सात बरस की बच्ची पर बलात्कार, और खुदकुशी

संपादकीय
22 अगस्त  2016
राजस्थान के जोधपुर से दिल दहलाने वाली खबर है कि जब देश आजादी की सालगिरह मना रहा था, तो एक छोटी बच्ची स्कूल में खुशी-खुशी कार्यक्रम में भाग लेकर घर लौटी, और जब उसके मजदूर मां-बाप काम से घर लौटे तो वह फांसी पर टंगी मिली। सात बरस की बच्ची के पोस्टमार्टम से अब जाहिर हुआ है कि उसके साथ बलात्कार हुआ था, और इस मामले में पड़ोस का ही एक 14 बरस का लड़का पकड़ाया है।
यह देश रहने के लिए एक भयानक जगह हो गया है। छोटे-छोटे बच्चे न सिर्फ बलात्कार का शिकार हो रहे हैं, बल्कि वे फांसी को समझ रहे हैं, और फांसी लगाकर जान देने की भी उन्हें सूझ रही है। बहुत से लोग यह मानते हैं कि जिनके घरों में बच्चियां या लड़कियां हैं, वे लगातार एक तनाव में जीते हैं कि पता नहीं कब उनकी बच्ची के साथ कुछ हो जाए। कुछ समाजशास्त्रियों का यह भी मानना है कि भारत के कुछ समाजों में बाल विवाह इसलिए भी होते हैं कि लड़की बालिग होने के पहले शादी होकर ससुराल चली जाए, तो किसी हादसे की शिकार न हो। जहां पर मां-बाप दोनों काम करने वाले रहते हैं, ऐसे गरीब परिवारों में घर पर बच्चों की देखभाल एक बड़ी खतरनाक जिम्मेदारी होती है, और ऐसे में बच्चे, न सिर्फ लड़कियां, बल्कि लड़के भी, यौन शोषण के खतरे में जीते हैं। और देश में माहौल ऐसा है कि देश की एक प्रमुख महिला देश में बढ़ती हुई असहिष्णुता को लेकर यहां रहने से डरती है, तो उसे राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाता है। बलात्कार की रिपोर्ट कोई महिला लिखाती है, तो ममता बैनर्जी जैसी महिला मुख्यमंत्री उसे अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश बताती है।
लेकिन हिन्दुस्तान को अगर अपनी अगली पीढ़ी को मानसिक रूप से स्वस्थ बचाए रखना है, तो उसे यह देखना होगा कि उसके बच्चों की ऐसी दिमागी हालत न हो। आज देश की आबादी का एक हिस्सा सास-बहू जैसे सीरियलों को देख-देखकर सामाजिक और पारिवारिक तनाव की दिमागी हालत पा रहा है, और दूसरी तरफ 14 बरस के लड़के को बलात्कार सूझ रहा है, और सात बरस की बच्ची को खुदकुशी जैसा रास्ता दिख रहा है। हम अधिक दूर क्यों जाएं, छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनोंं में ऐसी आत्महत्या सामने आती है जिसमें छेडख़ानी या बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने के बाद पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की, और निराश-हताश लड़की या महिला ने आत्महत्या कर ली। यह एक भयानक हालत है जिसमें शहरों के खासे बड़े पुलिस-ढांचे के रहते हुए, मीडिया और अदालत की मौजूदगी के बीच भी लोगों को ऐसा बेबस होना पड़ रहा है।
अब जब कभी इस तरह की कोई चर्चा हो, तो यह बात भी होने लगती है कि महिलाओं पर होने वाले अपराधों की सुनवाई के लिए जब तक तेज रफ्तार फास्ट ट्रैक  अदालतें नहीं बनाई जाएंगी, तब तक महिलाओं पर जुर्म रूक नहीं सकते। लेकिन प्रधानमंत्री के स्वतंत्रता दिवस के भाषण के बाद देश के मुख्य न्यायाधीश का यह निराश बयान देखने लायक है कि देश में किस तरह जजों की कुर्सियां खाली पड़ी हैं, और प्रधानमंत्री को उस पर मुंह खोलना भी जरूरी नहीं लगता। महिलाओं पर जुल्म को रोकना आसान बात नहीं है क्योंकि भारत में हजारों बरस महिलाओं को कुचलने की सभ्यता चली आ रही है। ऐसे में समाज में जो कुछ कोशिशें हो सकें, उससे परे भी कानून की तेज रफ्तार कार्रवाई जरूरी है, ताकि मुजरिमों को सबक मिल सके। आज तो नेताओं और अफसरों के बयान बलात्कार की शिकार महिला या लड़की के खिलाफ दूसरे बलात्कार जैसे हिंसक रहते हैं, और निराशा के ऐसे ही माहौल में आत्महत्याएं होती हैं।

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