना घट गया है कि लोगों को अपने लड़कों के लिए दुल्हनें मिलना मुश्किल हो रहा है, और दूसरे प्रदेशों से दुल्हनें खरीदकर लाने की खबरें आती हैं, वहां की लड़कियां देश-विदेश के मुकाबलों से अपने प्रदेश के लिए सम्मान लेकर आती ही रहती हैं। लगे हाथों एक दूसरे पहलू पर भी बात करने की जरूरत है, कि रियो में भारत के लिए पहला ओलंपिक पदक पाने वाली साक्षी मलिक एक बस कंडक्टर की बेटी है, तो यह जाहिर ही है कि वह गरीबी में बड़ी हुई होगी, और फिर भी उसने सामाजिक गैरबराबरी को अपनी कुश्ती के दांव से चारों खाने चित्त कर दिया है। अगर सामाजिक असमानता की ऐसी रूकावटें न रहें, तो इतनी बड़ी आबादी वाले देश अपने लोगों के बल पर एक पर दूसरे को खड़ा करते हुए भी चांद और मंगल तक पहुंच सकता है।

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