अंग्रेजों का मैला ढोते हुए गर्व करते राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानी...

संपादकीय
24 अगस्त  2016
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता को कड़ी फटकार लगाई है कि वे आपराधिक-मानहानि के मुकदमे दायर करके लोकतांत्रिक-असहमति को नहीं कुचल सकतीं। अदालत ने जयललिता से कहा- आप मानहानि के मुकदमों के जरिए लोकतंत्र का गला नहीं दबा सकती हैं, यह सही नहीं है, सरकार को अपनी आलोचना करने वालों पर मानहानि के मुकदमे दायर करने के बजाय अच्छे कामकाज पर ध्यान देना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी मुकदमेबाजी के लिए राज्य सरकार की मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
भारत में लोगों की धार्मिक भावनाओं, लोगों की राष्ट्रवाद की भावना, और लोगों की अपने सम्मान की धारणा को लेकर बड़े-बड़े मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। और तो और सैकड़ों और हजारों बरस पुरानी बातों को लेकर भी जब कोई इतिहास लिखते हैं, तो उनकी किताबें जलाने, और प्रतिबंधित करने के अलावा उनके खिलाफ भावनाएं आहत करने का मुकदमा भी भारत में आम हैं। फिर अभी पिछले कुछ बरसों से, और केन्द्र में मोदी सरकार के आने के पहले से भी, एक उग्र राष्ट्रवादी सोच ने तरह-तरह की अभिव्यक्ति को राष्ट्रविरोधी करार देते हुए कई तरह के मामले-मुकदमे शुरू कर दिए थे। कहीं कोई कार्टूनिस्ट गिरफ्तार किया गया, तो कहीं कोई नाटककार। नतीजा यह हुआ कि देश के पुलिस थानों में और जिलों की छोटी-छोटी अदालतों में राष्ट्रवाद को लेकर केस दर्ज होने लगे। अभी दो दिन पहले दक्षिण भारत की एक अभिनेत्री ने पाकिस्तान के बारे में कहा कि वहां के लोग भी भले हैं, और पाकिस्तान से संबंध अच्छे होने चाहिए, तो इस पर उसके खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दायर करने लोग अदालत पहुंचे हैं। तो फिर अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर, नरेन्द्र मोदी तक के खिलाफ भी यही मामला दर्ज होना चाहिए, क्योंकि इन दोनों ने पाकिस्तान के लोगों को समय-समय पर भला भी कहा है, और पाकिस्तान से संबंध सुधारने के लिए कई तरह के नुकसान भी झेले हैं।
मोदी अगर गौरक्षक-माफिया के बारे में कुछ कहते हैं, तो हमलावर-हिन्दू लोगों के मुंह बंद रहते हैं, लेकिन अगर यही बात भाजपा और हिन्दू संगठनों से परे के कोई लोग कहें, तो उनको पाकिस्तान जाने की सलाह दे दी जाती है। और ऐसी बातें तकरीबन रोज ही कहीं न कहीं हो रही हैं, और मंच और माईक से देश-प्रदेश के मंत्री, सांसद-विधायक, शंकराचार्य और दूसरे धार्मिक नेता लोगों को देशद्रोही करार देते हैं, और देशनिकाला घोषित करते हैं। यह पूरा सिलसिला हिन्दुस्तान में लोकतंत्र के कमजोर होने का सुबूत है। लोकतंत्र महज चुनावों का नाम नहीं होता है कि हर पांच बरस में बिना मतदान की धांधली के चुनाव हो जाएं, तो वही कामयाब लोकतंत्र कहा जा सकता है। कामयाब लोकतंत्र तो इस बात में रहता है कि अलग-अलग विचारधारा और सोच के लोग, अलग-अलग आस्थाओं के लोग एक-दूसरे को कितना बर्दाश्त कर सकते हैं, और असहमति से लेकर विविधता तक का कितना सम्मान कर सकते हैं। अभी राष्ट्रद्रोह, और राजद्रोह जैसा फतवे बात-बात में जारी किए जाते हैं। कोई अगर कश्मीर के बारे में यह ऐतिहासिक तथ्य याद दिलाए कि वहां की जनता को अपना देश या अपना राज तय करने का हक है, तो उसे पल भर में राष्ट्रद्रोही करार दे दिया जाता है, और उसे घर घुसकर मारा भी जाता है, सार्वजनिक जगहों पर उन पर कालिख भी फेंकी जाती है। राष्ट्रवाद के नाम पर हिंसा का यह सैलाब इसलिए खतरनाक है कि एक तबके के देखादेखी दूसरे तबके में भी राष्ट्रवाद, धर्मान्धता, जातिवाद, क्षेत्रवाद भड़कता है, और आंख के बदले आंख फोडऩे की यह सोच आग आगे बढ़ाती चलती है।
इस देश में राष्ट्रद्रोह और राजद्रोह के कानून अंग्रेजों के समय के बने हुए हैं, और अंग्रेज सरकार को अपने आपको हिन्दुस्तानी जनता से बचाने की जरूरतें बहुत अलग हुआ करती थीं। आज देश को आजाद हुए पौन सदी होने को है, और यह देश अंग्रेजों के अलोकतांत्रिक कानूनों को उसी तरह ढो रहा है जिस तरह इस देश का दलित सफाईकर्मी सिर पर मजबूरी में मैला ढो रहा है। वह तो मजबूरी में मैला ढो रहा है, लेकिन यह देश तो अपने पर घमंड करने वाले लोगों के सिर पर, उनकी पसंद से ऐसे गुलामी के कानून लादे हुए फख्र से घूम रहा है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। बात शुरू हुई थी भ्रष्टाचार के मामलों में अदालती कटघरों में खड़ी हुई तमिलनाडू की तानाशाह सी मुख्यमंत्री जयललिता के दायर किए हुए मानहानि-मुकदमों से, और बढ़ते हुए यह आ गई राजद्रोह के मुकदमों तक। यह सिलसिला बताता है कि भारत का लोकतंत्र किस तरह कमजोर है, और बेजा इस्तेमाल के लिए खुला हुआ है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए।

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