उग्र राष्ट्रवाद से घायल अंग्रेजी का ज्ञान बढ़ाने की जरूरत

संपादकीय
2 अगस्त  2016
छत्तीसगढ़ में आज एक सामाजिक संगठन ने स्कूली बच्चों के लिए गणित और अंग्रेजी में मदद करने वाली किताब व अन्य सामग्री की किट बांटना शुरू किया है। मुख्यमंत्री की मौजूदगी में यह कार्यक्रम हुआ, और उन्होंने कहा कि प्राइमरी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधार की जरूरत है। प्राइमरी स्कूलों में बेहतर शिक्षा से बच्चों में आगे बढऩे की इच्छा शक्ति बनती है। हम अभी इस संगठन के काम के बारे में नहीं जानते और यह पता नहीं है कि यह किट कितनी उपयोगी है, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि स्कूलों में अंग्रेजी की कितनी जरूरत है। हम पहले भी इस बारे में लिखते हैं कि स्कूलों और कॉलेजों में बाकी तमाम बातों के साथ-साथ बेहतर अंग्रेजी की बहुत जरूरत है, और स्कूल-कॉलेज की इमारतों में खाली घंटों में बेरोजगारों को भी अंग्रेजी सिखाने की जरूरत है।
राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नाम पर, राष्ट्रभाषा के नाम पर जो लोग एक उन्माद फैलाने की कोशिश करते हैं, वैसे बहुत से लोगों के अपने बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ते हैं, और हम नाम गिनाना नहीं चाहते, लेकिन ऐसे बहुत से नेताओं के बच्चे ईसाई स्कूलों में भी पढ़ते हैं जिनके खिलाफ वे धर्मांधता फैलाने की कोशिश करते रहते हैं। हमारा तो यह मानना है कि भाषा महज एक औजार होती है, और उसका जो बखूबी इस्तेमाल कर ले, वही उस भाषा का सम्मान है, वरना पूरी जिंदगी हिन्दी सेवक का तमगा लगाकर घूमने वाले गुजर चुके छत्तीसगढ़ के विधानसभाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला ने सरकारी बंगले का नाम स्पीकर हाऊस रखवाया, जो कि आज भी जारी है। और छत्तीसगढ़ में कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नाम पर बरसों से एक राष्ट्रवादी पत्रकारिता का नारा बुलंद किया जा रहा है, वहां से लोग पत्रकार बनकर तो नहीं निकल रहे, लेकिन देश भर से छांटकर बुलाए गए लोगों के प्रवचन सुन-सुनकर हो सकता है कि राष्ट्रवादी-गैरपत्रकार जरूर बन गए हों। ऐसे विश्वविद्यालय ने अभी पिछले कुछ हफ्तों में दाखिले के जो इश्तहार छत्तीसगढ़ के अखबारों में छपवाए हैं वे सारे के सारे अंग्रेजी में हैं। छत्तीसगढ़ की तमाम आबादी हिन्दी पढऩे और समझने वाली है, और इस विश्वविद्यालय की पढ़ाई हिन्दी में है, इसके बावजूद इस स्वघोषित राष्ट्रवादी विश्वविद्यालय के इश्तहार अंग्रेजी में छप रहे हैं। हम इसके भी खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जो लोग अंग्रेजी के रास्ते कमाते-खाते हैं, जो अंग्रेजी पढऩे अपने बच्चों को भेजते हैं, वे भी आम आबादी के राष्ट्रभाषा के झांसे में रखते हैं।
आज दुनिया में संपर्क की जो भाषा भारतीय उपमहाद्वीप के काम की है, वह अंग्रेजी ही है। अंग्रेजी हटाओ आंदोलन, या अंग्रेजी का विरोध पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों का नुकसान करते आ रहे हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, और कोई देश अपनी भाषा की वजह से सम्मान नहीं पाता, अपनी भाषा बोलने वालों की कामयाबी से, उनकी महानता से सम्मान पाता है। आज राष्ट्रवाद, राष्ट्रभाषा और गौभक्ति का नाम लेकर धार्मिक और साम्प्रदायिक हिंसा और उन्माद फैलाकर किसी तरह का सम्मान नहीं पाया जा सकता। इसलिए अंग्रेजी जरूरी है, और इसे सरकार करे या सामाजिक संगठन, यह काम छत्तीसगढ़ में होना चाहिए। आज देश के जिन प्रदेशों के लोग दुनिया भर में पहुंचकर आगे बढ़ते हैं, उनकी तरक्की में एक बड़ा योगदान अंग्रेजी भाषा का भी है, और छत्तीसगढ़ के बच्चों और नौजवानों को इसे एक अनिवार्य हुनर के रूप में दिया जाना चाहिए। 

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