सच और जनधारणा के बीच बड़ा फासला हो सकता है...

संपादकीय
21 अगस्त  2016
भारत के सोशल मीडिया पर लगातार यह मजाक चलता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का एक पैर विदेशों में ही रहता है। फिर भारतीय संसद के भीतर भी यह बात लगातार उठती है कि मोदी अधिकतर विदेश ही रहते हैं। ऐसे में कल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी अपने ढाई साल के कार्यकाल में, पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मुकाबले विदेश यात्राओं में पीछे ही हैं। उन्होंने कांग्रेस के कमलनाथ के दिए हुए एक बयान पर कहा कि उन्हें सच्चाई पता नहीं है, और ढाई बरस में मनमोहन सिंह के मुकाबले नरेन्द्र मोदी कम बार विदेश गए। उन्होंने यह भी कहा कि जब मनमोहन सिंह विदेश जाते थे तो उनके दौरे ठंडे रहते थे, और किसी को यह पता ही नहीं चलता था कि वे कब गए, कब आए।
अगर अमित शाह की दी हुई जानकारी सही है, तो यह एक मिसाल है कि जनधारणा सच से कितने परे भी रह सकती है। आंकड़ों और तथ्यों को परखे बिना पहली नजर में तो ऐसा ही लगता है कि नरेन्द्र मोदी उनके पहले के किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री के मुकाबले अधिक बार और अधिक देश गए, और अधिक दिन देश के बाहर रहे। लेकिन अमित शाह ने जो बात सामने रखी है उससे लोगों को यह भी समझ आना चाहिए कि सार्वजनिक जीवन मेें जनधारणा हमेशा सच पर टिकी नहीं होती, और वह किस हद तक खतरनाक हो सकती है। लोग अपने मन की बात को सच मान बैठते हैं, और मासूमियत से या बदनीयत से फैलाए गए झूठ को भी सच मान बैठते हैं। सोशल मीडिया पर हम रात-दिन यह देखते हैं कि किस तरह लोग पूरी गैरजिम्मेदारी से किसी भी झूठ को आगे बढ़ाते चलते हैं, और उन्हें यह फिक्र भी नहीं रहती कि जो लोग इस झूठ को पकड़ लेंगे, उनके बीच उनकी साख कैसे गिरेगी, कितनी गिरेगी। यह सिलसिला आज बड़ा आम हो गया है कि अपने मकसद को पूरा करने के लिए कोई झूठ इतना फैलाया जाए कि वह सच लगने लगे।
जिन लोगों के लिए बाजार या सार्वजनिक जीवन, राजनीति या समाज सेवा, किसी भी तरह के दायरे में लोगों के बीच अपनी छवि को बनाए रखना मायने रखता है, उन्हें बहुत सावधान होकर काम करना पड़ता है, या करना चाहिए। और इस सावधानी में महज यह शामिल नहीं है कि लोग कितने सावधान रहें, कई तरह के हमले हर मुमकिन सावधानी के बाद भी हो सकते हैं। इसलिए आज कल दुनिया में बड़ा खर्च करने की ताकत रखने वाले लोगों के लिए इमेज-मेकिंग, या इमेज-बिल्डिंग करने वाली एजेंसियां भी काम करती हैं जो कि आपकी सार्वजनिक छवि को लोगों के सामने निखारकर रखती हैं। दूसरी तरफ कुछ ऐसी एजेंसियां भी काम करती हैं जो कि आपके इतिहास के कालिख लगे हिस्सों को इंटरनेट पर से हटाने की कोशिश करती हैं, ताकि जब आपके बारे में कोई जानकारी तलाशे, तो उसे बुरी जानकारियां न दिखें।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हाईवोल्टेज बिजली की तरह बड़ी चकाचौंध वाली राजनीति करते हैं, और वैसा ही सार्वजनिक जीवन जीते हैं। ऐसे में देश-विदेश में उनके आने-जाने और कार्यक्रमों की खबरें इतनी बनती हैं, और इतनी फैलती हैं कि उनके विदेश प्रवास हो सकता है कि असली कद के मुकाबले कई गुना अधिक बड़ी परछाईं की तरह अधिक दिखते हों। आज का वक्त नेताओं और कारोबारियों के लिए सार्वजनिक जीवन में बड़ी सक्रियता के बिना पूरा नहीं हो सकता। इसलिए परंपरागत मीडिया के अलावा लोगों को सोशल मीडिया पर भी अपने से जुड़े सच और झूठ का ख्याल करना चाहिए, इसके बिना बनी हुई जनधारणा के नुकसान पहुंचाने के खतरे बहुत रहते हैं, और फायदा पहुंचाने वाली तस्वीर दूसरे लोग कम ही बनाते हैं।

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