यह ताजा आत्मगौरव एक श्मशान-वैराग्य बनकर न रह जाए

संपादकीय
20 अगस्त  2016
बैडमिंटन में एक नया इतिहास रचकर भारत की पी.वी. सिंधु ने देश का सिर ऊंचा कर दिया है, और उन तमाम लोगों का मर्दाना घमंड चकनाचूर कर दिया है जो कि हिन्दुस्तानी लड़कियों और महिलाओं को घरेलू कामवाली बनाकर रखना चाहते हैं। ऐसा चाहने वालों में देश के कई दिग्गज हैं, जिन्होंने पिछले महीनों में लगातार सार्वजनिक बयान भी दिए हैं कि चूल्हा-चौका न करने वाली महिलाओं को उनके पति तलाक दे दें। दो दिन पहले हमने भारत की पहलवान साक्षी मलिक की जीत, और रियो ओलंपिक में भारत के पहले पदक के मौके पर इसी मुद्दे पर लिखा भी है कि किस तरह उस हरियाणा से एक लड़की निकलकर देश का सिर ऊंचा कर रही है जिस हरियाणा में हजार लड़कियों में से करीब सवा सौ को जन्म के पहले या बाद मारकर  प्रदेश में लड़़के-लड़कियों का अनुपात चौपट कर दिया गया है। हमने उन कुख्यात खाप पंचायतों के खिलाफ भी लिखा है कि किस तरह वे लड़कियों के जींस पहनने से लेकर उनके मोबाइल फोन तक के खिलाफ फतवे जारी करती हैं, और ऐसे लड़की विरोधी माहौल के बीच भी कुछ लड़कियां पूरे देश से आगे बढ़कर दिखा देती हैं।
अब जब भारत के अब तक के मिले हुए दोनों पदक लड़कियों ने हासिल किए हैं, और बैडमिंटन में पी.वी. सिंधु ने विश्व के दसवें नंबर की खिलाड़ी रहते हुए जिस अंदाज में हर किसी को शिकस्त देते हुए विश्व की पहले नंबर की खिलाड़ी को भी एक-एक सेट की बराबरी के बाद तीसरे सेट तक ले जाने का दम-खम दिखाया है, तो आज पूरा देश कुछ चौंककर, कुछ हड़बड़ाकर, और कुछ शर्मिंदगी में देश की लड़कियों की तरफ चाहे पल भर के लिए ही सही, तारीफ की नजरों से देख रहा है। इस देश के लिए यह मौका महिलाओं का सम्मान सीखने का एक मौका भी हो सकता है, और जिस देश में अधिकतर पार्टियों के बड़े-बड़े नेता महिलाओं के खिलाफ हिंसक और अश्लील बातें करते हैं, जहां पर अक्सर बलात्कार के लिए महिलाओं को ही जिम्मेदार ठहराते हैं, वहां पर महिला-गौरव का यह पल सामाजिक सोच में बदलाव फूंकने वाला हो सकता है। समाज के जिम्मेदार और इंसाफपसंद तबकों को इसका इस्तेमाल करना चाहिए, और ओलंपिक के बाद से लगातार इस देश में महिला-गौरव को सामाजिक मान्यता दिलाने की कोशिश करनी चाहिए।
भारत के इस बहुत ही जरूरी सामाजिक लैंगिक-असमानता के मुद्दे पर चर्चा करने के बाद अब थोड़ी सी चर्चा खेल पर भी होनी चाहिए कि किस तरह देश का एक शहरी फैशनेबुल तबका रियो ओलंपिक में गए हुए भारतीय खिलाडिय़ों का मखौल उड़ाने में जुट गया था कि सौ से अधिक खिलाडिय़ों को मुकाबलों में उतारकर भारत में बेवकूफी की, और भारत के खिलाड़ी ओलंपिक में जाकर सेल्फी लेकर हारकर आ जाते हैं। हम इस अखबार में किसी तरह के राष्ट्रवाद का समर्थन नहीं करते हैं, और हम लगातार राष्ट्रवाद के खिलाफ लिखते भी हैं। लेकिन खेलभावना के खिलाफ गैरखिलाड़ी शहरियों की ऐसी सोच को धिक्कारना इस देश की सरहदों से परे का काम भी है। खेल में जीत और हार को लेकर एक शर्मिंदगी उन्हीं लोगों को सूझ सकती है जिन्होंने कभी खेल के मैदान पर कोई मुकाबला नहीं किया है। जो लोग ओलंपिक तक पहुंचने की शर्त पूरी करते हैं, वे अपने देश में सबसे अव्वल दर्जे तक पहुंचने की मेहनत तो कर ही चुके रहते हैं। एक पुरानी कहावत है कि गिरते हैं घुड़सवार ही मैदान-ए-जंग में। जो लोग घोड़े पर चढ़ते नहीं हैं, वे ही लोग किसी को घोड़े से गिरते देखकर हॅंस सकते हैं। इसलिए हम भारत की बड़ी टीम के बिना मैडल लिए लौटने के शर्मिंदगी की बात नहीं मानते हैं, हम इसे और अधिक मेहनत के लिए सामने खड़ी हुई चुनौती मानते हैं।
तीसरी बात लगे हाथों यह कि इस देश में बहुत सा शहरी और संपन्न तबका तो ऐसा है जो कि आबादी को बोझ मानता है और भारत के विकास की राह में रोड़ा मानता है। हम न सिर्फ खेल के मामले में, बल्कि आज की अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के मामले में भी भारत की अधिक आबादी को मानव-शक्ति से भरपूर संभावना मानते हैं, न कि बोझ। इसलिए देश के लोगों को न सिर्फ खेलों में, बल्कि कामकाज में, और दुनिया में आने वाले बरसों में बढऩे वाली इंसानी-सेवाओं की जरूरतों को देखते हुए इस देश की संभावनाओं पर मेहनत करने की जरूरत केन्द्र और राज्य की सरकारों को है। पी.वी. सिंधु ऐसे ही पूरे देश का दिल, और ओलंपिक का रजत पदक नहीं जीत पाई, उसके पीछे उसके गुरू गोपीचंद की, और उनकी बैडमिंटन-एकेडमी की बड़ी लंबी मेहनत रही है। कल से टीवी पर यह एक बहस चल रही है कि गोपीचंद की यह एकेडमी इतनी तारीफ की हकदार है, या नहीं? कुछ लोगों का यह मानना है कि इस एकेडमी को देश में सबसे अधिक साधन-सुविधाएं मिल रही हैं, और यह दूसरे प्रशिक्षकों से चुनिंदा खिलाडिय़ों को उठाकर ले आती है, और फिर उन्हीं पर मेहनत करती है। हमारा मानना है कि देश में अलग-अलग खेलों के लिए ऐसे प्रशिक्षण संस्थान बनाने की साधन-सुविधा न सिर्फ केन्द्र और राज्य सरकारों के पास है, बल्कि बहुत से बड़े कारोबार भी अपने दम पर किसी एक खेल को बढ़ावा देने के लिए अलग-अलग राज्यों में अपनी पसंद से ऐसा बीड़ा उठा सकते हैं। आज पी.वी.सिंधु के साथ-साथ गोपीचंद एकेडमी के योगदान पर भी चर्चा हो रही है, और यह बाकी प्रशिक्षकों, बाकी प्रदेशों, बाकी खेलों, और बाकी कारोबारों के लिए भी एक चुनौती है कि वे ऐसी दूसरी मिसाल खड़ी करके दिखाएं। कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर यह भी ध्यान दिलाया है कि पी.वी. सिंधु की जीत की चर्चा करते हुए उसके प्रशिक्षक गोपीचंद को इतना अधिक श्रेय दिया जा रहा है कि ऐसा लग रहा है कि इस विजेता की मेहनत कम थी, उसके गुरू की मेहनत अधिक थी। लेकिन हमारा मानना है कि गुरू और शिष्या के बीच श्रेय के बंटवारे को लेकर कोई मतभेद शायद नहीं है, और ऐसी कोई भी जीत एक मिलीजुली कामयाबी ही होती है।
दो ओलंपिक के बीच में चार बरस का फासला होता है। और भारत में जितने प्रदेश हैं, ओलंपिक में करीब-करीब उतने ही खेल भी हैं, और इससे दो-चार गुना तो ऐसे कारोबार हैं ही जो कि एक-एक खेल का जिम्मा उठा सकते हैं। एक-एक प्रदेश एक-एक खेल का केन्द्र बनाया जाए, और कुछ कारोबार उन पर खर्च करें, तो न सिर्फ ओलंपिक या दूसरे अंतरराष्ट्रीय मुकाबलों के लिए बेहतर तैयारी हो सकती है, बल्कि देश के भीतर भी खेलों को बढ़ावा मिल सकता है। आज भारत के इस ताजा आत्मगौरव का मौका हो सकता है कि हमारी ऊपर लिखी तमाम बातों के लिए एक श्मशान-वैराग्य साबित हो, और अगले महीने से अगले चार बरस के लिए इसे बड़ी सहूलियत से भुला दिया जाए, लेकिन फिर भी हर बड़ी बात ऐसी आशंकाओं के बीच ही कभी न कभी शुरू हुई रहती हैं, और उसी उम्मीद के साथ हम आज की हिंदुस्तानी खुशी को स्थायी बनाने के लिए ये मुद्दे उठा रहे हैं। 

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