दुनिया में इन बच्चों का कोई भी रखवाला नहीं

संपादकीय
19 अगस्त  2016
सीरिया में चल रही फौजी लड़ाई के बीच पिसे हुए एक छोटे बच्चे की बमबारी की धूल और खून से सनी हुई तस्वीर दुनिया भर में तैर रही है, और यह याद दिला रही है कि किस तरह कुछ महीने पहले सीरिया छोड़कर जा रहे लोगों का एक बच्चा समंदर के किनारे रेत पर मरा मिला था। उस तस्वीर ने भी दुनिया को हिलाया था, और इस तस्वीर ने भी। सीरिया और यमन जैसे इस्लामी-आतंक, हथियारबंद-बगावत, और तरह-तरह के गृहयुद्ध से गुजरते हुए देशों में एक बात जो एक सरीखी सामने आ रही है, वह यह कि हर जगह बच्चों पर लड़ाई का जुल्म देखने मिल रहा है। वे बमबारी और धमाकों में मारे भी जा रहे हैं, उनके शरीर के अंग निकालकर मेडिकल-बाजार में बेचे भी जा रहे हैं, उनको गुलाम बनाकर सेक्स-बाजार में नीलाम भी किया जा रहा है, और उनके हाथों में बंदूकें थमाकर उन्हें मोर्चे पर भी उतारा जा रहा है।
इसी के साथ-साथ भारत के नक्सली इलाकों से निकली हुई एक नई या पुरानी तस्वीर सामने आई है जिसमें नक्सलवर्दी में एक बड़ा छोटा सा बच्चा दिखाई पड़ रहा है। इससे पहले भी कुछ ऐसे वीडियो नक्सलियों के बनाए हुए ही सामने आए थे, जिनमें किसी हमले के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों की लाशों के पास से हथियारों को उठाने के लिए वे बच्चों का इस्तेमाल कर रहे हैं। आज पूरी दुनिया में जगह-जगह बाल सैनिकों का चलन हो गया है, और जहां पर न अपने देश का कानून चलता है, और न ही संयुक्त राष्ट्र का कोई काबू रह गया है, वहां पर अफ्रीकी देशों से लेकर छत्तीसगढ़ और झारखंड तक बच्चों के हाथों में हथियार थमाए जा रहे हैं। और तो और, मानवाधिकार का सबसे बड़ा रखवाला बनने वाला अमरीका अपनी एक ऐसी समाचार एजेंसी को बर्दाश्त करता है, काम की इजाजत देता है, जो कि सीरिया में एक किशोर फोटोग्राफर को लड़ाई की तस्वीरें लेने में लगाकर रखता है, और खुलकर उन तस्वीरों को उसके नाम के साथ दुनिया भर में बेचता है, और वह लड़का ऐसी खतरनाक-फोटोग्राफी करते हुए मारा भी जाता है। लेकिन इस पर इस विकसित पश्चिमी दुनिया में हाय-तौबा नहीं होती।
दरअसल सरकारों से परे के अंतरराष्ट्रीय संगठन अपनी ताकत खो बैठे हैं। संयुक्त राष्ट्र से लेकर अंतरराष्ट्रीय अदालत तक किसी का कोई काबू किसी देश पर नहीं है, और हाल के दशकों में इसकी सबसे बुरी और सबसे बड़ी मिसाल अमरीका-ब्रिटेन की अगुवाई वाले गिरोह का इराक पर हमला था, जिसके खिलाफ संयुक्त राष्ट्र में बार-बार मना किया था, और बुश-ब्लेयर जैसे युद्ध-अपराधियों ने किसी की नहीं सुनी थी। जो हिन्दुस्तान में सदियों से कही जा रही बात है, समरथ को नहिं दोस गुसाईं, जिसके हाथ में ताकत है, उसकी मर्जी और उसकी कही हुई बात दुनिया का कानून है। इसलिए अमरीका की गुंडागर्दी के सामने दुनिया के किसी सभ्य संगठन का कोई बस नहीं चलता, और अफगानिस्तान या इराक, पाकिस्तान के कबायली इलाके, तो नई बात हैं, दशकों पहले वियतनाम पर अमरीकी बमबारी और नापाम बमों से जलते हुए इलाकों के बीच चीखती हुई दौड़ती वह बिना कपड़ों की बच्ची आधी-चौथाई सदी से दुनिया में बच्चोंं पर जुल्म का एक प्रतीक-फोटो बनी हुई आज भी लोगों की याद में घूमती है।
दुनिया में बच्चों का नाम लेकर बातें तो कई तरह की जाती हैं, लेकिन सरकारों से लेकर कारोबारों तक किसी की भी दिलचस्पी सचमुच में बच्चों को बचाने की दिखती नहीं है, बच्चे चर्चा के लिए अच्छा मुद्दा तो हैं, लेकिन बचाने के लिए खर्चा करने का सामान नहीं हैं। एक वक्त जिस तरह रेडक्रॉस के अधिकारों को बहुत से देशों ने अपनी संसदों में कानून बनाकर मान्यता दी थी, उस तरह की मान्यता संयुक्त राष्ट्र के बाल-संगठन यूनिसेफ को कभी मिली भी नहीं थी, और अब तो कोई संभावना दिखती भी नहीं है। दुनिया में अपने आपको लोकतंत्र के सबसे बड़े रखवाले साबित करने पर आमादा विकसित और संपन्न देश अपने बच्चों के लिए एक अलग कानून रखते हैं, और बाकी दुनिया के बच्चों को बाल मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति, बाल सैनिक, और बमबारी झेलने वाले बच्चों की तरह मान कर चलते हैं। इसलिए आस्थावान लोग आज यह कह सकते हैं कि ऐसी दुनिया में बच्चों का ईश्वर ही रखवाला है। दूसरी तरफ हकीकत को बेहतर समझने वाले नास्तिक यह जानते हैं कि दुनिया में ऐसा कोई ईश्वर नहीं है जो ऐसे बच्चों की फिक्र करे, इसलिए इन बच्चों का कोई भी रखवाला नहीं है।

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